बहराइच के एक छोटे से स्टेशन से लेकर 9o का दशक के उस रविवार सुबह की खामोशी तक, जिसे सिर्फ रामायण की शंख-ध्वनि तोड़ती थी — यह नब्बे के दशक की एक निजी, बेझिझक भावुक सैर है, उस दशक की जो फीका पड़ने से इंकार करता है।

कुछ दशक कैलेंडर में खत्म हो जाते हैं… कुछ दिलों में हमेशा जीवित रहते हैं।”
“वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा…”
— कैफ़ी आज़मी
शाम ढल रही थी।
लखनऊ की सड़कें हमेशा की तरह व्यस्त थीं। गाड़ियों का शोर, मोबाइल की घंटियाँ, हड़बड़ी में भागते लोग, हर किसी की नज़र किसी स्क्रीन पर टिकी हुई।

मैं चाय की एक छोटी-सी दुकान पर बैठा था।
चायवाले के रेडियो से अचानक एक पुराना गीत बज उठा—
“ये कहाँ आ गए हम…”
एक पल के लिए लगा जैसे समय ने अपनी रफ़्तार रोक दी हो।
मैंने सामने बैठे एक छोटे बच्चे को देखा। उसकी उँगलियाँ मोबाइल स्क्रीन पर इतनी तेज़ चल रही थीं कि शायद उसे यह भी पता नहीं था कि कभी रविवार की सुबहें मोबाइल से नहीं, दूरदर्शन के लोगो और उस परिचित धुन से शुरू होती थीं।
उसी क्षण मन ने धीरे से कहा—
“90 का दशक कहीं गया ही नहीं… वह तो बस हमारे भीतर रहने चला गया है।”
9o का दशक के बहराइच की एक रविवार सुबह
बहराइच जैसे छोटे शहर में रविवार की सुबह का एक अपना ही मिज़ाज होता था। नौ बजते-बजते पूरी गली किसी अनकहे समझौते से खामोश हो जाती थी। दूधवाला भी जल्दी निकल जाता, सब्ज़ी वाला ठेला भी थोड़ी देर के लिए रुक जाता — क्योंकि रामायण शुरू होने वाली होती थी, और उसके बाद महाभारत। घर के बड़े-बुज़ुर्ग नहा-धोकर, अगरबत्ती जलाकर टीवी के सामने आ बैठते, और हम बच्चे, अनमने ही सही, चुपचाप उनके पास बैठ जाते।

उस एक घंटे में पूरा मोहल्ला मानो एक ही सांस ले रहा होता था। बगल वाले घर से भी वही थीम म्यूज़िक सुनाई देता, सामने वाले छज्जे से भी। किसी टीवी पर तस्वीर हिलती तो एंटीना को घुमाने के लिए कोई न कोई छत पर भागता — और नीचे से आवाज़ आती, “बस, बस, अब ठीक आ रहा है!” यह इतना मामूली-सा दृश्य था, पर आज सोचता हूं तो लगता है, हमने बिना जाने ही एक पूरा शहर एक साथ सांस लेते देखा था।
और फिर आता चित्रहार का बुधवार, या रविवार शाम की वह एक फिल्म जिसके लिए स्कूल का होमवर्क पहले ही निपटा लिया जाता। शक्तिमान का आना तो किसी त्योहार से कम नहीं था — हम बच्चे अपने-अपने ढंग से उसकी वह गोल घूमने वाली मुद्रा अपनाने की कोशिश करते, आंगन में कूदते हुए यह मानते कि हम में भी कहीं न कहीं वही शक्ति छिपी है। नए साल के दिन दूरदर्शन पर आने वाला विशेष कार्यक्रम भी एक रस्म जैसा था — पूरा परिवार साथ बैठकर देखता, मानो साल की शुरुआत उसी से हो रही हो।
9o का दशक के यही वह सुबहें थीं, यही वो शामें, जिन्होंने बिना बताए हमें सिखाया कि इंतज़ार करना कैसे किया जाता है, और साथ बैठना क्यों मायने रखता है।
घर नहीं… पूरा मोहल्ला जागता था
आज रविवार का मतलब है—देर तक सोना, ओटीटी पर कोई वेब सीरीज़ और फिर पूरा दिन कब निकल जाता है, पता ही नहीं चलता।
लेकिन एक समय था…
रविवार केवल रविवार नहीं होता था।
वह पूरे भारत का साझा उत्सव होता था।
सुबह-सुबह नहाकर तैयार हो जाना।
माँ रसोई में चाय और गरम-गरम पराँठे बना रही हैं।
पिताजी अख़बार के पहले पन्ने पर नज़र डाल रहे हैं।
दादी तुलसी को जल चढ़ाकर जल्दी-जल्दी बैठक में आ रही हैं।
और फिर…
टीवी के सामने बिछी दरी पर पूरा परिवार।
कई घरों में तो टीवी भी नहीं होता था।
पड़ोस वाले शर्मा जी के घर पूरे मोहल्ले का जमावड़ा लग जाता।
बच्चे आगे।
बुज़ुर्ग चारपाई पर।
और जैसे ही दूरदर्शन का चिह्न घूमता…
पूरा कमरा शांत हो जाता।
फिर बजती वह दिव्य धुन…
और शुरू होती रामानंद सागर की “रामायण”।
कहते हैं, उन दिनों सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था।
दुकानदार भी दुकान थोड़ी देर से खोलते थे।
बसों के ड्राइवर समय देखकर निकलते थे।
और कई जगह लोग टीवी के सामने अगरबत्ती जलाकर बैठते थे।
आज सोचता हूँ—
क्या सचमुच वह केवल एक धारावाहिक था?
