Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

पुरानी अलमारी के वो रंगीन पन्ने: नंदन, चंपक और बचपन की बेफ़िक्र दुनिया 90 के दशक की बेफ़िक्र ज़िंदगी — जब न कल की चिंता थी, न आज का हिसाब, बस दोपहरें थीं और खुला हुआ आसमान। दृश्य खुलता है एक तपती दोपहर से। बहराइच की गलियाँ सूनी हैं, कुत्ते छाँव में लेटे हैं, और…

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90s नास्टॉल्जिक इंडिया -भाग 3

90s नॉस्टैल्जिक इंडिया
बहराइच घंटाघर की फोटो 
क्रेडिट: facebook

पुरानी अलमारी के वो रंगीन पन्ने: नंदन, चंपक और बचपन की बेफ़िक्र दुनिया

90 के दशक की बेफ़िक्र ज़िंदगी — जब न कल की चिंता थी, न आज का हिसाब, बस दोपहरें थीं और खुला हुआ आसमान।

फ़िराक़ गोरखपुरी

“रात यूँ दिल में तेरी खोई हुई याद आई,
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए।”

दृश्य खुलता है एक तपती दोपहर से।

बहराइच की गलियाँ सूनी हैं, कुत्ते छाँव में लेटे हैं, और घर के अंदर पंखे की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं सुनाई देता। तभी एक पुरानी लकड़ी की अलमारी खुलती है — चरचराती हुई, जैसे वह भी बरसों बाद अपनी कहानी सुनाना चाहती हो। अंदर से आती है काग़ज़ की वह पुरानी महक, जो किसी इत्र से कम नहीं।

यही वह पल है, जहाँ से 90 के दशक की बेफ़िक्र ज़िंदगी की असली कहानी शुरू होती है।

पुरानी अलमारी का जादू

दृश्य: दोपहर, घर का बरामदा, धूप की एक पतली लकीर फ़र्श पर

उस अलमारी के हर ख़ाने में एक अलग दुनिया बसती थी। एक तरफ़ रखी थीं नंदन की चमकीली प्रतियाँ, दूसरी तरफ़ पराग के पुराने अंक, और सबसे नीचे, थोड़ा मुड़ा-तुड़ा, चंपक का एक अंक जिसका कवर पहले ही फट चुका था। हम भाई-बहन बारी-बारी उन्हें निकालते, मानो कोई ख़ज़ाना खोल रहे हों। किसी को चाचा चौधरी और साबू की ताक़त पसंद थी, तो किसी को बिल्लू और पिंकी की शरारतें।

किताबें नहीं… हमारी पहली उड़ान थीं

आज बच्चों के पास टैबलेट हैं।

हमारे पास नंदन थी।

आज वीडियो गेम हैं।

हमारे पास पराग थी।

आज यूट्यूब है।

हमारे पास चंपक, लोटपोट, बालहंस और सुमन सौरभ थीं।

उन रंगीन पन्नों पर छपी कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करती थीं।

वे हमें उड़ना सिखाती थीं।

कभी हम तेनालीराम बन जाते।

और कभी बीरबल।

कभी जंगल के किसी बहादुर बच्चे के साथ रोमांचक यात्रा पर निकल पड़ते।

और कभी किसी ऐसी कहानी में खो जाते, जहाँ अंत में हमेशा अच्छाई की जीत होती थी।

शायद इसीलिए…

हमने उम्मीद करना कभी नहीं छोड़ा।

न कोई स्क्रीन टाइम की चिंता थी, न कोई टाइमर। बस एक अलमारी, कुछ पुराने पन्ने, और दोपहर भर की बेफ़िक्री।

