
“कुछ आवाज़ें कभी ख़ामोश नहीं होतीं…”
शाम अब पूरी तरह लखनऊ की हो चुकी थी।
गोमती के किनारे बैठा मैं दूर तक बहते पानी को देख रहा था। नदी की लहरें किसी बूढ़े किस्सागो की तरह धीरे-धीरे बीते हुए दिनों की परतें खोल रही थीं। हवा में इत्र की हल्की-सी महक थी। कहीं से कबाबों की खुशबू आ रही थी। दूर किसी मस्जिद से अज़ान की पुकार उठी, तो उसी क्षण मंदिर की घंटियाँ भी गूँज उठीं। जैसे इस शहर ने सदियों पहले ही तय कर लिया हो कि सुर अलग हो सकते हैं, लेकिन संगीत एक ही रहेगा।
मैंने अपनी डायरी फिर से खोली।
उसके पहले पन्ने पर अभी भी मीर की उदासी ठहरी हुई थी। हसरत मोहानी के शब्द अब भी इंक़लाब की तरह दिल में धड़क रहे थे। सफ़ी लखनवी की सादगी हवा में घुली हुई थी। लेकिन मुझे महसूस हुआ कि लखनऊ की कहानी अभी अधूरी है।
क्योंकि कुछ शहर एक ही मुलाक़ात में अपना परिचय नहीं देते।
वे धीरे-धीरे अपने दरवाज़े खोलते हैं।
हर मोड़ पर एक नया चेहरा मिलता है।
हर गली एक नया किस्सा सुनाती है।
और हर शाम किसी नए शायर से मिलवा देती है।
मैं चौक की उसी पुरानी गली में बढ़ चला, जहाँ किताबों की एक छोटी-सी दुकान आज भी समय से लड़ रही थी। धूल से ढकी अलमारियों में रखी किताबें किसी मुसाफ़िर की राह देख रही थीं। दुकानदार ने मुस्कुराकर एक पुरानी किताब मेरी ओर बढ़ाई और कहा—
“जनाब… लखनऊ को देखना है तो पहले उसे पढ़िए।”
मैंने किताब खोली।
और लगा, जैसे पन्ने नहीं, सदियाँ खुल रही हों।
उन पन्नों से मजाज़ की बेचैन रातें बाहर निकल आईं। कृष्ण बिहारी ‘नूर‘ की मोहब्बत हवा में घुल गई। मुन्नवर राना की ‘माँ’ की ममता ने मन को भर दिया। जावेद अख्तर के शब्दों ने अतीत और वर्तमान के बीच एक पुल बना दिया। और योगेश प्रवीन ने मेरा हाथ पकड़कर कहा—
“आइए… अब मैं आपको उस लखनऊ से मिलाता हूँ, जो इतिहास की किताबों में नहीं, लोगों की यादों में बसता है।”
शायद इसी क्षण मुझे समझ आया कि शहरों को देखने के लिए आँखें काफी नहीं होतीं।
उनके लिए एक धड़कता हुआ दिल भी चाहिए।
आइए…
चलते हैं उन आवाज़ों की तलाश में, जो आज भी लखनऊ की शामों में गूँजती हैं।
जब अल्फ़ाज़ ने गलियों को अमर कर दिया
“कुछ शहरों की पहचान उनकी इमारतें होती हैं, लेकिन लखनऊ की पहचान उसके लोग, उसकी बोली और उसके अदब में बसती है।”
शाम अब थोड़ी और गहरी हो चुकी थी।
गोमती के किनारे हवा पहले से ठंडी लग रही थी। पेड़ों की शाखाएँ ऐसे झूम रही थीं जैसे किसी पुराने मशायरे की दाद अभी भी उनमें गूँज रही हो। दूर किसी मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आई। उसी पल पास के मंदिर की घंटियाँ भी बज उठीं। मैं मुस्कुरा दिया। यही तो लखनऊ है—जहाँ सुर अलग-अलग हैं, लेकिन संगीत एक ही है।
इसी शहर ने ऐसे साहित्यकार दिए जिन्होंने शब्दों से केवल किताबें नहीं लिखीं, बल्कि पीढ़ियों की सोच गढ़ दी।
मजाज़ लखनवी — जिसने चाँद से भी बातें कीं और समाज से भी
असरारुल हक़ मजाज़(1911–1955), जिन्हें अक्सर ‘उर्दू का कीट्स‘ कहा जाता है, ने क्रांति को ही रूमानी बना दिया। उनके शेरों में जवानी और आग बराबर मात्रा में बहती थी। निशातगंज में उनकी मज़ार पर लिखा कतबा आज भी अजनबियों को ठिठकने पर मजबूर कर देता है — यह पंक्तियाँ किसी अंत जैसी नहीं, बल्कि लखनऊ की गलियों में एक स्थायी सुकूनत जैसी महसूस होती हैं.