या वह पूरे देश की धड़कन था?
फिर आया महाभारत… और हर बच्चा अर्जुन बन गया
9o का दशक के रामायण के बाद जब महाभारत आया, तो हर रविवार एक नया प्रश्न छोड़ जाता।
धर्म क्या है?
कर्तव्य क्या है?
सत्य किसके साथ है?
हमें तब दर्शनशास्त्र नहीं आता था।
लेकिन भीष्म की प्रतिज्ञा, कर्ण का दान, अर्जुन का संशय और कृष्ण की मुस्कान… जाने कैसे मन में बसते चले गए।
शायद कहानियाँ ही मनुष्य को मनुष्य बनाती हैं।
चित्रहार आने वाला है… जल्दी खाना खा लो!
सप्ताह का एक और उत्सव था—चित्रहार।
माँ की आवाज़ आज भी कानों में गूँजती है—
“जल्दी खाना खा लो… चित्रहार शुरू होने वाला है।”
उस समय किसी के पास रिमोट नहीं था।
चैनल बदलने का प्रश्न ही नहीं था।
जो आ रहा था, वही पूरी श्रद्धा से देखा जाता था।
और शायद इसी कारण उसका आनंद भी पूरा मिलता था।
एक गीत ख़त्म होता तो अगले गीत का इंतज़ार होता।
इंतज़ार…
आज की दुनिया का सबसे खोया हुआ शब्द।
नया साल… और दूरदर्शन की रात
आज नए साल का मतलब है—इंस्टाग्राम स्टोरी।
9o का दशक के नए साल का मतलब था—
दूरदर्शन का विशेष कार्यक्रम।
फ़िल्मी सितारों का मंच।
हँसी।
गीत।
नृत्य।
और रात के बारह बजते ही घर में सबका एक-दूसरे को गले लगाना।
कोई सेल्फ़ी नहीं।
कोई लाइव स्ट्रीम नहीं।
फिर भी यादें आज तक ज़िंदा हैं।
बहराइच… जहाँ समय थोड़ा धीरे चलता था
मेरा शहर—बहराइच।
छोटा-सा शहर।
धीमी चाल।
कम ट्रैफ़िक।
ज़्यादा अपनापन।
गर्मी की छुट्टियों में सुबह-सुबह साइकिल लेकर निकल जाना।
कभी घंटाघर की ओर।
कभी बाज़ार।
कभी रेलवे स्टेशन।
और कभी यूँ ही बिना किसी मंज़िल के।
क्योंकि उन दिनों हर रास्ता किसी कहानी तक पहुँचता था।
आज गूगल मैप रास्ता दिखा देता है।
तब लोग रास्ते नहीं…
लोग इंसान ढूँढ़ते थे।
रेलवे स्टेशन… जहाँ यात्रा गंतव्य से ज़्यादा याद रहती थी
बहराइच रेलवे स्टेशन…
आज भी उसकी सीटी सुनता हूँ तो भीतर कुछ काँप जाता है।
प्लेटफ़ॉर्म पर लाल कमीज़ वाले कुली।
स्टील के बड़े-बड़े ट्रंक।
रस्सी से बँधे बिस्तर।
माँ के हाथ का बना पराँठा और आम का अचार।
सुराही का ठंडा पानी।
और डिब्बे में बैठते ही वही आवाज़—
“चाय… गरम चाय…”
ट्रेनें अक्सर देर से आती थीं।
यात्रा लंबी होती थी।
भीड़ इतनी कि बैठने की जगह भी मुश्किल से मिलती।
हमारी नौबत कभी उस समय जनरल डिब्बे में चढ़ने की नहीं आयी. क्योंकि हमारे बाबा हमें कानपुर हमेशा फर्स्ट क्लास में भेजते थे. उस समय रेलवे में फर्स्ट, सेकंड एंड थर्ड क्लास का डिब्बा होता था. फर्स्ट क्लास में अधिकतर हम और हमारे बाबाजी लगभग अकेले ही सफर करते थे. क्योंकि ये बडा महंगा था।
सफर लंबा होता, कभी-कभी बहुत लंबा — रुक-रुक कर चलती ट्रेन, हर छोटे स्टेशन पर चाय और मूंगफली बेचने वालों की आवाज़ें, और डिब्बे में भरी भीड़ के बीच किसी अजनबी से यूं दोस्ती हो जाना जैसे बरसों की पहचान हो। कुल्हड़ की चाय की वह मिट्टी की खुशबू, और सफर खत्म होते-होते हाथ में बचा वही टूटा हुआ कुल्हड़ — यह सब आज भी उतना ही ताज़ा है जितना उस दिन था।
