Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

बिन्नू, La Gardenia और उन तमाम दोस्तों के नाम, जो कभी हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बने और फिर यादों में बस गए… आज फिर Friendship Day है। मोबाइल की स्क्रीन पर सुबह से संदेश आने लगेंगे। WhatsApp groups में फूल, दिल और पुराने दोस्तों की तस्वीरें दिखाई देंगी। Facebook किसी दस-पंद्रह साल पुरानी तस्वीर को…

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Friendship Day: कुछ दोस्त चले जाते हैं… मगर दोस्ती कहीं नहीं जाती

बिन्नू, La Gardenia और उन तमाम दोस्तों के नाम, जो कभी हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बने और फिर यादों में बस गए…

दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त,
दोस्त मिलता है बड़ी मुश्किल से।”
— हफ़ीज़ होशियारपुरी

Friendship day

आज फिर Friendship Day है।

मोबाइल की स्क्रीन पर सुबह से संदेश आने लगेंगे। WhatsApp groups में फूल, दिल और पुराने दोस्तों की तस्वीरें दिखाई देंगी। Facebook किसी दस-पंद्रह साल पुरानी तस्वीर को सामने लाकर कहेगा—You have memories to look back on.

और हम मुस्कुरा देंगे।

लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर Friendship Day पहले जैसा नहीं लगता।

कभी यह दिन दोस्तों की गिनती करने का दिन था। आज शायद उनकी कमी महसूस करने का दिन ज्यादा है।

कभी Friendship Day पर सोचा करते थे—आज कहाँ मिलना है?

अब कभी-कभी सोचते हैं—

वे सब कहाँ हैं?

राजेंद्र कहाँ है… अनिल कैसा होगा… प्रेम, बिज्जू, ज्ञान… मुशाहिद… G.S. Sir… सेंटी, सोनू, जसबीर और वे तमाम लोग, जो जिंदगी के अलग-अलग मोड़ों पर मिले।

और इन सारे नामों के बीच एक नाम ऐसा है जिस पर आकर याद कुछ देर ठहर जाती है—

बिन्नू।

बिन्नू—जिसके लिए दोस्ती रिश्ता नहीं, जुनून थी Friendship Day

कुछ लोग दोस्त बनाते हैं।

कुछ लोग दोस्ती निभाते हैं।

और कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके लिए दोस्ती जीने का तरीका होती है

बिन्नू शायद ऐसा ही था।

उसके भीतर दोस्ती को लेकर एक अलग ही जुनून था। दोस्त, उसके लिए contact list में दर्ज नाम नहीं थे। वे उसकी दुनिया थे।

मिलना है तो मिलना है।

बैठना है तो घंटों बैठना है।

किसी दोस्त को जरूरत है तो बाकी काम बाद में।

कोई नाराज़ है तो उसे मनाना है।

और कोई पुराना साथी बहुत दिनों से दिखाई नहीं दिया तो उसे ढूँढ़ निकालना है।

आज की भाषा में शायद इसे कोई social circle कह दे।

लेकिन हमारे लिए वह circle नहीं था।

वह परिवार था—एक ऐसा परिवार जिसे हमने खुद चुना था।

बिन्नू उन रिश्तों को बड़ी शिद्दत से जीता था।

शायद इसीलिए आज जब Friendship Day आता है, तो दोस्तों की भीड़ में सबसे पहले उसी की कमी दिखाई देती है।

कुछ अनुपस्थितियाँ बड़ी अजीब होती हैं।

इंसान सामने नहीं होता, मगर हर पुरानी कहानी में वही सबसे ज्यादा मौजूद होता है।

La Gardenia: वह restaurant नहीं, दोस्तों का पता था

फिर एक समय आया जब ज्ञान ने La Gardenia खोला।

कहने को वह एक restaurant था।

लेकिन हम जानते थे कि उसके लिए वह केवल business नहीं था।

शायद उसके मन में कहीं यह इच्छा थी कि दोस्तों के मिलने के लिए एक ऐसी जगह हो जहाँ किसी invitation की जरूरत न पड़े।

