बहराइचकी गलियों में लौटती यादें | पूड़ी-जलेबी, बाबाजी, मुन्नू चाचा और वह छोटा-सा शहर जहाँ पूरा बचपन बसता था
“मैं जहाँ भी गया, मेरे साथ मेरी यादें भी चलीं…”
— गुलज़ारयहीं से मेरी कहानी शुरू होती है…
उस छोटे-से शहर की…
जिसकी पूरी दुनिया पीपल चौराहा से शुरू होकर छावनी चौराहा पर खत्म हो जाती थी।
जहाँ रेलवे स्टेशन शहर के बाहर लगता था।
जहाँ डीएम बंगला किसी दूसरी दुनिया में लगता था।
जहाँ पान की दुकानें संसद थीं।
जहाँ हलवाई इतिहास लिखते थे।
जहाँ त्योहार कैलेंडर में नहीं…
दिलों में आते थे।
और जहाँ हर रविवार…
पूड़ी-जलेबी सिर्फ़ नाश्ता नहीं होती थी…
पूरे परिवार का उत्सव होती थी।
सुबह की एक प्लेट पूड़ी-जलेबी… और मैं पहुँच गया बहराइच
आज रविवार था।
सुबह अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी।
आसमान पर बादलों की हल्की चादर तनी हुई थी। हवा में ऐसी ठंडक थी जिसे महसूस करने के लिए किसी पहाड़ पर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पेड़ों की पत्तियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं, जैसे वे भी सप्ताह भर की थकान उतार रही हों।
घर में चाय बन रही थी।
तभी मेरे छोटे भाई विक्की ने मुस्कुराते हुए कहा—
“चलो… आज रत्ती लाल की पूड़ी-जलेबी खाते हैं।”
बस…
इतनी-सी बात थी।
लेकिन कुछ वाक्य इतने छोटे होते हैं कि उनमें पूरा बचपन छिपा होता है।
हम लखनऊ की लाटूश रोड की ओर निकल पड़े।
सड़कें अभी पूरी तरह जागी नहीं थीं।
दुकानों के आधे शटर खुले थे।
दूध वाले लौट रहे थे।
अख़बार वाले अपनी आख़िरी गड्डियाँ बाँट रहे थे।
और हवा में कहीं घी में सिकती पूड़ियों की खुशबू तैर रही थी।
रत्ती लाल की दुकान पर पहली गरम पूड़ी प्लेट में आई।
उसके साथ आलू की सब्ज़ी।
फिर सुनहरी, पतली, रस से टपकती जलेबियाँ…
मैंने पहला निवाला लिया।
और उसी क्षण…
मैं लखनऊ में नहीं था।
मैं…
बहराइच में था।
गर्मागर्म पूड़ियाँ, देसी घी की खुशबू, चाशनी में डूबी जलेबियाँ…
पहला निवाला मुँह में गया और आँखों के सामने एक चेहरा उभर आया—
मेरे बाबाजी।

जब बाबाजी टोकरी भरकर खुशियाँ लाते थे
हमारा संयुक्त परिवार बहुत बड़ा था।
इतना बड़ा कि आज के बच्चों को शायद विश्वास ही न हो कि एक ही आँगन में इतने लोग भी रह सकते हैं।
रविवार की सुबह…
दरवाजा खुलता…
और बाबाजी आते दिखाई देते।
हाथ में बांस की बड़ी-सी टोकरी।
उस टोकरी में होती थीं—
- अनूप हलवाई की गरमागरम पूड़ियाँ
- बाबूराम हलवाई की रस से भरी जलेबियाँ
जैसे ही टोकरी आँगन में रखी जाती…
पूरा घर महक उठता।
कोई प्लेट ढूँढ़ रहा है…
और कोई अचार…
कोई आलू की सब्ज़ी…
और हम बच्चे?
हम तो बस जलेबी पर नज़र गड़ाए रहते।
उस समय किसी को डायट की चिंता नहीं थी।
कोलेस्ट्रॉल का नाम नहीं सुना था।
कैलोरी कोई नहीं गिनता था।
बस रिश्ते गिने जाते थे।
मुन्नू चाचा… जो चाचा कम, दोस्त ज़्यादा थे
हर संयुक्त परिवार में एक ऐसा व्यक्ति होता है जो बच्चों की दुनिया का हीरो होता है।
हमारे घर में वह थे—
मुन्नू चाचा।
बाबाजी के सबसे प्यारे बेटे।
और हम सब बच्चों के सबसे बड़े साथी।
वे कभी खाली हाथ नहीं आते।
कभी संतरे…
कभी इमरती…
या कभी रेवड़ी…
कभी खिलौना…
और अगर जेब खाली हो…
तो कहानी लेकर आ जाते।
शाम को छत पर बैठकर वे हमें किस्से सुनाते।
रामायण भी…
महाभारत भी…
भूतों की कहानियाँ भी…
और बीच-बीच में अपनी बनाई हुई मज़ेदार बातें भी।
आज सोचता हूँ…
बचपन खिलौनों से कम,
ऐसे लोगों से ज़्यादा खूबसूरत था।
मुन्नू चाचा।
वे चाचा कम…
बचपन की पूरी यूनिवर्सिटी थे।
आज भी जब कोई मुझे पूछता है कि बचपन कैसा था…
तो मुझे कोई खिलौना याद नहीं आता।
मुझे मुन्नू चाचा याद आते हैं
बहराइच… जो शहर नहीं, एक परिवार था
आज के शहर फैलते जा रहे हैं।
लेकिन हमारा बहराइच..