स्कूल और कॉलेज के दिन भी इसी सफर की तरह थे — धीमे, भीड़ भरे, पर हर पल में कुछ न कुछ याद रखने लायक। साइकिल से स्कूल जाना, इम्तिहान से पहले रात भर जागकर पढ़ना, दोस्तों के साथ छुट्टी की घंटी बजते ही मैदान की तरफ भागना — यह सब भी उतना ही अनमोल था जितना कोई बड़ी यात्रा।
“वह सफर लंबा ज़रूर था, पर उसमें एक अपनापन था — भीड़ में भी, इंतज़ार में भी। शायद इसीलिए आज की तेज़, आरामदायक यात्रा में भी वह बात नहीं मिलती।”
लेकिन अजीब बात है…
कोई शिकायत याद नहीं।
क्योंकि सफ़र में लोग मिलते थे।
कहानियाँ मिलती थीं।
एक डिब्बा अनजान लोगों का होता था…
और उतरते-उतरते सब एक-दूसरे के परिचित बन जाते थे।
आज विमान हमें जल्दी पहुँचा देते हैं।
लेकिन क्या वे हमें उतनी कहानियाँ भी देते हैं?
नंदन, पराग और डाकिये का इंतज़ार
अगर टीवी हफ्ते का शेड्यूल तय करता था, तो पत्रिकाएं महीने का। नंदन और पराग आने का दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता — नई कहानियां, नए चुटकुले, और पन्ना पलटते ही वह खास स्याही की गंध। दीवाना और धर्मयुग बड़ों की मेज़ पर होते, इलस्ट्रेटेड वीकली और माधुरी को हम चोरी-छुपे पढ़ने की कोशिश करते, यह जानते हुए भी कि कुछ पन्ने “बड़ों के लिए” हैं। हिन्दुस्तान अखबार सुबह-सुबह दरवाज़े के नीचे से सरकता, और उसके साथ आने वाला रविवासरीय परिशिष्ट पूरे हफ्ते संभाल कर रखा जाता।
उस समय किताबें या तो रेलवे स्टेशन पर व्हीलर के यहाँ मिलतीं थी या फिर अखबार देने वाले पंडित जी तरह -तरह की किताबें और मैग्जींस रखते थे. सही बात बोलूं , पंडित जी को देख कर उस समय जो खुशी मिलती थी वो कभी बाद में अपनी गर्लफ्रेंड को भी देख कर नहीं मिली। और फिर किताबें लेने के बाद तो अपनी सुध-बुध ही नहीं रहती। केवल किताबें और हम…..बस.
यह सिर्फ पढ़ना नहीं था, यह एक तरह की साझेदारी थी। स्कूल में कोई नई कहानी लेकर आता, तो पूरी कक्षा में वह पत्रिका हाथों-हाथ घूमती, कभी-कभी टूटे हुए पन्नों के साथ, कभी किसी के नाम की मुहर के साथ जो लाइब्रेरी से “उधार” ली गई होती। हर पत्रिका एक खज़ाना थी, और हर खज़ाने को बांटना उतना ही ज़रूरी था जितना उसे पढ़ना।
आज सोचता हूं तो समझ आता है — नॉस्टैल्जिया दरअसल इसी बांटने की आदत की कमी को भरने की कोशिश है। हम आज भी किसी पुरानी पत्रिका के कवर की तस्वीर देखकर रुक जाते हैं, क्योंकि वह सिर्फ कागज़ नहीं, एक पूरा दोपहर वापस ले आती है।
“गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा,
हां, याद का दिया मगर बुझता नहीं दोबारा।“
कैंपा कोला, रसना और गर्मियों का स्वाद

नब्बे के दशक का स्वाद अगर बोतल में बंद करना हो, तो वह कैंपा कोला की वह ठंडी बोतल होगी जो मेले या शादी के भोज में मिलती थी, या रसना का वह पैकेट जो घर में घुलते ही पूरे कमरे को नारंगी खुशबू से भर देता था। गर्मी की दोपहर में रूह अफज़ा का शरबत बनना किसी रस्म जैसा था — गुलाबी रंग, बर्फ के टुकड़े, और मां की आवाज़, “ज़्यादा मत पी लेना, खाना खाने का वक़्त हो गया।” गोल्ड स्पॉट की बोतल किसी खास मौके पर मिलती, और उसे खत्म करने के बाद बोतल को देर तक हाथ में घुमाते रहना भी उतना ही याद है जितना उसका स्वाद।बिन्नू को तो गोल्डस्पॉट बहुत पसंद थी.