जहाँ राजेंद्र आ जाए।

जसबीर,अनिल आ जाए।

प्रेम पहुँच जाए।

बिज्जू और ज्ञान बैठ जाएँ।

कोई पुराना दोस्त अचानक दरवाजे से दिखाई दे जाए।

कोई चाय मँगाए।

और ,कोई खाने का order दे।

और फिर खाना ठंडा होता रहे क्योंकि बातचीत खत्म ही न हो।

बिन्नू ने तो वहां महफ़िल ही सज़ा दी थी। कोई आये या न आये – बिन्नू हर शाम को वहां हाज़िर होते थे – बस एक चाय और कुछ सिगरेट्स के साथ – उनका साथ ज्ञान बखूबी देते थे

La Gardenia धीरे-धीरे restaurant से ज्यादा दोस्तों का drawing room बन गया था।

किसी शाम वहाँ दो लोग होते।

फिर तीसरा आ जाता।

फिर किसी को फोन किया जाता—

“कहाँ हो?”

“घर पर।”

“आ जाओ।”

और शायद यही तीन शब्द हमारी पीढ़ी की दोस्ती का सबसे सुंदर invitation हुआ करते थे—

“यार, आ जाओ।”

आज meeting के लिए calendar invites भेजे जाते हैं।

तब दोस्त को बुलाया जाता था।

और वह आ भी जाता था।

एक मेज़, कुछ कुर्सियाँ और न जाने कितनी कहानियाँ

आज सोचता हूँ तो La Gardenia की वे मेज़-कुर्सियाँ भी कितनी कहानियों की गवाह रही होंगी।

किसी दिन ठहाका।

किसी दिन राजनीति।

और ,किसी दिन फिल्मों की चर्चा।

और ,किसी दिन पुरानी शरारतों का हिसाब।

किसी दोस्त की परेशानी।

और ,किसी की सफलता।

किसी की शिकायत—

“आजकल बड़ा आदमी हो गया है, फोन नहीं करता!”

और फिर सब हँस पड़ते।

राजेंद्र, अनिल, प्रेम, बिज्जू, ज्ञान…जसबीर

इन नामों को आज लिखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे किसी पुरानी group photograph के चेहरे एक-एक करके सामने आ रहे हों।

हर व्यक्ति की अलग कहानी है।

अलग दौर।

और , अलग हँसी।

अलग याद।

और बीच में बिन्नू—

शायद सबको जोड़ने वाला कोई अदृश्य धागा।

फिर 2020 आया… और दुनिया ने दरवाज़े बंद कर लिए

किसे मालूम था कि एक दिन दुनिया सचमुच रुक जाएगी?

Covid आया।

बाजार बंद।

सड़कें खाली।

रेस्तराँ बंद।

लोग अपने-अपने घरों में कैद हैं।

और La Gardenia भी बंद हो गया।

वह सिर्फ़ एक restaurant का shutter गिरना नहीं था।

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, जैसे उसके साथ हमारी जिंदगी के एक दौर का shutter भी धीरे से नीचे आ गया था।

वह जगह जहाँ कभी आवाज़ें थीं, खामोश हो गई।

जहाँ कुर्सियाँ खींचकर लोग बैठते थे, वहाँ कुर्सियाँ खाली रह गईं।

जहाँ कोई आवाज देता था—

“एक चाय और…”

वहाँ सन्नाटा था।

तब शायद हमें लगा होगा कि कुछ दिनों की बात है।

फिर सब सामान्य हो जाएगा।

Restaurant खुलेगा।

दोस्त फिर आएँगे।

वही मेज़ होगी।

और ,वही बहस।

वही हँसी।

लेकिन जिंदगी हर चीज़ वहीं से शुरू नहीं करती जहाँ हमने उसे छोड़ा था।

कुछ दरवाज़े बंद होते हैं और फिर केवल यादों में खुलते हैं।

और फिर बिन्नू भी याद बन गया…

यह लिखना आज भी आसान नहीं है।

जिस आदमी के भीतर दोस्तों को इकट्ठा रखने का इतना जुनून था, एक दिन वही दोस्त अपनी महफ़िल से उठकर चला गया।

बिना यह पूछे कि बाकी लोग तैयार हैं या नहीं।

बिना आखिरी get-together रखे।

और ,बिना यह कहे—

“फिर मिलेंगे।”

और तब समझ आया कि मृत्यु केवल किसी इंसान को नहीं ले जाती।

वह उसके साथ पूरा समय भी ले जाती है।

एक आवाज।

और ,एक अंदाज।

एक फोन call।

एक ठहाका।

और ,एक आदत।

और कभी-कभी एक पूरी महफ़िल।

आज भी पुराने दिनों को याद करता हूँ तो लगता है कि शायद दरवाज़ा खुलेगा और बिन्नू अपनी उसी गर्मजोशी के साथ कहेगा—

“कहाँ गायब हो यार?”