मज़ाज़ साहब अपने बाराबंकी के रुदौली गाँव में पैदा हुए थे। सुन कर ही जैसे अपनापन लगता है कि बगल में तो है उनका वज़ूद।

अगर लखनऊ की रातों को किसी शायर ने सबसे खूबसूरत आवाज़ दी, तो वह मजाज़ लखनवी थे।
उन्हें पढ़ते हुए लगता है कि चाँद भी अकेला है और इंसान भी।
उनकी नज़्मों में प्रेम था, लेकिन वह केवल किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं था। वह समाज, इंसानियत और बेहतर भविष्य के लिए भी था।
युवाओं की बेचैनी, सपनों की उड़ान और टूटते हुए दिलों की आवाज़—सब कुछ उनकी रचनाओं में दिखाई देता है।
“कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी
कुछ मुझे भी ख़राब होना था“
मुझे अक्सर लगता है कि अगर आज मजाज़ लखनऊ की किसी सड़क पर चलते, तो शायद वही कहते—
“शहर बदल गया है, लेकिन उम्मीद अभी भी ज़िंदा है।”
मज़ाज़ बहुत ज्यादा सिगरेट और शराब पीते थे। लेकिन हाज़िरजवाब भी बहुत थे। एक किस्सा है उनके बारें में –
फ़िल्मी अख़बार के एडिटर मजाज़ से इंटरव्यू लेने के लिए मजाज़ के होटल पहुँच गए… उन्होंने मजाज़ से उनकी पैदाइश, उम्र, तालीम और शायरी वग़ैरा के मुताल्लिक़ कई सवालात करने के बाद दबी ज़बान में पूछा, “मैंने सुना है क़िबला, आप शराब बहुत ज़्यादा पीते हैं। आख़िर इसकी क्या वजह है?”
“किस नामाक़ूल ने आप से ये कहा कि मैं शराब पीता हूँ।” मजाज़ ने कहा।
“तो फिर आप सिगरेट कसरत से पीते होंगे?”
“नहीं मैं सिगरेट भी नहीं पीता, शराबनोशी और सिगरेट नोशी दोनों ही बुरी आदतें हैं और मैं ऐसी किसी बुरी आदत का शिकार नहीं।” मजाज़ ने जवाब दिया।
एडिटर ने संजीदा लहजे में पूछा, “तो आप में कोई बुरी आदत नहीं है?”