खाने के बाद मीठा पान-सुपारी का चलन घर-घर में था। बाबाजी पान की दुकान पर रुककर अपने हिसाब से बनवाते, और लौटते वक़्त हमें भी छोटा-सा टुकड़ा थमा देते। सुपारी की वह हल्की कसैली-मीठी महक आज भी किसी पुराने घर की याद दिला देती है, बिना किसी वजह के।
और फिर… रविवार की दोपहर
रामायण ख़त्म।
महाभारत ख़त्म।
चित्रहार का इंतज़ार अभी दूर।
दोपहर की नींद।
बाहर अमरूद के पेड़ पर चिड़ियों की आवाज़।
आँगन में बिछी चारपाई।
हाथ का पंखा।
और दादी की कहानी—
“एक था राजा…”
आज सोचता हूँ—
हमने तकनीक तो बहुत पा ली…
लेकिन क्या हमने दोपहरें खो दीं?
“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले…”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
शायद ग़ालिब ने यह पंक्ति किसी और संदर्भ में लिखी थी।
लेकिन मुझे लगता है—
हमारी सबसे बड़ी ख़्वाहिश अब वही है…
कि एक बार फिर किसी रविवार की सुबह हो।
दूरदर्शन का लोगो घूमे।
रामायण शुरू हो।
माँ रसोई से आवाज़ दें—
“चाय ठंडी हो जाएगी…”
और हम निश्चिंत होकर कहें—
“अभी आता हूँ…”
क्योंकि तब हमें पता था—
ज़िंदगी कहीं भाग नहीं रही।
नब्बे का दशक आखिर कभी खत्म क्यों नहीं हुआ

शायद इसीलिए नब्बे का दशक कभी खत्म नहीं हुआ, क्योंकि वह सिर्फ एक दशक नहीं था — वह इंतज़ार करने की, साथ बैठने की, और छोटी-छोटी चीज़ों में पूरी खुशी ढूंढ लेने की एक कला थी। रामायण-महाभारत की वह सुबहें, नंदन-पराग का इंतज़ार, कैंपा कोला की वह मीठी घूंट, और बहराइच के उस स्टेशन पर बीता हर लंबा पल — यह सब सिर्फ यादें नहीं, यह हमारे होने का एक हिस्सा हैं।
रेट्रो कल्चर की यह लहर असल में उसी हिस्से को फिर से छूने की कोशिश है। हर बार जब कोई पुराना जिंगल बजता है, कोई पुरानी पत्रिका का कवर दिखता है, या किसी छोटे स्टेशन की सीटी सुनाई देती है, हम फिर से उसी अपनेपन में लौट आते हैं — भले ही कुछ पल के लिए।
तो अगली बार जब कोई ऐसी याद अचानक उभर आए — मां के हाथ का रूह अफज़ा, दादाजी की पान की दुकान, या किसी पुराने स्टेशन की भीड़ — उसे महज बीता हुआ कल मत समझिए। वह आपसे यही कह रही है कि रुकिए, थोड़ा ठहरिए, और महसूस कीजिए कि आप आज भी उतने ही अपने हैं जितने तब थे।
अपनी यादों का प्ले बटन दबाइए
आपके ज़हन में अभी कौन सी याद चली — कोई पत्रिका, कोई स्टेशन, कोई शरबत? इसे कमेंट में साझा कीजिए।
इस कहानी का अगला पड़ाव…
क्या सचमुच 90 का दशक बेहतर था?
या फिर हमारा बचपन?
या फिर हम ही बदल गए?
अगले भाग में हम लौटेंगे स्कूल की घंटियों, टीन के टिफ़िन, बस्तों की महक, प्रार्थना सभा, दोस्तों की शरारतों और उन दिनों की दुनिया में—जहाँ दोस्ती “ऑनलाइन” नहीं, “साथ-साथ” होती थी।
क्योंकि…
90 का दशक केवल एक समय नहीं था।
वह जीने का एक तरीका था।

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