स्कूल की घंटी, टीन का टिफ़िन और वो दोस्त जो आज भी दिल में रहते हैं
80s -90s के दशक का स्कूल जीवन — जहाँ टिफ़िन में प्यार बँटता था और दोस्ती में कोई शर्त नहीं होती थी।

“ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन...”— निदा फ़ाज़ली
कुछ यादें दरवाज़ा खटखटाकर नहीं आतीं। वे चुपचाप किसी गंध के साथ लौटती हैं — कभी नई किताबों की स्याही की महक बनकर, कभी बारिश में भीगी मिट्टी की खुशबू बनकर, तो कभी दूर कहीं बजती स्कूल की घंटी जैसी किसी आवाज़ बनकर। और जैसे ही कोई बच्चा पीठ पर भारी-सा बस्ता लटकाए सड़क पार करता दिखे, मैं अनायास ही बहराइच लौट जाता हूँ।ये है –90s नास्टॉल्जिक इंडिया
वह बहराइच, जहाँ सुबहें अलार्म से नहीं, माँ की आवाज़ से खुलती थीं — “निखिल… उठ जाओ, स्कूल के लिए देर हो जाएगी!” और उसी एक पुकार के साथ शुरू होता था 90 के दशक के बचपन का सबसे प्यारा अध्याय।
90s नास्टॉल्जिक इंडिया-सुबह की वह भाग-दौड़… जो आज सबसे प्यारी लगती है
उस समय सुबहें किसी सैन्य अभियान से कम नहीं होती थीं।
इस्त्री की हुई सफ़ेद कमीज़।
नेवी ब्लू पैंट।
जूते पर चेरी ब्लॉसम की चमक।
गले में टाई, जो अक्सर रास्ते में ढीली हो जाती थी।
माँ आख़िरी बार बाल सँवारतीं।
फिर टिफ़िन बैग में रखतीं—
कभी आलू का पराँठा।
और कभी पूड़ी-सब्ज़ी।
कभी अचार के साथ सूखी रोटी।
और कभी वह मीठी सेवईँ, जो दोस्तों में बाँटने से पहले ही आधी ख़त्म हो जाती थीं।
आज पाँच सितारा कैफ़े हैं।
फूड डिलीवरी ऐप्स हैं।
लेकिन सच कहूँ…
स्टील के गोल टिफ़िन का ढक्कन खुलते ही जो खुशबू आती थी, वह किसी महँगे रेस्तराँ में आज तक नहीं मिली।
प्रार्थना सभा… जहाँ केवल प्रार्थना नहीं, जीवन सीखा जाता था

सुबह की ठंडी हवा।
स्कूल का बड़ा मैदान।
सैकड़ों बच्चे एक साथ कतारों में खड़े।
“लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी…”
या
“हमको मन की शक्ति देना…”
पूरे विद्यालय की आवाज़ एक साथ उठती थी।
उस समय शायद हमें इन शब्दों का अर्थ पूरी तरह समझ नहीं आता था।
लेकिन आज महसूस होता है—
वे गीत केवल प्रार्थनाएँ नहीं थे।
वे चरित्र निर्माण की पहली पाठशाला थे।ये है –90s नास्टॉल्जिक इंडिया
बहराइच की गलियाँ और साइकिलों का कारवाँ

स्कूल से छुट्टी होते ही ऐसा लगता था जैसे पूरा शहर बच्चों का हो गया हो।
साइकिलों की घंटियाँ।
कंधे पर लटकते बस्ते।
रास्ते भर चलती बातें।
किसी को गणित के मास्टर जी की नकल उतारनी होती।
किसी को अगले रविवार की क्रिकेट मैच की योजना बनानी होती।
और कोई बस इस इंतज़ार में होता कि घर पहुँचते ही माँ पूछें—
“आज स्कूल में क्या हुआ?”
आज बच्चे घर पहुँचते ही अपने कमरे में चले जाते हैं।
तब पूरा घर हमारी कहानी सुनने का इंतज़ार करता था। ये है –90s नास्टॉल्जिक इंडिया
पक्की वाली दोस्ती… जिसमें ‘ऑनलाइन’ शब्द नहीं था

हमारे दोस्त मोबाइल की कॉन्टैक्ट लिस्ट में नहीं रहते थे।
वे घर के बाहर सीटी बजाकर बुलाते थे।
अगर किसी दिन दोस्त दिखाई न दे…
तो पूरा मोहल्ला पूछने लगता—
“आज वह आया नहीं?”
न कोई ‘लास्ट सीन’ था।
न कोई ‘ब्लू टिक’।
फिर भी दोस्ती में भरोसा था।
क्योंकि रिश्ते नेटवर्क से नहीं…
नियत से चलते थे। ये है -90s नास्टॉल्जिक इंडिया
बचपन की दोस्ती का सबसे बड़ा सबूत यही था — कोई शर्त नहीं, बस साथ। और शायद इसीलिए, आज इतने साल बाद भी, वह दोस्ती किसी नोटिफ़िकेशन की मोहताज नहीं।
टिफ़िन की राजनीति