मजाज़ ने उतनी ही संजीदगी से जवाब दिया, “मुझमें सिर्फ़ एक ही बुरी आदत है… कि मैं झूट बहुत बोलता हूँ।”
एक और किस्सा है उनके बारें में-
मजाज़ तन्हा काफ़ी हाउस में बैठे थे कि एक साहब जो उनके रुशनास नहीं थे, उनके साथ वाली कुर्सी पर आ बैठे। काफ़ी का आर्डर देकर उन्होंने अपनी कनसुरी आवाज़ में गुनगुनाना शुरू किया,
अहमक़ों की कमी नहीं ग़ालिब
एक ढूंढ़ो हज़ार मिलते हैं
मजाज़ ने उनकी तरफ़ देखते हुए कहा, “ढ़ूढ़ने की नौबत ही कहाँ आती है हज़रत, ख़ुद ब ख़ुद तशरीफ़ ले आते हैं।”
मजाज़ से किसी ने पूछा,
“मजाज़ साहब, आपको औरतों ने खाया या आपके क़द्र-दानों ने, या शराब ने?” शराब का गिलास मुँह से लगाते हुए मजाज़ बोले, “हमने सबको बराबर का हिस्सा दिया है।”
(ये सारी कहानियां रेख्ता से ली गयीं हैं)
एक शाम कैफ़े में…
कुछ वर्ष पहले मैं हज़रतगंज के एक छोटे-से कैफ़े में बैठा था।
मेरे सामने दो कॉलेज के छात्र मजाज़ पर चर्चा कर रहे थे।
उनमें से एक ने कहा—
“यार, मजाज़ आज भी हमारे जैसे लगते हैं।”
मैंने चाय का घूंट लिया और सोचा—
यही तो किसी लेखक की सबसे बड़ी सफलता होती है। वह अपने समय से आगे निकलकर हर पीढ़ी का साथी बन जाता है।
वाली आसी — जिन्होंने रिश्तों की गर्माहट बचाए रखी

“फैलता जाता है नफ़रत का धुआँ इश्क़ करो
बुझ न जाए कहीं ये शो’ला-ए-जाँ इश्क़ करो“
हर दौर में कुछ लेखक ऐसे होते हैं जो शोर नहीं मचाते, बल्कि धीरे-धीरे दिल में उतर जाते हैं।
वाली आसी उन्हीं में से एक थे।
उनकी रचनाओं में इंसान, उसका संघर्ष और उसकी संवेदनाएँ बार-बार लौटकर आती हैं।
वे हमें याद दिलाते हैं कि साहित्य का सबसे बड़ा उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्यता को जीवित रखना है।
“आज तक जो भी हुआ उस को भुला देना है
आज से तय है कि दुश्मन को दुआ देना है“
वाली आसी
आज जब रिश्ते मोबाइल की स्क्रीन तक सीमित होते जा रहे हैं, तब वाली आसी की सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक लगती है।
कृष्ण बिहारी ‘नूर’ — मोहब्बत की रोशनी

कुछ लोग कविता नहीं लिखते।
वे रोशनी लिखते हैं।
कृष्ण बिहारी ‘नूर’ ऐसे ही शायर थे।
उनकी ग़ज़लों में प्रेम था, लेकिन वह दिखावा नहीं था।
वह जीवन का अनुभव था।
इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
कृष्ण बिहारी नूर
उनके शब्द पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे बरसों बाद कोई पुराना मित्र अचानक सामने आकर कह दे—
“कैसे हो?”
और बस, आँखें भर आएँ।
जैसे अन-देखे उजाले की कोई दीवार हो
बंद हो जाता है कुछ दूरी पे हर इक रास्ता
कृष्ण बिहारी नूर
लखनऊ की शायरी और गलियाँ क्यों याद आती हैं?
क्योंकि वहाँ चलते हुए हर मोड़ पर एक कहानी मिलती है।
कहीं पतंग उड़ाता हुआ बच्चा।
और कहीं इत्र बेचता बूढ़ा।
कहीं किताबों की पुरानी दुकान।
कहीं चाय के साथ चलती साहित्य की बहस।
आज भी चौक की कुछ गलियों में जाइए, तो महसूस होगा कि समय वहाँ धीरे चलता है।