लेकिन कुछ आवाज़ें अब केवल भीतर सुनाई देती हैं।

राजेंद्र, अनिल, प्रेम, बिज्जू, ज्ञान… नाम नहीं, हमारी जिंदगी के अध्याय हैं

जिंदगी की किताब अजीब है।

उसके कुछ chapters बहुत लंबे होते हैं।

कुछ केवल कुछ पन्नों के।

लेकिन पन्नों की संख्या से उनकी अहमियत तय नहीं होती।

राजेंद्र।

अनिल।

प्रेम।

बिज्जू।

ज्ञान।

इनमें से हर नाम अपने साथ एक समय लेकर आता है।

कोई घटना।

कोई शाम।

और , कोई यात्रा।

कोई बातचीत।

कोई ऐसा मजाक जिसका अर्थ बाहर वाला कभी समझ ही नहीं सकता।

यही तो पुराने दोस्तों की खूबसूरती है।

उनके साथ आपको अपनी biography बताने की जरूरत नहीं पड़ती।

उन्हें पता होता है कि आप कहाँ से आए हैं।

उन्होंने आपको तब देखा होता है जब आपके पास दिखाने के लिए उपलब्धियाँ नहीं थीं।

और शायद इसीलिए पुराने दोस्तों के सामने आदमी फिर से थोड़ा बच्चा हो जाता है।

मुशाहिद, G.S. Sir… और दोस्ती के बदलते हुए रूप

हर दोस्त हमारी उम्र का हो, यह भी जरूरी नहीं।

जिंदगी ने समय-समय पर ऐसे रिश्ते भी दिए जिनमें सम्मान था, मार्गदर्शन था, लेकिन कहीं भीतर दोस्ती की गर्माहट भी थी।

मुशाहिद जैसे लोग।

G.S. Sir जैसे लोग।

कुछ रिश्तों को नाम देना मुश्किल होता है।

वे दोस्त भी हैं।

बड़े भाई भी।

मार्गदर्शक भी।

कभी शिक्षक।

कभी सलाहकार।

और कभी बस वह इंसान जिससे दस मिनट बात करके मन हल्का हो जाता है।

उम्र बढ़ने के साथ समझ आया कि दोस्ती उम्र का रिश्ता नहीं है; मन का रिश्ता है।

मुशाहिद ,सेंटी, आशू ,सोनू, विनोद और वे छोटे भाई, जो दोस्त बन गए

फिर जिंदगी ने कुछ छोटे भाइयों जैसे दोस्त दिए।

मुशाहिद ,सेंटी, आशू ,सोनू, विनोद और ऐसे कई दूसरे।

उम्र में छोटे, लेकिन अपनापन ऐसा कि कभी उम्र का अंतर महसूस ही नहीं हुआ।

यही जिंदगी की खूबसूरती है।

स्कूल की दोस्ती अलग थी।

कॉलेज की अलग।

नौकरी के दिनों में मिले लोग अलग थे।

फिर उम्र के दूसरे पड़ाव पर कुछ नए लोग आए।

कुछ हमसे बड़े।

कुछ छोटे।

और हर किसी ने जिंदगी के canvas पर अपना थोड़ा-सा रंग छोड़ दिया।

आज उनमें से बहुत से लोग रोजमर्रा की जिंदगी में हमारे साथ नहीं हैं।

लेकिन क्या दोस्ती केवल रोज बात करने का नाम है?

