Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

कैसरगंज की वह रात और हमारी दोस्ती की सबसे मज़ेदार कहानी बचपन की मस्ती “कुछ किस्से उस वक्त शर्मिंदगी होते हैं,फिर मज़ाक बनते हैं,और आखिर में वही किस्से हमारी सबसे प्यारी याद बन जाते हैं।” बस अब कैसरगंज से आगे बढ़ चुकी थी। लेकिन हमारे दोस्त का मन अभी भी कैसरगंज की सड़क पर ही…

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बचपन की मस्ती- वह भागता हुआ दोस्त..2

कैसरगंज की वह रात और हमारी दोस्ती की सबसे मज़ेदार कहानी

बचपन की मस्ती

टेक्नो-75, शोले और वह भागता हुआ दोस्त..2

“कुछ किस्से उस वक्त शर्मिंदगी होते हैं,
फिर मज़ाक बनते हैं,
और आखिर में वही किस्से हमारी सबसे प्यारी याद बन जाते हैं।”

बस अब कैसरगंज से आगे बढ़ चुकी थी।

लेकिन हमारे दोस्त का मन अभी भी कैसरगंज की सड़क पर ही था!

दरअसल, वह बेचारा अभी-अभी बस में चढ़ा था। कपड़ों पर धूल, चेहरे पर घबराहट और आँखों में ऐसी बेबसी जैसे अभी-अभी किसी फिल्म के क्लाइमेक्स से निकलकर आया हो।

हम सब उसे देख रहे थे।

कोई हँसी रोक रहा था।

कोई सचमुच चिंता कर रहा था।

और कुछ ऐसे भी थे जिन्हें बस यही इंतज़ार था कि वह सीट पर ठीक से बैठे और फिर शुरू हो…

दोस्तों की अदालत।

“भाई, दौड़ अच्छी थी!”

जैसे ही वह अपनी सीट पर बैठा, पीछे से आवाज़ आई—

“भाई, दौड़ तो बहुत अच्छी थी!”

बस में ठहाका।

दूसरा बोला—

“तू बस पकड़ रहा था या ओलंपिक की तैयारी कर रहा था?”

फिर हँसी।

तीसरा बोला—

“अगर थोड़ा और तेज़ दौड़ता तो बस को पीछे से पकड़कर खींच लेता!”

अब तो बेचारे ने सिर नीचे कर लिया।

लेकिन हम भी कहाँ मानने वाले थे!

आखिर दोस्ती में सबसे पवित्र अधिकार होता है—

बचपन की मस्ती—दोस्त की टाँग खींचने का अधिकार।

कैसरगंज का “हीरो”

बिन्नू ने खिड़की से बाहर देखते हुए फिल्मी अंदाज़ में कहा—

“अरे भाई, आज तो तू असली हीरो निकला।”

बिज्जू बोला—

“हाँ, लेकिन फिल्म का नाम शोले नहीं… बस के पीछे भागता आदमी होना चाहिए था।”

भानु ने तुरंत कहा—

“और इंटरवल में समोसा नहीं, पेट दर्द!”

बस फिर हँसी से भर गई।

हमारे दोस्त ने भी आखिरकार मुस्कुराना शुरू कर दिया।

शायद उसे समझ आ गया था कि अब इससे बचने का कोई रास्ता नहीं था।

बचपन की मस्ती-किशोर उम्र की दोस्ती ऐसी ही होती थी-

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है…

हमारे पास तब बहुत कम था।

न मोबाइल।

न इंटरनेट।

नो सोशल मीडिया।

न हर घटना को रिकॉर्ड करने वाला कैमरा।

लेकिन हमारे पास एक चीज़ बहुत थी—

समय।

और शायद उससे भी ज्यादा…

दोस्ती।

हम घंटों साथ रहते थे और हमारे पास बातचीत के लिए हमेशा कुछ न कुछ होता था।

एक दोस्त की चाल।

दूसरे की आवाज़।

किसी का नया हेयरस्टाइल।

किसी की नई शर्ट।

किसी की परीक्षा में कम आई हुई कॉपी।

और कभी-कभी…

किसी का बस छूट जाना!

बस, यही काफी था।

एक किस्सा बन जाता था।

बचपन की मस्ती-उस समय छोटी-सी खुशी भी बड़ी लगती थी –

आज सोचता हूँ तो लगता है कि उस यात्रा में हमने आखिर देखा ही क्या था?