बहराइच की वह छोटी-सी किताबों की दुकान

बहराइच में पहले कई दिनों तक कोई किताब की दूकान नहीं थी. किताबें लेनी हो तो स्टेशन पर व्हीलर की दूकान थी जो केवल ट्रेन के आने के समय ही खुलती थी. और ऐसा मौका काम मिलता जब वो हमें खुली मिले क्योंकि बहराइच जैसे छोटे से स्टेशन पर केवल गिनी-चुनी ट्रेनें उस वक़्त आतीं थीं। स्टेशन था भी शहर के बाहर- रात को जब हम कभी कानपूर से आते तो रास्ते में पड़ने वाले कब्रिस्तान के सामने से गुजरते हुए अपने बड़ों की गोद में मुँह छिपा लेते – मानों अब कुछ नहीं होगा।

और आज भी बहराइच की एक पुरानी किताबों की दुकान आज भी मेरी स्मृतियों में वैसी ही खड़ी है।

बाद में एक दूकान किताबों की खुली – कांग्रेस भवन के प्रांगण में -पक्के तालाब पर.
इसके मालिक थे सुरेश चंद्र गुप्ता जी। ….बाद में हम वहां पर परमानेंट कस्टमर बन गए. ये दूकान शायद अब भी है – गुप्ता जी के बच्चों के पास।

वहां पर किताबें सामने बिछीं रहतीं थीं – कुछ बण्डल जो अभी-अभी आये थे और खुले नहीं थे – इतने सेक्सी लगते कि मन करता की सारी किताबें उठा कर ले जाएं।

ऊपर लटकता पंखा।

गुप्ता जी सभी का नाम जानते थे क्योंकि बहराइच एक छोटा सा शहर था और सभी लोग लगभग सभी को जानते थे.

मैं हर महीने जेब में सावधानी से रखे कुछ रुपये लेकर वहाँ पहुँचता।

दुकानदार मुस्कुराकर पूछते—

“इस बार नंदन चाहिए… या पराग?”

और मैं…

दोनों लेना चाहता था।

लेकिन जेब केवल एक की इजाज़त देती थी।

उस दिन जो पत्रिका नहीं खरीद पाता…

उसे अगले महीने तक दुकान के काँच के पार से ही देखता रहता।

आज हजारों ई-बुक्स एक क्लिक पर मिल जाती हैं।

लेकिन उस अधूरी इच्छा का जो आनंद था…

वह शायद सुविधा कभी नहीं दे सकती।

किताबों का एक और जरिया

किताबों का एक और जरिया था – साइकिल पर अखबार और किताबें देने वाले पंडित जी – इतनी ख़ुशी तो हमें बाद में आज तक -किसी लड़की को भी देख कर नहीं होती थी -जितनी उन्हें उस समय देखने पर होती – क्योंकि उनके झोले में उस समय की ढेर सारी किताबें होती थी और फिर हम बाबाजी और मुन्नू चाचा से जिद कर खूब सारी किताबें खरीदते थे.

धर्मयुग… जब घर का सबसे सम्मानित मेहमान एक पत्रिका होती थी

रविवार की दोपहर।

पिताजी आरामकुर्सी पर बैठे हैं।

सामने चाय का कप।

हाथ में धर्मयुग।

माँ के पास सरिता।

चाचा Illustrated Weekly के पन्ने पलट रहे हैं।

और मैं…

नंदन के चित्र देख-देखकर अपनी दुनिया बना रहा हूँ।

आज सोचता हूँ—

एक ही घर में इतने लोग थे।

और ढेर सारीअलग-अलग पत्रिकाएँ थीं।

लेकिन बातचीत एक ही थी।

आज कई मोबाइल हैं।

और शायद बातचीत सबसे कम है।

माधुरी… और सिनेमा से पहला प्रेम

फ़िल्में केवल सिनेमाघरों में नहीं रहती थीं।

वे हर महीने माधुरी जैसी पत्रिकाओं के साथ घर आती थीं।

अमिताभ बच्चन की नई फ़िल्म।

श्रीदेवी की मुस्कान।

माधुरी दीक्षित का नया फ़ोटोशूट।

अनिल कपूर का इंटरव्यू।

हम घंटों उन तस्वीरों को देखते रहते।

सिनेमा तब केवल मनोरंजन नहीं था।

वह कल्पना था।

सपना था।

एक ऐसी दुनिया…

जहाँ हर कहानी का अंत उम्मीद से होता था।

किताबों की खुशबू… जिसे कोई स्क्रीन नहीं दे सकती

क्या आपने कभी नई किताब के पन्ने खोलकर उसकी खुशबू महसूस की है?

