Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

बिन्नू की आँखों से — अवधी भाषा से संस्कृत, कन्नड़ से होते हुए इंसान तक की एक मज़ेदार, भावुक और थोड़ी शरारती यात्रा भाग 1 : अवधी भाषा “का हो डॉक्टरनी, पेट चिल-चिल होवत है!” जहाँ बिन्नू को पता चला कि आदमी की असली भाषा उसकी बीमारी नहीं, उसका दर्द बताती है मैं बिन्नू हूँ।…

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भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए : Part 1

बिन्नू की आँखों से — अवधी भाषा से संस्कृत, कन्नड़ से होते हुए इंसान तक की एक मज़ेदार, भावुक और थोड़ी शरारती यात्रा

भाग 1 : अवधी भाषा का हो डॉक्टरनी, पेट चिल-चिल होवत है!”

जहाँ बिन्नू को पता चला कि आदमी की असली भाषा उसकी बीमारी नहीं, उसका दर्द बताती है

अवधी भाषा
भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए

मैं बिन्नू हूँ।

और मैं आपको एक बात पहले ही बता दूँ—मैं भाषाओं का विद्वान नहीं हूँ।

मेरी भाषाई योग्यता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेज़ी में Present Perfect Tense सुनते ही मुझे अपना भविष्य Imperfect लगने लगता है।

लेकिन एक दिन गोंडा में मेरे साथ ऐसा किस्सा हुआ कि मुझे लगा—भाषा कोई विषय नहीं है जिसे किताब में पढ़कर पास कर लिया जाए।

भाषा तो आदमी की जेब में रखा वह छोटा-सा रुमाल है, जिससे वह अपने आँसू भी पोंछता है और पसीना भी।

उस दिन मैं अस्पताल में बैठा था।

मेरे बगल में एक बुज़ुर्ग बैठे थे। डॉक्टर ने पूछा—

“क्या परेशानी है?

बुज़ुर्ग ने पेट पर हाथ रखा और बोले—

“डॉक्टरनी जी, पेट चिल-चिल होवत है।”

मैंने सोचा—
यह कौन-सी नई बीमारी है?

मेरे मन में मेडिकल साइंस की कोई ऐसी किताब नहीं खुली जिसमें “चिल-चिल” नाम का अध्याय हो।

मैं डॉक्टर की तरफ देखने लगा।

डॉक्टर मुस्कुराईं।

उन्होंने पूछा—

“कब से चिल-चिल होवत है?”

बुज़ुर्ग बोले—

“कल रात से। खाना खाए के बाद बढ़ जात है।”

मैंने वहीं समझ लिया—

डॉक्टर ने बीमारी नहीं, भाषा पकड़ ली थी।

और जब भाषा पकड़ में आ जाए, तो आदमी भी पकड़ में आ जाता है।

मैंने धीरे से डॉक्टर से पूछा—

“आपको ये सब कैसे समझ में आता है?”

वह बोलीं—

अवधी सीख रही हूँ।”

मैंने कहा—

अच्छा! हम तो समझे मेडिकल कॉलेज में ‘चिल-चिल’ भी पढ़ाया जाता होगा।”

वह हँस पड़ीं।

लेकिन सच कहूँ, उसी दिन मुझे पहली बार समझ आया कि मरीज डॉक्टर को केवल अपनी बीमारी बताने नहीं आता।

वह अपनी भाषा में अपनी बीमारी का अनुभव लेकर आता है।

हम शहर वाले कहते हैं—

“Headache.”

गाँव वाला कह देता है—

“माथा भनभनात है।”

अब आप ही बताइए—दोनों में फर्क है कि नहीं?

“Headache” सुनकर मुझे दर्द की सूचना मिलती है।

लेकिन “माथा भनभनात है” सुनते ही ऐसा लगता है जैसे सिर के अंदर किसी ने मधुमक्खियों की पंचायत बैठा दी हो।

फिर कोई कहता—

“पैर झनझनात है।”

मैंने मन में सोचा—
भाई, तुम्हारा पैर है या मोबाइल का vibration mode?