मानो घड़ी भी इस शहर की तहज़ीब का सम्मान करती हो।
मुन्नवर राना — माँ को शब्दों का मंदिर बना देने वाले शायर

मुन्नवर राना का नाम लेते ही सबसे पहले ‘माँ’ याद आती है।
उन्होंने माँ को केवल एक रिश्ते के रूप में नहीं लिखा।
उन्होंने उसे पूरी दुनिया का सबसे सुरक्षित ठिकाना बना दिया।
उनकी शायरी में घर की मिट्टी की खुशबू है।
बचपन की आवाज़ है।
रसोई से आती रोटी की महक है।
और वह अपनापन है जो धीरे-धीरे आधुनिक जीवन से कम होता जा रहा है।
यही कारण है कि उनकी रचनाएँ पढ़ते समय हम अपने ही घर लौट जाते हैं।
शेर
लबों पे उस के कभी बद-दु’आ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझ से ख़फ़ा नहीं होती
मुनव्वर राना
एक निजी स्मृति
मुझे अपनी दादी याद आती हैं।
रात को बिजली चली जाती थी।
आँगन में चारपाई बिछती थी।
आसमान तारों से भर जाता था।
दादी कहानी सुनाती थीं।
तब हमें यह नहीं पता था कि वही कहानियाँ आगे चलकर साहित्य से प्रेम करना सिखाएँगी।
आज जब मैं मुन्नवर राना को पढ़ता हूँ, तो दादी की वही आवाज़ फिर सुनाई देती है।
शेर
मुसीबत के दिनों में माँ हमेशा साथ रहती है
पयम्बर क्या परेशानी में उम्मत छोड़ सकता है
मुनव्वर राना
जावेद अख्तर — परंपरा और आधुनिकता के बीच एक पुल
जनाब जावेद अख्तर साहब ने लखनऊ काल्विन तालुकेदार कॉलेज में
एजुकेशन पायी थी

जावेद अख्तर ने यह साबित किया कि साहित्य समय के साथ चलता है।
उन्होंने फ़िल्मों के गीत लिखे।
ग़ज़लें लिखीं।
कविताएँ लिखीं।
लेकिन हर जगह भाषा की गरिमा बनाए रखी।
उनकी लेखनी बताती है कि नई पीढ़ी आधुनिक हो सकती है, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी भी रह सकती है।
शब्द तभी जीवित रहते हैं, जब वे समय के साथ संवाद करते रहें।
जावेद अख्तर साहब फ़िल्मी दुनियाँ की बड़ी हस्ती है साथ ही इसकी शायरी और मौसिकी भी बड़े गज़ब की हैं.
इनकी एक नज़्म पेश है
“ये वक़्त क्या है
ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है
ये जब न गुज़रा था
तब कहाँ था
कहीं तो होगा
गुज़र गया है
तो अब कहाँ है
कहीं तो होगा
कहाँ से आया किधर गया है
ये कब से कब तक का सिलसिला है
ये वक़्त क्या है.“
योगेश प्रवीन — जिन्होंने लखनऊ को किताबों से बाहर निकालकर लोगों के दिलों में बसाया
अगर किसी एक लेखक ने लखनऊ को चलती-फिरती कहानी बना दिया, तो वे थे योगेश प्रवीन।
उन्होंने केवल इतिहास नहीं लिखा।
उन्होंने शहर की धड़कनों को दर्ज किया।
पुरानी हवेलियाँ…
भूल चुकी गलियाँ…
इमामबाड़े…
रेज़ीडेंसी…
चौक…
हज़रतगंज…
हर जगह उनके शब्दों की छाप दिखाई देती है।
उनकी किताबें पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि कोई बुज़ुर्ग आपका हाथ पकड़कर पूरे शहर की सैर करा रहा हो।
एक बारिश… और पूरा लखनऊ
एक बार सावन में मैं रूमी दरवाज़े के पास खड़ा था।
बारिश धीरे-धीरे हो रही थी।
सड़क चमक रही थी।
एक रिक्शेवाला मुस्कुराते हुए बोला—
“बाबूजी, बरसात में लखनऊ और भी ख़ूबसूरत हो जाता है।”
मैंने उससे पूछा—
“क्यों?”