वह खुशबू…

स्याही की नहीं होती।

वह भविष्य की होती है।

हर नया पन्ना कहता था—

“आओ…

मैं तुम्हें कहीं दूर ले चलता हूँ।“

मोबाइल स्क्रीन रोशनी देती है।

लेकिन किताबें…

कल्पना देती हैं।

पढ़ना… केवल आदत नहीं, संस्कार था

मुझे याद है…

दादी अक्सर कहती थीं—

“जो बच्चा किताबों से दोस्ती कर लेता है, वह कभी अकेला नहीं रहता।”

तब शायद यह बात समझ नहीं आती थी।

आज आती है।

क्योंकि किताबें केवल जानकारी नहीं देतीं।

वे हमारे भीतर एक दूसरा संसार बना देती हैं।

जब पुस्तक मेले का इंतज़ार होता था

आज “सेल” का इंतज़ार होता है।

तब पुस्तक मेले का।

नए संस्करण आने वाले हैं।

कौन-सी नई कहानी होगी?

कौन-सा नया चित्र?

हम किताब खरीदकर उसी दिन पूरी पढ़ डालते।

फिर कई बार पढ़ते।

और फिर छोटे भाई को देते।

फिर पड़ोसी को।

एक पत्रिका पूरे मोहल्ले की हो जाती।

ज्ञान भी साझा होता था।

खुशी भी।

“उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में,
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते।”

— बशीर बद्र

क्या सचमुच किताबें कम हो गईं… या हमारी फुर्सत?

लोग कहते हैं—

आज बच्चे पढ़ते नहीं।

मुझे लगता है…

समस्या बच्चों में नहीं।

समस्या समय में है।

हमने उन्हें हर चीज़ दी।

लेकिन खाली दोपहरें नहीं दीं।

हमने उन्हें इंटरनेट दिया।

लेकिन कहानी सुनाने वाला दादा नहीं दिया।

हमने उन्हें टैबलेट दिया।

लेकिन “एक पन्ना और पढ़ लो” कहने वाली माँ नहीं दी।

कभी-कभी लगता है…

हम नंदन को नहीं ढूँढ़ रहे।

हम उस बच्चे को ढूँढ़ रहे हैं…

जो हर नई कहानी पढ़कर सोचता था—

“एक दिन मैं भी ऐसी कहानी लिखूँगा।”

शायद…

उसी बच्चे ने आज यह लेख लिखने के लिए मेरा हाथ पकड़ा है।

और शायद…

आपके भीतर बैठा वही बच्चा यह लेख पढ़ते-पढ़ते मुस्कुरा रहा है।

दोपहर की नींद के बाद की दुनिया

गर्मियों की छुट्टियों में दोपहर की एक अनिवार्य नींद हुआ करती थी — जिससे बचना लगभग नामुमकिन था।

लेकिन जैसे ही आँख खुलती, एक अलग ही दुनिया इंतज़ार करती।

न होमवर्क की फ़िक्र, न कल की योजना —

बस यह सोचना कि आज कौन सा खेल खेला जाए।

यही वह बेपरवाह बचपन था, जिसमें हर दिन अपने आप में पूरा था।

चाचा चौधरी, साबू और वो सुपरहीरो जिन्हें कोई केप की ज़रूरत नहीं थी

90s नास्टॉल्जिक इंडिया

चाचा चौधरी का दिमाग़ कंप्यूटर से तेज़ चलता था, और साबू की ताक़त पूरे मोहल्ले की चर्चा का विषय होती थी।

