अवध के उन साहित्यिक सितारों की दास्तान, जिन्होंने शब्दों से एक तहज़ीब गढ़ी
इस यात्रा पर चलने से पहले…
आइए, आज हम किसी इतिहास की पुस्तक नहीं खोलते।
आइए, आज हम लखनऊ का दिल खोलते हैं।
उस दिल में झाँकते हैं जहाँ मीर का दर्द है, मजाज़ के सपने हैं, हसरत का इंक़लाब है, अमृतलाल नागर की गलियाँ हैं, शिवानी का अपनापन है, योगेश प्रवीन की स्मृतियाँ हैं और उस तहज़ीब की महक है, जो आज भी हर आने वाले मुसाफ़िर से अदब से कहती है—
“पहले आप…”
आज हम आपको बीते दिनों के लखनऊ की सैर पर ले चलते हैं जहाँ पुराने लोगों को बीते ज़माने का लखनऊ जीने को मिलेगा और नयी पीढ़ी को पता चलेगा की हमारा आज कितनी खूबसूरत यादों पर टिका है।
आज हम wanderings with nikhil में इस यात्रा का part -1 जीते हैं. और उम्मीद करते है कि आप अपनी राय हमें बताएँगे।
और कैसी लगी हमारी ये कोशिश।
शहर-ए -लखनऊ…
जहाँ हवा भी शेर कहती है
कुछ शहर नक्शों पर बसते हैं, और कुछ दिल की धड़कनों में। लखनऊ उन शहरों में है, जो इंसान के भीतर हमेशा के लिए घर बना लेते हैं।“

उस सुबह हवा कुछ अलग थी।
हज़रतगंज की सड़क पर चलते हुए ऐसा लग रहा था मानो पेड़ों की पत्तियाँ भी धीरे-धीरे कोई ग़ज़ल गुनगुना रही हों। धूप तेज़ नहीं थी। हवा में इत्र की हल्की-सी खुशबू घुली हुई थी। कहीं कुल्हड़ में चाय उबल रही थी। वहीं दूसरी ओर किसी पुराने मकान की जालीदार खिड़की से कबूतर उड़कर आसमान में खो गए।
मैं रुक गया।
सामने एक बुज़ुर्ग सज्जन अख़बार पढ़ रहे थे। उनके होंठों पर मुस्कान थी। ऐसा लग रहा था कि वे समाचार नहीं, अपनी जवानी पढ़ रहे हों।
उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि लखनऊ केवल इमारतों का शहर नहीं है। यह शब्दों का शहर है। यह उन आवाज़ों का शहर है जो सदियों बाद भी हवा में तैरती रहती हैं।
यहाँ शामें केवल ढलती नहीं, बल्कि किसी ग़ज़ल की तरह मुकम्मल होती हैं।
यहाँ सुबहें केवल होती नहीं, बल्कि किसी नज़्म की पहली पंक्ति बनकर जन्म लेती हैं।
कशिश-ए -लखनऊ अरे तौबा
फिर वही हम वही अमीनाबाद
एक पल के लिए आँखें बंद कीजिए और पुराने लखनऊ की किसी गली की कल्पना कीजिए। अज़ान की गूँज अभी-अभी थमी है, हवेली के बाहर शाम के दीये टिमटिमाने लगे हैं। किसी झरोखे के पीछे से एक आवाज़ धीरे-धीरे, मानो हर लफ़्ज़ की कीमत चुकाते हुए, एक शेर पढ़ रही है।
यही है लखनऊ। नक़्शे पर बना एक शहर भर नहीं, बल्कि एक जीती-जागती ग़ज़ल, जो लगभग तीन सदियों से खुद को रचती आ रही है। कबाब और चिकनकारी से पहचान बनने से बहुत पहले, लखनऊ ने एक और, कहीं ज़्यादा गहरी उपाधि पा ली थी — उर्दू और हिंदी की सबसे नाज़ुक शायरी की राजधानी।
यह उसी लखनऊ की कहानी है — उन शायरों की, जिन्होंने शहद में डूबे हुए लफ़्ज़ कागज़ पर उतारे, उन उपन्यासकारों की, जिन्होंने समाज को उसका ही अक्स दिखाया, और उस तहज़ीब की, जो इतनी नफ़ीस थी कि यहाँ ग़म भी बोला जाए तो संगीत बन जाता है।
हर शहर का एक इतिहास होता है। मगर लखनऊ के पास एक ‘तासीर’ है — एक असर, एक खुशबू, जो हमेशा ठहरी रहती है। और यह खुशबू, इत्र और बिरयानी की महक से कहीं ज़्यादा, इसके शायरों से आती है।
असरार-उल-हक़ मज़ाज़ का एक शेर मौजूं है
फ़िरदौस-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ है दामान-ए-लखनऊ
आँखों में बस रहे हैं ग़ज़ालान-ए-लखनऊ
अवध की मिट्टी में शब्दों की खुशबू