एक प्रदर्शनी।

कुछ मशीनें।

लखनऊ की सड़कें।

एक सिनेमा हॉल।

एक फिल्म।

कुछ समोसे।

और एक रात की बस यात्रा।

लेकिन उस समय…

यही तो हमारी दुनिया थी।

हमें बड़े होटल नहीं चाहिए थे।

न महँगे रेस्तराँ।

न इंस्टाग्राम के लिए तस्वीरें।

न किसी को यह बताने की जरूरत है कि हम कहाँ घूमने गए हैं।

हम बस घूम रहे थे।

हँस रहे थे।

खा रहे थे।

बातें कर रहे थे।

और जिंदगी को…

बिना किसी फिल्टर के जी रहे थे।

और लड़कियाँ भी हमारे साथ थीं…

इस यात्रा की एक खास बात और थी।

हम पहली बार इतनी बड़ी संख्या में लड़के और लड़कियाँ साथ घूम रहे थे।

आज सुनने में यह बहुत सामान्य लगता है।

लेकिन उस समय हमारे लिए यह अपने आप में एक बड़ा अनुभव था।

लड़के थोड़ा ज्यादा बाल सँवारकर आए थे।

शर्ट शायद सामान्य से थोड़ी ज्यादा इस्त्री की गई थी।

जूते भी कुछ ज्यादा चमक रहे थे।

और जब लड़कियाँ सामने से गुजरतीं…

तो वही लड़के, जो पाँच मिनट पहले तक एक-दूसरे को धक्का देकर हँस रहे थे, अचानक बहुत शरीफ बन जाते।

“जी…”

“आप बैठिए…”

“आप पहले…”

अरे वाह!

इतनी शालीनता तो हमने कभी अपनी बहनों के सामने भी नहीं दिखाई थी!

आज जब इतनी दूर आ गए – सब कुछ सपने जैसा लगता है। उस टेक्नो 75 टूर की कई मज़ेदार बातें है –

हम लोगों ने तो सारे दिन खूब मस्ती की , लखनऊ की सड़कें देखीं – सारी फिल्में देख डालीं – ताकि कोई मलाल न रहे , क्योंकि उस ज़माने में लेटेस्ट फिल्में देखना , उनकी खबर रखना स्टेटस सिम्बोल था। शाम को सभी लड़कों की टोलियाँ अलग-अलग दिशाओं से टेक्नो प्रदर्शनी में दाखिल हुईं। कुछ अच्छे टाइप के लड़के तो सुबह से टीचर्स और साथ में आयी लड़कियों के साथ वहीँ मौजूद थे, लेकिन जब हम आये तो वो हमें कहीं दिखाई नहीं दीं। हमारा भाई –जसबीर – अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाया – तुरंत ब्रजेन्द्र से पूछ – अबे लाला – लौडियें कहाँ है,. – किस्मत के मारे लड़कियां वहीँ सामने घास पर जमीन पर बैठी थीं, उनकी लीडर सोमलता ने कहा – जसबीर हम यहाँ हैं. अब हम सबको काटो तो खून नहीं – रंगे हाथ पकड़े गए – धीरे से वहां से निकल लिए. आज सोचकर मज़ा आता है कि क्या टीनएज होती है.

जसबीर की अपनी ही दुनिया थी

और इन सबके बीच जसबीर अपनी ही दुनिया में था।

राजेश खन्ना का प्रभाव उस पर इतना गहरा था कि कभी-कभी लगता था कि वह किसी पुराने हिंदी सिनेमा के सेट से सीधे हमारी बस में आ गया है।

किसी ने उससे कुछ पूछा।

वह गर्दन घुमाता।

हल्की मुस्कान।

और—

“नहीं… रानी माँ!”

बस।

हम सब खत्म।

आज भी अगर हममें से कोई उस संवाद को उसी अंदाज़ में बोल दे…

तो उम्र चाहे कितनी भी हो गई हो…

हमारे चेहरे पर वही पुरानी हँसी लौट आती है।

शायद कुछ दोस्तियाँ समय के साथ पुरानी नहीं होतीं।

वे बस…

और कीमती होती जाती हैं।

रात की बस और किशोर सपनेअतिथि देवो भाव : और रिश्तों को निभाना

बस अँधेरे रास्ते पर दौड़ रही थी।

खिड़की के बाहर कभी कोई छोटा कस्बा आता।

फिर अँधेरा।

कहीं दूर कोई चाय की दुकान।

कहीं खेत।

कहीं सड़क किनारे पेड़।

अंदर कभी गीत बजता।

कभी कोई गाना गाता।

कभी सीटों के बीच से आवाज़ आती—

“सो जा भाई!”