स्कूल की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था क्या थी?
टिफ़िन।
जिसके पास आलू के पराँठे होते…
वह आधी छुट्टी का राजा होता।
जिसके घर से आम का अचार आता…
उसकी लोकप्रियता अलग ही होती।
और जिसके टिफ़िन में मिठाई निकल आए…
समझ लीजिए उसके चारों ओर पूरा वर्ग बैठ जाता।
कोई नियम नहीं था।
कोई समझौता नहीं।
फिर भी हर डिब्बा सबका होता था।
शायद बाँटना हमें किताबों से पहले टिफ़िन ने सिखाया। ये है –90s नास्टॉल्जिक इंडिया
शरारतें… जिन पर आज भी मुस्कान आ जाती है
ब्लैकबोर्ड पर मास्टर जी का कार्टून बना देना।
पीरियड ख़त्म होने से पहले ही घंटी बजने की दुआ करना।
होमवर्क भूल जाने पर तरह-तरह के बहाने बनाना।
कक्षा में चॉक के छोटे-छोटे टुकड़े उछालना।
आज सोचता हूँ—
वे शरारतें अनुशासन के विरुद्ध नहीं थीं।
वे बचपन के पक्ष में थीं।
बचपन की शरारतें बड़ी मीठी होती थी. हम सभी अपने टीचर को कई नामों से बुलाते थे -जैसे-
बुग्गा उस्ताद, TNT (T .N. Tripathi ), रघु (रघुराज मिश्रा)-
हाँ- —लेकिन उनके सामने नहीं
कोई मार थोड़े ही खानी थी.
ये है –90s नास्टॉल्जिक इंडिया
रिपोर्ट कार्ड से बड़ा था घर लौटने का रास्ता
सबसे ज्यादा दिक्कत तो तब होती जब monthly test की कॉपी दिखाई जाती, क्योंकि मैथ में हमें या कहो लगभग हम सभी को अधिकतर जीरो ही मिलता, शायद ही एकाद बार एक मिला हो, और वो भी जब क्लास में टीचर जोर से सार्वजनिक रूप से बताते। मन करता था की क्लास से भाग जाएं।
वार्षिक परीक्षा का परिणाम।
दिल की धड़कनें तेज़।
रिपोर्ट कार्ड हाथ में।
घर लौटते हुए मन में सौ सवाल।
पापा और बाबा और चाचा क्या कहेंगे?
माँ नाराज़ होंगी?
लेकिन जैसे ही घर पहुँचते…
मम्मी सबसे पहले यही पूछतीं—
“खाना खाया?”
उस एक प्रश्न में दुनिया की सबसे बड़ी सुरक्षा छिपी थी।
मम्मी कहतीं – कोई बात नहीं बेटा – अगली बार अच्छा करना। हालाँकि वो अच्छा नहीं आता.
ये है –90s नास्टॉल्जिक इंडिया
90s नास्टॉल्जिक इंडिया-दोस्त
हर किसी के जीवन में एक ऐसा मित्र होता है…
जिसके साथ बिताया हुआ समय कभी पुराना नहीं पड़ता।
मेरे जीवन में भी ऐसे मित्र रहे—
जिनके साथ स्कूल की बेंच साझा की…
सपने साझा किए…
हँसी साझा की…
और समय ने चाहे हमें अलग-अलग रास्तों पर भेज दिया…
लेकिन स्मृतियों ने कभी अलग नहीं होने दिया।
कभी-कभी लगता है…
बचपन के दोस्त हमारे जीवन की पहली आत्मकथा होते हैं।
बिन्नू — वह दोस्त जो आज भी साथ है
हर किसी के जीवन में एक ऐसा मित्र होता है जिसके साथ बिताया हुआ समय कभी पुराना नहीं पड़ता। मेरे लिए वह नाम था बिन्नू।
बिन्नू बहराइच में डीएम कालोनी में रहता था, और मैं बीच बाज़ार में। रोज़ सुबह 9 बजे बिन्नू अपनी साइकिल से हमें लेने आ जाते थे और फिर हम दोनों भाई ,( मैं आगे बैठता था ,क्योंकि हमें साइकिल चलना नहीं आता था ) GIC स्कूल में पढ़ने जाते थे. शाम को हम दोनों साथ आते और बिन्नू हमें घर छोड़ कर अपने घर जाता था।ये रोज़ का था।
एक मज़ेदार वाकया याद आता है जब हम 8th क्लास में थे , फिजिक्स का क्लास अभी-अभी ख़त्म हुआ था और टीचर क्लास छोड़ कर बाहर निकले ही थे की एकाएक बिन्नू ने मुंह ऊपर कर जोर -जोर से गाना शुरू किया – “ओ मनचली कहाँ चली” TNT (मेरे फिजिक्स के टीचर) ने जैसे ही सुना , वापस आकर बिन्नू को रंगे हाथ पकड़ लिया , फिर तो उनके कान पकड़ कर वो धुनाई हुई की बस। ..कुछ पूछो मत.
हमने उस समय बहुत सी combined study की है जिसमें हमारे पास ढेरों बातें थी –जैसे की फिल्मों की बातें। पढाई छोड़ कर उसमे और सब कुछ होता था –मस्ती- मस्ती.