वह बोला—
“क्योंकि पानी धूल धो देता है… और यादें चमकने लगती हैं।”
उसकी बात सुनकर लगा कि शायद यही साहित्य भी करता है।
वह हमारे भीतर जमी धूल हटाकर हमें फिर से इंसान बना देता है।
मेरे दिल से निकला एक और शेर
हर गली में किसी किताब की खुशबू रहती है,
हर हवेली में दास्तानों की आरज़ू रहती है।
जो शहर लफ़्ज़ों को जीना सिखा दे,
उस लखनऊ की रूह हमेशा रूबरू रहती है।
“यादों की गलियों से लौटना कभी आसान नहीं होता…”
रात अब गहराने लगी थी।
चौक की रौनक धीरे-धीरे सिमट रही थी। दुकानों के आधे शटर गिर चुके थे। चाय की आख़िरी केतली भी खाली होने को थी। हवा पहले से अधिक ठंडी थी, लेकिन उसके भीतर एक अजीब-सी गर्माहट थी—शायद उन शब्दों की, जो सदियों से इस शहर को ज़िंदा रखे हुए हैं।
मैंने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा।
वह किताबों की दुकान अब बंद हो चुकी थी।
लेकिन उसकी खिड़की में जलता एक छोटा-सा पीला बल्ब अब भी टिमटिमा रहा था।
ऐसा लग रहा था, जैसे कोई लेखक अभी भी भीतर बैठा अपनी अधूरी पांडुलिपि पूरी कर रहा हो।
मैंने मन ही मन मजाज़ को सलाम किया।
‘नूर‘ की मोहब्बत को महसूस किया।
मुन्नवर राना की माँ को याद किया।
जावेद अख्तर के शब्दों में बदलते समय की आहट सुनी।
और योगेश प्रवीन के साथ चलते-चलते यह जाना कि शहरों का इतिहास पत्थरों में नहीं, इंसानों की स्मृतियों में लिखा जाता है।
उस क्षण मुझे अपना बचपन याद आया।
स्कूल की लाइब्रेरी की वह अलमारी…
पुरानी किताबों की सोंधी गंध…
रविवार की दोपहर…
रेडियो पर बजती ग़ज़ल…
और पिता जी का यह कहना—
“किताबें संभालकर रखना बेटा… इनमें लोग रहते हैं।”
बचपन में यह बात समझ नहीं आई थी।
आज आती है।
क्योंकि अब जब किसी पुराने लेखक को पढ़ता हूँ, तो लगता है जैसे वह मेरे सामने बैठा हो और कह रहा हो—
“मैं चला गया हूँ… लेकिन मेरी कहानी अभी बाकी है।”
शायद इसी का नाम विरासत है।
जो इमारतों से नहीं…
यादों से बनती है।
और लखनऊ…
वह यादों का सबसे ख़ूबसूरत शहर है।
मैंने डायरी बंद की।
लेकिन इस बार उसे अपने बैग में नहीं रखा।
उसे अपने दिल में रख लिया।
क्योंकि कुछ यात्राएँ लिखी नहीं जातीं।
वे हमेशा के लिए जी ली जाती हैं।
क्या कोई किताब आज भी आपको आपके बचपन तक ले जाती है?
यदि इस यात्रा ने आपको किसी पुराने लेखक, किसी भूली हुई ग़ज़ल, किसी स्कूल की लाइब्रेरी, या अपने घर की उस अलमारी की याद दिला दी हो जहाँ किताबें धूल के बावजूद मुस्कुराती रहती थीं, तो अपनी वह स्मृति टिप्पणी में अवश्य लिखिए।
शायद आपकी एक याद किसी और के बचपन का दरवाज़ा भी खोल दे।
यदि आपको “लखनऊ की साहित्यिक विरासत” की यह यात्रा पसंद आ रही है, तो इसे उन लोगों तक ज़रूर पहुँचाइए जो किताबों, शायरी, इतिहास और भारतीय संस्कृति से प्रेम करते हैं।
अगले भाग में हम मिलेंगे अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, शिवानी, के.पी. सक्सेना और श्रीलाल शुक्ल से—उन साहित्यकारों से, जिन्होंने लखनऊ को केवल लिखा नहीं, बल्कि उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवित रखा।
क्योंकि कुछ शहरों की कहानी पढ़ी नहीं जाती… उन्हें धीरे-धीरे जिया जाता है।
क्रमशः…
भाग–3 में हम मिलेंगे—
- अमृतलाल नागर
- भगवती चरण वर्मा
- शिवानी
- के.पी. सक्सेना
- श्रीलाल शुक्ल
- लखनऊ की साहित्यिक विरासत का भविष्य
- एक अत्यंत भावपूर्ण समापन
“यादें कभी पुरानी नहीं होतीं…
बस उन्हें सुनाने वाला कोई मुसाफ़िर मिलना चाहिए।”
— Wandering with Nikhil
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