जवाब आता—

“पहले तू सो!”

और फिर बातचीत।

कभी भविष्य की बातें।

कभी फिल्मों की।

कभी स्कूल की।

कभी किसी दोस्त की शरारत की।

और कभी…

बस यूँ ही।

बिना किसी विषय के।

क्योंकि किशोरावस्था में दोस्ती को बातचीत के लिए विषय की जरूरत नहीं होती।

दोस्त सामने हों, इतना ही काफी होता है।

तब भविष्य बहुत दूर लगता था

उस उम्र में हमें लगता था कि जिंदगी हमेशा ऐसी ही रहेगी।

हम हमेशा स्कूल में रहेंगे।

हमेशा यही दोस्त साथ होंगे।

हमेशा इसी तरह बस में हँसेंगे।

हमेशा छुट्टियों का इंतज़ार करेंगे।

हमेशा किसी नई फिल्म की चर्चा करेंगे।

हमें कहाँ मालूम था कि एक दिन यही लड़के अलग-अलग शहरों में होंगे।

किसी की नौकरी होगी।

किसी का व्यापार।

किसी का परिवार।

किसी की अपनी जिम्मेदारियाँ।

और कुछ दोस्त…

हमेशा के लिए यादों में रह जाएँगे।

बिन्नू…

आज जब उस यात्रा को याद करता हूँ तो सबसे पहले चेहरों की एक पूरी कतार आँखों के सामने आती है।

बिन्नू।

जसबीर।

बिज्जू।

भानु।

और न जाने कितने साथी।

उनमें से कुछ से संपर्क बना रहा।

कुछ दूर होते गए।

और कुछ…

समय की भीड़ में कहीं खो गए।

लेकिन स्मृति बड़ी अजीब चीज़ है।

वह किसी को पूरी तरह खोने नहीं देती।

एक गीत सुनते ही कोई दोस्त सामने आ जाता है।

किसी पुराने रास्ते से गुजरते ही कोई यात्रा याद आ जाती है।

किसी फिल्म का संवाद सुनते ही कोई शरारती चेहरा आँखों के सामने आ जाता है।

और कभी-कभी…

बस कैसरगंज में रुकती हुई दिखाई देती है।

एक लड़का नीचे उतरता है।

बस चल पड़ती है।

और वही लड़का…

पूरी ताकत से बस के पीछे दौड़ता हुआ दिखाई देता है।

शायद यही हमारी किशोर उम्र की सबसे बड़ी खूबसूरती थी

हम बेफिक्र थे।

हम थोड़े नासमझ थे।

कभी-कभी बेवकूफ भी।

हम छोटी-छोटी बातों पर हँसते थे।

छोटी-सी यात्रा हमारे लिए बड़ी घटना बन जाती थी।

एक फिल्म कई दिनों तक चर्चा का विषय रहती थी।

एक दोस्त की शरारत महीनों तक मज़ाक बन सकती थी।

और एक साथ बिताया हुआ दिन…

पूरी जिंदगी की याद बन जाता था।

आज हमारे पास बहुत कुछ है।

लेकिन शायद उस समय जैसा खाली समय नहीं है।

तब जेब हल्की थी…

लेकिन दिल भरा हुआ था।

आज जेब शायद भारी हो…

पर उन दिनों जैसी बेफिक्री कहाँ?

“वो भी क्या दिन थे…”

कभी-कभी मन करता है कि समय से कहूँ—

“भाई, अगर इतना ही आगे जाना था तो थोड़ा धीरे चलता!”

लेकिन समय कहाँ रुकता है।

वह तो बस चलता रहता है।

लखनऊ की वह यात्रा भी एक दिन खत्म हो गई।

शोले भी खत्म हो गई।

टेक्नो-75 भी पीछे छूट गया।

कैसरगंज भी पीछे रह गया।

और हम…

हम भी बड़े हो गए।

लेकिन उस रात की बस…

आज भी हमारी यादों में चल रही है।

उसमें बिन्नू है।

जसबीर है।

बिज्जू है।

भानु है।

वह अनाम-सा दोस्त है जो बस के पीछे भाग रहा है।

और हम सब…

अब भी वैसे ही हँस रहे हैं।


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