नंदन में छपी कहानियाँ हमें नैतिकता सिखातीं, तो चंपक की चुटकुलेबाज़ी हमें दिन भर हँसाती रहती। ये किरदार केवल कॉमिक्स के पन्नों में नहीं रहते थे — वे हमारी कल्पना में जीते थे, हमारे खेलों में उतरते थे, और हमारी बातचीत का हिस्सा बनते थे।

शायद यही वजह है कि आज भी ‘नंदन पराग चंपक‘ का नाम सुनते ही एक मुस्कान अपने आप चेहरे पर आ जाती है —

यह सिर्फ़ कॉमिक्स नहीं, हमारे बेफ़िक्र बचपन की पहचान थी।

90s नास्टॉल्जिक इंडिया -भाग 3

गली के खेल, जहाँ हार-जीत से बड़ी थी हँसी

दृश्य: शाम ढलते ही, गली का खुला मैदान, धूल भरी ज़मीन

गिल्ली-डंडा, कंचे, लंगड़ी, पकड़म-पकड़ाई —

इन खेलों के लिए किसी मैदान की ज़रूरत नहीं थी, बस एक गली और कुछ दोस्त काफ़ी होते थे। घुटनों पर लगी खरोंचें किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं लगती थीं। कोई हार पर रोता नहीं था, कोई जीत पर घमंड नहीं करता था —

क्योंकि खेल का मक़सद जीतना नहीं, साथ रहना था।

न कोई स्कोरबोर्ड था, न कोई रैंकिंग। बस एक बेफ़िक्र हंसी थी, जो शाम ढलने तक गली में गूँजती रहती थी।

अहमद फ़राज़

“रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ,
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।”

नानी के घर की छुट्टियाँ

गर्मियों की छुट्टियाँ यानी बक्सा पैक करना और नानी के घर की ट्रेन पकड़ना। वहाँ पहुँचते ही समय जैसे धीमा पड़ जाता। आम के बगीचे, कुएँ का ठंडा पानी, और रात को छत पर लेटकर तारे गिनना — यह सब किसी योजना का हिस्सा नहीं था, बस स्वाभाविक रूप से होता चला जाता था। मामा-मामी की डाँट भी उतनी ही प्यारी लगती जितनी नानी के हाथ की बनी खीर।

रेडियो के गाने और दूरदर्शन का इंतज़ार

90s नास्टॉल्जिक इंडिया -भाग 3
दूरदर्शन

शुक्रवार की शाम पूरे मोहल्ले में एक अलग ही उत्साह होता — चित्रहार का समय जो होने वाला था। पूरा परिवार एक ही टीवी के सामने बैठता, और विज्ञापन के दौरान भी कोई चैनल नहीं बदलता, क्योंकि चैनल था ही एक।

रेडियो पर बजते पुराने गाने घर के काम-काज के साथ बजते रहते, और वही धुनें आज भी सुनते ही सीधे उस दौर में ले जाती हैं।

जेब में एक रुपया और दिल में पूरी दुनिया

90s नास्टॉल्जिक इंडिया -भाग 3

उस दौर की सबसे बड़ी दौलत क्या थी? जेब में रखा एक रुपया, जिससे या तो पाँच टॉफ़ी आतीं या एक बर्फ़ का गोला। पैसों की कोई बड़ी चिंता नहीं थी, क्योंकि ज़रूरतें भी उतनी बड़ी नहीं थीं। सपने ज़रूर बड़े थे — क्रिकेटर बनने के, पायलट बनने के — लेकिन उन सपनों पर किसी दबाव का बोझ नहीं था।

बस जीना था, हँसना था, और अगले खेल की योजना बनानी थी।

छत पर बीती वो शामें और दोस्तों की टोली

याद है वह शाम, जब पूरी टोली छत पर पतंग उड़ाने जुटी थी। किसी की पतंग कट गई, तो पूरी गली में “वो काटा!” की आवाज़ें गूँज उठीं। हम दौड़ पड़ते कटी पतंग के पीछे, बिना यह सोचे कि रास्ता कहाँ जा रहा है। न कोई मंज़िल तय थी, न कोई हिसाब — बस भागना था, हँसना था, और शाम ढलते-ढलते घर लौट आना था।

“वो कटी पतंग के पीछे भागना, वो गिरना, वो हँसना,
वो बेफ़िक्र दोपहरें अब कहाँ, बस यादों में हैं बसना।”

क्या हम वो बेफ़िक्री कहीं खो बैठे?