लेकिन अवधी का यही कमाल है।

यह बीमारी को भी अनुभव बना देती है।

और शायद इसीलिए डॉक्टर अनिता पुन्योदया मिश्रा, जो कर्नाटक से आई थीं, धीरे-धीरे गोंडा की अवधी में उतरती चली गईं।

मुझे उनकी कहानी में सबसे अच्छी बात यही लगी।

उन्होंने यह नहीं सोचा कि—

“मरीज को मेरी भाषा सीखनी चाहिए।”

उन्होंने सोचा—

“मुझे उसकी भाषा सीखनी चाहिए।”

अब यह बात सुनने में छोटी लगती है।

लेकिन बिन्नू की मानिए—यह बहुत बड़ी बात है।

क्योंकि भाषा सीखने का सबसे पहला मतलब शब्द याद करना नहीं है।

अपना अहंकार थोड़ा नीचे रखना है।

अवधी भाषा
भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए

आप किसी से उसकी भाषा में दो शब्द बोलते हैं और सामने वाले के चेहरे पर जो मुस्कान आती है, वह किसी dictionary में नहीं मिलती।

मैंने भी उसी दिन प्रयोग किया।

एक आदमी से पूछा—

“का हाल बा?”

वह मुझे देखने लगा।

मैंने फिर कहा—

“का हो, सब बढ़िया?”

वह बोला—

“हाँ।”

मैंने सोचा—
वाह, बिन्नू! आज तो भाषाविद् पैदा हो गया।

फिर मैंने तीसरा सवाल पूछा—

“आप कहाँ रहते हैं?”

उसने पूरा पता बता दिया।

मैं चुप।

भाषा सीखने का उत्साह वहीं समाप्त।

लेकिन अवधी का संगीत मेरे कान में बस गया था।

बाद में जब लोकगीत सुने तो समझ आया कि यह भाषा केवल बातचीत में मीठी नहीं है—गाती भी बहुत सुंदर है।

कहीं विरहिणी की आवाज़ आती है—

“मोसे करि गयो कौल करारा…”

बस दो शब्द और आदमी समझ जाता है कि मामला गंभीर है।

यहाँ प्रेम भी है, शिकायत भी है और वह पुराना भारतीय प्रेम भी—जिसमें सामने वाला छोड़कर चला जाए, फिर भी उसकी याद को घर से बाहर नहीं निकाला जाता।

कहीं सावन की रात में स्वर उठता है—

अरे रामा, बेला फूले अधी राति…”

और कहीं पपीहा-मोर के बहाने दिशाएँ पूछती हुई आवाज—

कउनी दिसा बोलै पापी पपिहरा, कउनी दिसा बोलै मोर…”

अब मुझे समझ आया कि डॉक्टर को अवधी में लय और गर्माहट क्यों सुनाई देती है।

अवधी में बात भी जैसे गुनगुनाकर निकलती है।

“का हो?”

यह केवल प्रश्न नहीं।

इसमें अपनापन है।

“बैठा।”

यह केवल बैठने का आदेश नहीं।

इसमें घर है।

“खा लिहा?”

यह केवल भोजन के बारे में सवाल नहीं।

इसमें चिंता है।

और—

“अब कइसन लागत है?”

यह केवल स्वास्थ्य-जाँच नहीं।

इसमें मनुष्य के लिए मनुष्य का खयाल है।

उस शाम अस्पताल से निकलते हुए मैं सोच रहा था—

हमने भाषाओं को कितनी अजीब तरह से बाँट रखा है।

एक भाषा पढ़ाई की।

और एक नौकरी की।

एक घर की।

और एक गाँव की।

एक मंदिर की।

एक बाजार की।

लेकिन भाषा खुद हमसे पूछती होगी—

“भइया, मैं कौन हूँ?”