कितना छोटा था।
और शायद इसलिए…
कितना अपना था।
तब लगता था पूरी दुनिया बस यहीं तक है—
पीपल चौराहा से छावनी चौराहा।
उसके आगे?
बस दुनिया खत्म।
रेलवे स्टेशन…
कचहरी…
डीएम बंगला…
पोस्ट ऑफिस…
ये सब तो जैसे शहर के बाहर हुआ करते थे।
आज जब गूगल मैप पर बहराइच देखता हूँ…
तो मुस्कुरा देता हूँ।
जिसे हम पूरी दुनिया समझते थे…
वह नक्शे पर एक छोटी-सी जगह निकलती है।
लेकिन दिल के नक्शे में…
वह आज भी सबसे बड़ा शहर है।
पीपल चौराहा—जहाँ हर आदमी किसी का अपना था
पीपल चौराहा केवल एक चौराहा नहीं था।
वह बहराइच का दिल था।
वहीं बैठते थे—
राधे पान वाले।
थोड़ा आगे—
मोटे पान वाले।
और फिर…
मस्तराम चाचा पान वाले।
पान की दुकानें केवल पान बेचने की जगह नहीं थीं।
वे उस समय का सोशल मीडिया थीं।
यहीं राजनीति होती थी।
यहीं क्रिकेट की चर्चा।
और यहीं शादियाँ तय होती थीं।
यहीं मोहल्ले के झगड़े भी खत्म होते थे।
और सबसे बड़ी बात…
हर आदमी दूसरे का नाम जानता था।
बहराइच का स्वाद… जिसे कोई फाइव स्टार होटल नहीं बना सकता

अगर कोई मुझसे पूछे—
“बहराइच का असली स्वाद क्या है?”
तो मैं कहूँगा—
वह किसी एक चीज़ में नहीं था।
वह पूरे शहर में घुला हुआ था।
सुबह—
गरम पूड़ी-कचौड़ी।
जलेबी।
इमरती।
समोसे
खस्ते
दोपहर में—
दही।
रबड़ी।
मलाई।
शाम होते ही—
कामता की चाट
चाट।
टिक्की।
दही-बड़े।
गोलगप्पे।
मटर।
खस्ता।
और सर्दियों में—
गाजर का हलवा।
मूँगफली।
गजक।
रेवड़ी।
किसी होटल की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी।
सड़कें ही सबसे बड़े रेस्तराँ थीं।
एक छोटी-सी कहानी: पाँच रुपये की दावत
एक बार बाबाजी ने मुझे पाँच रुपये दिए।
उस समय पाँच रुपये…
आज के पाँच सौ जैसे लगते थे।
मैं और बिन्नू निकल पड़े।
दो प्लेट टिक्की।
एक प्लेट चाट।
चार इमरती।
दो कुल्हड़ दही।
और अंत में एक-एक मीठा पान।
घर लौटे तो जेब में पैसे भी बचे थे।
और दिल?
वह तो पूरी तरह भर चुका था।
घंटाघर—जहाँ समय भी धीरे चलता था

बहराइच का घंटाघर…
सिर्फ समय नहीं बताता था।
वह शहर की चाल तय करता था।
घड़ी की सुइयाँ जैसे धीरे चलती थीं।
लोगों के पास समय था।
बातें थीं।
रिश्ते थे।
कोई जल्दी नहीं थी।
आज…
घड़ी महँगी हो गई है।
समय सस्ता हो गया है।
दरगाह का मेला—जहाँ पूरा शहर एक हो जाता था
दरगाह का मेला…
वह केवल मेला नहीं था।
वह बहराइच की आत्मा था।
झूले।
खिलौने।
चूड़ियाँ।
इत्र।
मिठाइयाँ।
कबाब की खुशबू।
बच्चों की हँसी।
और दूर तक सुनाई देती कव्वालियाँ।
कोई यह नहीं पूछता था—
तुम किस धर्म के हो?
सब पूछते थे—
“कुछ खाया कि नहीं?”