Nostalgia is a beautiful kind of ache.”

आज हमारे पास सुविधाएँ अनगिनत हैं, लेकिन वह बेपरवाह हँसी कहीं गुम हो गई है। हम व्यस्त हैं, ज़िम्मेदार हैं, सफल भी हैं —

लेकिन शायद उतने बेफ़िक्र नहीं। कभी-कभी लगता है, काश कोई पुरानी अलमारी फिर से खुले, और उसमें से वही महक निकले, जो हमें बिना किसी शर्त के हँसना सिखाती थी।

शायद यही सबसे बड़ा सबक है इस दौर का —

खुशी के लिए बड़ी चीज़ों की ज़रूरत नहीं होती, बस एक बेफ़िक्र दोपहर काफ़ी होती है।

हरिवंश राय बच्चन

“जो बीत गई सो बात गई।“

यह सफ़र जारी है…

90 का दशक कभी गया ही नहीं — यह सिर्फ़ एक कहानी नहीं, हम सबकी साझा स्मृति है। अगर आपके भी बचपन में कोई ऐसी अलमारी, कोई ऐसा दोस्त या कोई ऐसी दोपहर रही हो, तो उसे याद कीजिए — और उस मुस्कान को फिर से जीने दीजिए।

क्या आपको अपनी पहली “नंदन”, “पराग”, “चंपक” या “धर्मयुग” याद है?

क्या आपको वह दिन याद है जब डाकिया नई पत्रिका लेकर आता था? या वह छोटी-सी किताबों की दुकान, जहाँ काँच की अलमारी के पीछे रखी पत्रिकाओं को देखकर आप सोचते थे—“इस बार यही लूँगा…”?

शायद आपके पास भी कोई ऐसी कहानी होगी…

  • पहली खरीदी हुई पत्रिका की।
  • किसी पसंदीदा कहानी की।
  • उस किरदार की, जिसे आपने अपना दोस्त मान लिया था।
  • या उस किताब की, जिसने आपको पहली बार सपने देखना सिखाया।

अपनी वह याद नीचे कमेंट में ज़रूर लिखिए।
याद रखिए, आपकी एक छोटी-सी स्मृति किसी और के बचपन का सबसे खूबसूरत दरवाज़ा बन सकती है।

❤️ अगर इस लेख ने आपको काग़ज़ के उन पुराने पन्नों की खुशबू फिर से महसूस करा दी हो, तो इसे अपने भाई-बहनों, बचपन के दोस्तों और परिवार के साथ साझा कीजिए। शायद वे भी मुस्कुराते हुए कह उठें—

“अरे… यही तो हमारा बचपन था!”

📚 “90 का दशक कभी गया ही नहीं…” श्रृंखला के अगले भाग में हम लौटेंगे रसना, कैंपा कोला, गोल्ड स्पॉट, रूह अफ़ज़ा, मीठी पान-सुपारी, संतरे की टॉफ़ियों और गर्मियों की उन दोपहरों में, जिनका स्वाद आज भी हमारी यादों में ताज़ा है।

✨ जुड़े रहिए Wandering with Nikhil के साथ…

क्योंकि कुछ किताबें बंद हो जाती हैं, लेकिन उनकी कहानियाँ कभी ख़त्म नहीं होतीं।
और कुछ बचपन बीत जाते हैं… लेकिन दिल से कभी जाते नहीं।

मार्सेल प्रूस्त

“The real voyage of discovery consists not in seeking new landscapes, but in having new eyes.”

हिंदी भावार्थ:
“नई जगहें खोज लेना ही खोज नहीं है; कभी-कभी पुरानी दुनिया को नई आँखों से देखना ही सबसे बड़ी खोज होती है।”


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