और शायद उसका उत्तर है—

“तू वही है जिसमें आदमी अपना मन बिना डर के खोल सके।”

मैं यह सोच ही रहा था कि मेरे सामने कहानी ने अचानक करवट ली।

क्योंकि गोंडा की उस अवधी से मेरी यात्रा मुझे बहुत दूर ले जाने वाली थी—

कर्नाटक।

वहाँ मैंने देखा कि एक भाषा केवल किसी दूसरे की बोली सीखने का माध्यम नहीं बनी थी।

वहाँ तो एक परिवार ने एक बहुत पुरानी भाषा को…

घर में फिर से जन्म दे दिया था।

“बोली में जो अपनापन था…

अवधी भाषा
भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए
तुलसीदास

उस दिन गोंडा से लौटते हुए मैं बहुत देर तक चुप रहा।

सड़क वही थी।
धूल वही थी।
दुकानों पर वही चहल-पहल थी।
कहीं दूर से किसी लोकगीत की धीमी-सी आवाज़ आ रही थी—

“अरे रामा…”

लेकिन मेरे भीतर कुछ बदल चुका था।

मैं सोच रहा था—
मैंने आज अवधी के कितने शब्द सीखे?

शायद पाँच।
शायद दस।

लेकिन उन थोड़े-से शब्दों ने मुझे कितने लोग सिखा दिए!

“का हो?” में सवाल कम, अपनापन ज़्यादा था।

“खा लिहा?” में भोजन कम, चिंता ज़्यादा थी।

“माथा भनभनात है…” में बीमारी कम, अपनी तकलीफ़ किसी अपने को बता पाने का भरोसा ज़्यादा था।

तभी मुझे लगा—

हम भाषा सीखते समय शब्द नहीं सीखते।

हम किसी दूसरे इंसान के दिल का दरवाज़ा खोलने की चाबी सीखते हैं।

और शायद डॉ. अनिता ने भी यही चाबी खोजी थी।

कर्नाटक से आईं, गोंडा की मिट्टी में उतरीं, और धीरे-धीरे वहाँ के लोगों की बोली को सुनने लगीं।

उन्होंने अवधी को सिर्फ बोलना नहीं सीखा—

उन्होंने उसमें लोगों का दर्द सुनना सीखा।

और मुझे लगा, शायद यही किसी भाषा की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

वह आपको यह नहीं कहती—

पहले मुझे पूरी तरह सीखो, फिर मैं तुम्हें अपनाऊँगी।

वह बस मुस्कुराकर कहती है—

“आओ… दो शब्द बोलो।
गलत बोलोगे तो हँस लेंगे,
लेकिन अपने तो हो जाओगे।”

मैं भी मुस्कुरा दिया।

और मन ही मन कहा—

“अवधी, तुम बड़ी शरारती निकलीं…
पहले शब्द सिखाए,
फिर उन्हीं शब्दों के बहाने दिल जीत लिया।”

लेकिन मेरी यह भाषाई यात्रा अभी खत्म कहाँ हुई थी!

क्योंकि अगली बार जब मैं दक्षिण की ओर गया, तो मुझे एक ऐसा घर मिला जहाँ मैंने जाना—

भाषा केवल लोगों के बीच पुल नहीं बनाती…
कभी-कभी वह पीढ़ियों के बीच समय का पुल भी बन जाती है।

और उस घर में एक ऐसी भाषा मेरा इंतज़ार कर रही थी,
जिसे मैं अब तक सिर्फ किताबों में जानता था।

संस्कृत।

वही संस्कृत जिसके श्लोक हमने रटे थे,
जिसके अर्थ परीक्षा में लिखे थे,
और जिसे हम अक्सर अतीत की भाषा समझकर आगे बढ़ गए थे।

लेकिन बिन्नू ने जब उसे एक घर के भीतर बोलते हुए सुना…

तो मुझे पहली बार लगा—

कुछ भाषाएँ पुरानी नहीं होतीं।
बस हम उनसे बात करना बंद कर देते हैं।

और शायद अगली कहानी इसी सवाल से शुरू होती है—
क्या होगा जब कोई भाषा किताब से निकलकर
फिर से किसी घर की आवाज़ बन जाए?


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