शायद नहीं।

कुछ लोग अपनी दोस्ती पूरी करके चुपचाप चले गए…

उम्र बढ़ने पर एक बात धीरे-धीरे समझ आने लगती है।

हर व्यक्ति हमारी पूरी जिंदगी के लिए नहीं आता।

कुछ लोग केवल एक मौसम के लिए आते हैं।

कोई स्कूल तक।

कोई कॉलेज तक।

और ,कोई पहली नौकरी तक।

कोई किसी मुश्किल समय में।

कोई किसी यात्रा में।

और ,कोई कुछ वर्षों तक बहुत करीब रहता है।

फिर…

न कोई लड़ाई।

और ,न कोई बड़ा विवाद।

न कोई अंतिम विदाई।

बस बातचीत कम होने लगती है।

फोन बंद हो जाते हैं।

मुलाकातों के बीच महीने आ जाते हैं।

फिर साल।

और एक दिन अचानक महसूस होता है—

वह व्यक्ति हमारी वर्तमान जिंदगी से निकल चुका है।

मगर यादों से नहीं।

कभी-कभी लगता है कि शायद वे लोग हमारी जिंदगी में अपनी दोस्ती का निर्धारित हिस्सा पूरा करने आए थे।

उन्होंने अपना किरदार निभाया।

हमें कुछ दिया।

हमसे कुछ लिया।

कुछ हँसी बाँटी।

और , कुछ दुख सुने।

कुछ रास्ता हमारे साथ चले।

और फिर…

चुपके से हमारी कहानी के अगले पन्ने से बाहर निकल गए।

बिना कोई आवाज किए।

पीछे बस अपनी यादें छोड़कर।

आज जिंदगी में सब कुछ है… बस वह बेफिक्री नहीं

आज फोन बेहतर है।

गाड़ी बेहतर है।

Restaurants बेहतर हैं।

Coffee ज्यादा महँगी है।

Photographs ज्यादा साफ आती हैं।

लेकिन शायद रिश्तों के लिए समय थोड़ा धुँधला हो गया है।

पहले किसी दोस्त से मिलने के लिए reason नहीं चाहिए था।

अब पूछा जाता है—

“किसलिए मिलना है?”

पहले जवाब होता—

“बस ऐसे ही।”

और बस ऐसे ही मिलने में पूरी शाम गुज़र जाती थी।

आज कभी-कभी महीनों तक हम उन लोगों से नहीं मिल पाते जिन्हें कभी एक दिन न देखकर बेचैनी होने लगती थी।

शायद यही उम्र है।

शायद यही जिंदगी है।

या शायद हमने व्यस्त होना सीखते-सीखते बेवजह मिलना भूल दिया।

आज अगर La Gardenia फिर खुल जाए…

कभी-कभी कल्पना करता हूँ—

अगर किसी शाम La Gardenia फिर से खुल जाए तो?

वही पुराना दरवाज़ा।

और ,वही मेज़।

वही कुर्सियाँ।

मैं जाकर बैठूँ।

धीरे-धीरे लोग आने लगें।

राजेंद्र।

अनिल।

प्रेम।

बिज्जू।

ज्ञान।

मुशाहिद।

G.S. Sir।

अतुल

सेंटी

आशु

एक मेरी बहुत ख़ास दोस्त —-मोटी

और वे तमाम लोग जो जिंदगी के अलग-अलग स्टेशनों पर हमारे साथ जुड़े थे।

कोई बालों की सफेदी पर मजाक करे।

और ,कोई पुराना किस्सा शुरू करे।

कोई कहे—

“यार, तू बिल्कुल नहीं बदला।”

और सब जानते हैं कि हम सब बहुत बदल चुके हैं।

फिर अचानक दरवाज़ा खुले।

और बिन्नू अंदर आए।

वही अंदाज।

और ,वही उत्साह।

वही दोस्ती का जुनून।

और शिकायत करे—

“इतने दिनों बाद मिले हो? तुम लोगों से दोस्ती निभाई नहीं जाती!”

शायद हम हँसेंगे।

और ,शायद कोई कुछ नहीं बोलेगा।

शायद आँखें भीग जाएँगी।

और फिर कोई कहेगा—

“चल बिन्नू, आज चाय तू पिला।”

काश जिंदगी में कुछ शामों के लिए Replay का button होता।

हालांकि la gardinia खुल गया है , लेकिन महफिलें बदल गईं हैं , चेहरे बदल गए हैं —–लेकिन दोस्त हमेशा रहते हैं

Friendship Day अब मेरे लिए क्या है?