शाम को दिलीप भैया (हमें ट्यूशन पढ़ाते थे और हमसे थोड़े बड़े थे और खुद भी डिग्री कालेज में पढ़ते थे ) अपनी साइकिल पर बैठा कर बिन्नू के घर कॉलोनी में जाते और हम दोनों को पढ़ाते ), बहराइच छोटा सा शहर था और डीएम कालोनी शहर के बाहर बनी थी। वहां की सड़कें पतली सी बिलकुल किसी hill station की तरह लगतीं थीं।
फिर पढ़ कर हम वापस दिलीप भैया के साथ लौट आते.
एक बरसाती दोपहर आज भी साफ़ याद है — स्कूल छूटते ही बादल फट पड़े थे, और हम दोनों के पास एक ही साइकिल और एक ही छाता था। बिन्नू ने पैडल मारे, मैंने छाता थामा, और आधे रास्ते तक हम दोनों फिर भी पूरी तरह भीग गए — फिर भी हँसते रहे, मानो बारिश किसी और के लिए हो, हमारे लिए नहीं। परीक्षा के दिनों में वह हमेशा एक दिन पहले पूछता — “तैयारी हो गई?” — और अगर मेरा जवाब “नहीं” होता, तो वह अपनी कॉपी लेकर सीधे मेरे घर आ जाता।
आज बिन्नू को गए हुए चार साल हो गए हैं –लेकिन कोई भी ऐसा क्षण नहीं होता जब हमें उनके उपस्थिति न महसूस हो….रात नींद के आगोश में जाते ही बिन्नू साथ आ जाते हैं और सुबह आँख खुलने के पहले हम न जाने कितनी बातें करते हैं, कितना मस्ती करते हैं , कितना घूमते हैं. उनकी कमीं नहीं लगती।
उनकी उस समय की साइकिल की घंटी याद आती है।
“कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन…”
यह केवल एक फ़िल्मी गीत नहीं।
यह पूरी पीढ़ी की सामूहिक प्रार्थना है।
ये है –90s नास्टॉल्जिक इंडिया
मिर्ज़ा ग़ालिब
“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले…
क्या सचमुच हम बड़े हो गए?
आज हमारे बच्चों के पास टैबलेट हैं।
हमारे पास स्लेट थी।
उनके पास वीडियो कॉल है।
हमारे पास पड़ोस था।
उनके पास क्लाउड स्टोरेज है।
हमारे पास यादें थीं।
समय बदला है।
सुविधाएँ बढ़ी हैं।
लेकिन एक प्रश्न अब भी वहीं खड़ा है—
क्या सुविधा हमेशा खुशी भी देती है?
शायद नहीं।
क्योंकि खुशी अक्सर उन चीज़ों में छिपी होती है…
जो मुफ़्त थीं—
दोस्ती।
इंतज़ार।
माँ की आवाज़।
स्कूल की घंटी।
और घर लौटते हुए धूल भरी सड़क।
ये है -ये है –90s नास्टॉल्जिक इंडिया
क्या आपके पास भी ऐसी कोई स्कूल की याद है जो आज भी मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है?
क्या आपको अपना पहला स्कूल बैग याद है? स्टील का टिफ़िन? आधी छुट्टी में दोस्तों के साथ बाँटा गया पराँठा? या वह दोस्त, जिससे वर्षों से बात नहीं हुई, लेकिन जिसकी याद आज भी दिल में वैसी ही ताज़ा है?
अपनी सबसे प्यारी 90 के दशक की स्कूल वाली याद नीचे कमेंट में ज़रूर लिखिए। हो सकता है आपकी कहानी पढ़कर किसी और का बचपन भी लौट आए।
अगर यह लेख आपको अपने बीते दिनों की गलियों में ले गया हो, तो इसे अपने भाई-बहनों, बचपन के दोस्तों और परिवार के साथ साझा कीजिए। शायद यह उनके लिए भी यादों का एक दरवाज़ा खोल दे।
बशीर बद्र
“उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में,
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते।
अगले भाग में…
अगली बार हम खोलेंगे एक पुरानी अलमारी।
उसमें रखी होंगी—
नंदन, पराग, चंपक, धर्मयुग, माधुरी, इलस्ट्रेटेड वीकली, मनोहर कहानियाँ और वे पत्रिकाएँ, जिन्होंने एक पूरी पीढ़ी की कल्पना, भाषा और सपनों को आकार दिया।
क्योंकि…
मोबाइल आने से बहुत पहले…
हमारी दुनिया काग़ज़ के पन्नों पर बसती थी।
क्रमशः…
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