त्योहार… जो केवल कैलेंडर पर नहीं आते थे
बहराइच में त्योहार मनाए नहीं जाते थे।
वे जीए जाते थे।
होली में पूरा मोहल्ला एक हो जाता।
दीवाली पर हर घर रोशनी से भर जाता।
ईद पर सेवइयाँ हर दरवाज़े तक पहुँचतीं।
दशहरा में रामलीला देखने पूरा शहर उमड़ पड़ता।
मुहर्रम के ताज़िए गुजरते तो लोग सम्मान से खड़े हो जाते।
नवरात्रि में मंदिरों की घंटियाँ पूरे शहर में गूँजतीं।
हमने बचपन में कभी यह नहीं सीखा कि कौन अपना है।
क्योंकि वहाँ…
सब अपने थे।
छोटा शहर… लेकिन किसी हिल स्टेशन से कम नहीं
हरिवंश राय बच्चन:
“जो बीत गई सो बात गई।”
बरसात की सुबहें…
पेड़ों से टपकती बूँदें…
साइकिल की घंटी…
दूर से आती मंदिर की आरती…
कहीं मस्जिद की अज़ान…
हल्की ठंडी हवा…
और मिट्टी की सोंधी खुशबू।
आज सोचता हूँ…
हम लोग छुट्टियाँ मनाने कहीं जाते क्यों नहीं थे?
शायद इसलिए…
क्योंकि हमारा बहराइच ही हमारा हिल स्टेशन था।
जो खो गया… वही सबसे कीमती था
आज शहर बड़े हो गए हैं।
घर छोटे।
परिवार और छोटे।
कमरे अलग।
मोबाइल अलग।
जीवन अलग।
लेकिन उस समय…
एक थाली में चार लोग खा लेते थे।
एक रेडियो पर पूरा परिवार बैठ जाता था।
और एक कहानी सबकी हो जाती थी।
शायद सुविधा बढ़ी है…
लेकिन अपनापन थोड़ा कम हो गया है।
स्मृतियों की खुशबू

गुलज़ार:
“दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन…”
आज रत्ती लाल की पूड़ी-जलेबी खाते हुए मुझे एहसास हुआ कि स्वाद केवल जीभ पर नहीं बसता।
वह स्मृतियों में भी रहता है।
एक जलेबी हमें वर्षों पीछे ले जा सकती है।
एक पूड़ी फिर से बाबाजी के पास बैठा सकती है।
और एक खुशबू मुन्नू चाचा की हँसी लौटा सकती है।
और एक छोटा-सा शहर…
जीवन भर हमारे भीतर बसा रह सकता है।
बहराइच मेरे लिए केवल जन्मभूमि नहीं…
वह मेरी भाषा है।
मेरी खुशबू है।
मेरी पहचान है।
और शायद…
मेरी आत्मा का सबसे सुंदर हिस्सा भी।
“कुछ शहरों को छोड़ दिया जाता है,
लेकिन कुछ शहर कभी हमें छोड़ते ही नहीं।
बहराइच उन्हीं में से एक है।”
और आखिर में
शाम हो चुकी है।
लखनऊ की सड़कें अब फिर से व्यस्त हैं।
रत्ती लाल की दुकान पर शायद अब दूसरी खेप की जलेबियाँ बन रही होंगी।
लेकिन मेरे भीतर…
अब भी बाबाजी की वही बाँस की टोकरी रखी है।
उसमें अब भी गरम पूड़ियाँ हैं।
मुन्नू चाचा की हँसी है।
आँगन में खेलते हम भाई-बहन हैं।
पीपल चौराहे की आवाज़ें हैं।
दरगाह के मेले की रौनक है।
होली के रंग हैं।
ईद की सेवइयाँ हैं।
दशहरे का मेला है।
और घंटाघर की वह धीमी चाल…
जिसने हमें सिखाया था कि जीवन दौड़ने का नहीं…
जीने का नाम है।
शायद इसी लिए…
आज भी मैं जब किसी शहर में पूड़ी-जलेबी खाता हूँ…
तो स्वाद जीभ पर नहीं…
दिल में उतरता है।
और तब समझ आता है—
कुछ शहर हमारे पते से निकल जाते हैं…
लेकिन हमारी आत्मा से कभी नहीं जाते।
बहराइच..
मेरे लिए ऐसा ही एक शहर है।
बशीर बद्र:
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
क्या आपके शहर की भी कोई ऐसी सुबह थी, जो आज तक आपके भीतर ज़िंदा है?
क्या आपके बाबाजी भी किसी हलवाई की दुकान से रविवार की पूड़ियाँ लाते थे?
या क्या आपके मोहल्ले में भी कोई ऐसा पानवाला था जो पूरे शहर का हाल जानता था?
क्या आपके बचपन में भी त्योहार धर्म से पहले रिश्तों के होते थे?
नीचे कमेंट में अपने शहर का नाम ज़रूर लिखिए और उससे जुड़ी एक ऐसी याद साझा कीजिए जो आज भी आपकी आँखें नम और होंठ मुस्कुरा देती हो।
हो सकता है, अगली कहानी आपके शहर की हो
This story is incomplete without your thoughts—drop them below!