अब Friendship Day wristband का दिन नहीं रहा।

न केवल Facebook post का।

न WhatsApp forward का।

मेरे लिए यह दिन अब हाजिरी लगाने का दिन है।

यादों की हाजिरी।

राजेंद्र—हाजिर।

अनिल—हाजिर।

प्रेम—हाजिर।

बिज्जू—हाजिर।

ज्ञान—हाजिर।

मुशाहिद—हाजिर।

G.S. Sir—हाजिर।

सेंटी , आशू—हाजिर।

वे तमाम दोस्त जिनके नाम इस लेख में नहीं लिख पाया—हाजिर।

और बिन्नू?

वह भी हाजिर।

क्योंकि कुछ लोगों की हाजिरी जिंदगी नहीं लगाती।

यादें लगाती हैं।

बिन्नू, तुम्हारे नाम…

आज Friendship Day पर तुम्हारी याद कुछ ज्यादा आ रही है।

तुमने शायद हमें यह सिखाया था कि दोस्त इकट्ठा करना आसान है, लेकिन दोस्ती को जीवित रखना एक जुनून मांगता है।

La Gardenia बंद हो गया।

महफ़िलें बिखर गईं।

जिंदगी सबको अलग-अलग दिशाओं में ले गई।

कुछ दोस्त पास हैं।

कुछ दूर।

और ,कुछ केवल फोन में।

कुछ केवल तस्वीरों में।

और कुछ केवल दिल में।

लेकिन तुम्हारी बनाई हुई उस दोस्ती की दुनिया का थोड़ा-सा हिस्सा शायद हम सबके भीतर आज भी बचा हुआ है।

कभी किसी पुराने दोस्त का फोन आता है तो लगता है कि वह दुनिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

और ,कभी पुरानी तस्वीर मिलती है तो La Gardenia फिर आबाद हो जाता है।

कभी कोई पुराना किस्सा छिड़ता है—

और तुम फिर हमारे बीच बैठ जाते हो।

और अंत में… उन सभी दोस्तों के नाम

“दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त,
दोस्त मिलता है बड़ी मुश्किल से।”
— हफ़ीज़ होशियारपुरी

आज Friendship Day पर उन लोगों को याद कर रहा हूँ जिन्होंने मेरी जिंदगी के किसी न किसी हिस्से को खूबसूरत बनाया।

उन दोस्तों को जो आज भी फोन उठाते हैं।

उनको जिनसे अब कभी-कभार बात होती है।

उनसे जिनकी वर्षों से बात नहीं हुई।

उनसे रास्ते बिना किसी शिकायत के अलग हो गए।

उन छोटे भाइयों जैसे दोस्तों को जो बाद में जिंदगी में आए।

उन बुजुर्ग और वरिष्ठ साथियों को जिनके रिश्ते में दोस्ती भी थी और स्नेह भी।

और उन सबको भी जिनका नाम यहाँ लिखना संभव नहीं, मगर जिनकी कोई न कोई याद मन की किसी अलमारी में आज भी सुरक्षित रखी है।

और सबसे बढ़कर—

बिन्नू के नाम।

उस दोस्त के नाम जिसने दोस्ती को सिर्फ निभाया नहीं, जुनून की तरह जिया।

आज La Gardenia नहीं है।

वह पुरानी महफ़िल भी नहीं है।

हम भी वैसे नहीं रहे।

समय आगे निकल गया है।

लेकिन कभी-कभी किसी शांत शाम में लगता है कि जिंदगी की सारी भागदौड़ के पीछे से पुराने दिनों की आवाज आ रही है—

“यार, आज सब मिलते हैं…”

और दिल जवाब देता है—

“हाँ, बिन्नू… मिलते हैं।
बस एक बार फिर वही पुरानी महफ़िल सजा दो।”

Happy Friendship Day, मेरे दोस्त।

कुछ दोस्त जिंदगी से चले जाते हैं…
मगर हमारी जिंदगी में उनका हिस्सा कभी नहीं जाता।

Friendship Day

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