अगर भारत की संस्कृति को एक बाग़ कहा जाए, तो अवध उसकी सबसे महकती क्यारी है।
यहाँ मंदिरों की घंटियाँ और मस्जिदों की अज़ान एक-दूसरे की आवाज़ को कम नहीं करतीं, बल्कि और मधुर बना देती हैं।
यही गंगा-जमुनी तहज़ीब है।
इसी मिट्टी ने ऐसे साहित्यकार दिए, जिन्होंने प्रेम को धर्म से ऊपर रखा, इंसानियत को राजनीति से ऊपर रखा और शब्दों को हथियार नहीं, मरहम बनाया।
लखनऊ की साहित्यिक विरासत केवल किताबों में नहीं मिलती।
वह चाय की दुकानों पर बैठी मिलती है।
वह पुराने इमामबाड़े की सीढ़ियों पर मिलती है।
या वह चौक की गलियों में मिलती है।
वह टुंडे के कबाब की खुशबू के साथ चलती है।
वह किसी बूढ़े उस्ताद की आवाज़ में मिलती है, जो बिना किसी मंच के भी शेर सुना देता है।
एक अख़बार… और खुल गया यादों का दरवाज़ा
कुछ दिन पहले मेरे हाथ The Times of India का विशेष अंक लगा।
उसके पन्नों पर एक नहीं, बल्कि पूरा लखनऊ साँस ले रहा था।
एक-एक तस्वीर मानो कह रही थी—
“हम चले गए हैं, मगर हमारी आवाज़ें अभी भी यहीं हैं।”
मीर…
हसरत…
मजाज़…
सफ़ी...
योगेश प्रवीन…
अमृतलाल नागर…
शिवानी...
जावेद अख्तर…
मुन्नवर राना...
इन सभी नामों को पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे मैं किसी साहित्य सम्मेलन में नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के बुज़ुर्गों के बीच बैठा हूँ।
शाही शुरुआत: दिल्ली का नुक़सान, लखनऊ का फायदा
मध्यकाल में शायरी को शाही सरपरस्ती मिला करती थी। दो बड़े मकतब उभरे —
दबिस्तान-ए-देहली और दबिस्तान-ए-लखनऊ —
मीर तकी मीर —
जिनकी आह आज भी लखनऊ की हवा में घुली है

इन्हीं में थे मीर तक़ी मीर (1723–1810), एक अग्रणी शायर, जिनकी ‘रेख़्ता’ पर पकड़ —
जो बाद में हिंदवी या हिंदी-उर्दू कहलाई — इतनी गहरी थी कि उन्हें ‘ख़ुदा-ए-सुख़न’ का ख़िताब मिला।
उर्दू शायरी का इतिहास यदि किसी एक नाम से शुरू होता है, तो वह नाम मीर तकी मीर है।
उन्होंने केवल ग़ज़लें नहीं लिखीं।
उन्होंने इंसानी दिल की सबसे गहरी पीड़ा को शब्द दिए।
उनकी शायरी में बनावट नहीं थी।
सादगी थी।
सच था।
दर्द था।
उनका एक प्रसिद्ध शेर आज भी हर दिल को छू लेता है—
“पत्थर दिलों से क्या गिला, मीर,
हमने तो फूलों से भी चोट खाई है।”
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
मीर तक़ी मीर
मीर की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वे प्रेम को सजाकर नहीं लिखते थे।
वे उसे जीते थे।
और शायद इसलिए आज भी उनकी शायरी पढ़ते समय लगता है कि यह किसी दूसरे की नहीं, हमारी अपनी कहानी है।
कई दूसरी कहानियों की तरह, यह कहानी भी उनसे जुड़ी कई बातों के केंद्र में है; इनमें से कुछ शायद मनगढ़ंत हैं, तो कुछ काफी हद तक सच हैं। जैसे कि वह कहानी जो हमारा ब्लॉग आपके लिए लाया है—एक दिलचस्प किस्सा जिसमें मीर साहब, जो अब बूढ़े हो चुके थे, लखनऊ जैसी अनजान और नई जगह पर अपनी पहली मुशायरे में शामिल हुए। तो, क्या आप मीर से जुड़ी कहानियों की दुनिया में जाने के लिए तैयार हैं? आपको तैयार रहना ही चाहिए!
मीर तकी मीर, जिन्हें अपनी गरीबी पर गर्व था और जो दुनियावी सुख-सुविधाओं के बिना भी खुश रहते थे, आखिरकार 1778 में अपने सबसे प्यारे शहर दिल्ली को अलविदा कहकर लखनऊ चले गए।
लखनऊ और मुशायरा
60 साल की उम्र में, मीर तकी मीर आखिरकार 1782 में नवाब आसफ़-उद-दौला के बुलावे पर लखनऊ के दरबार में पहुँचे। एक मुसाफिर के तौर पर सराय में ठहरे मीर को पता चला कि एक शाम मुशायरा होने वाला है। खुद को रोक न पाने के कारण, उन्होंने तुरंत एक ग़ज़ल लिखी और मुशायरे में हिस्सा लिया।
मीर जैसे बड़े कवि को भी वहाँ के मनमौजी और बदतमीज़ दर्शकों की दुश्मनी और बदतमीज़ी का सामना करना पड़ा, जो उनके पुराने ज़माने के पहनावे का मज़ाक उड़ा रहे थे।
उनके सिर पर एक पुरानी पगड़ी थी और उनका शरीर एक ऐसे कपड़े से ढका हुआ था जो कभी खत्म नहीं होता था। इस कपड़े के ऊपर बेल्ट पर सावधानी से ठूँसा हुआ एक रूमाल साफ दिख रहा था। इस लंबे कपड़े के ठीक नीचे सिल्क और कॉटन का बना एक मुश्किल से दिखने वाला पायजामा था जिसमें उनके पैरों की चौड़ाई कपड़े की चौड़ाई जितनी लग रही थी। उनके पैर मुड़े हुए, नुकीले जूतों में ढके हुए थे जिनके सिरे उनके कपड़े की लंबाई तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे। उनकी बेल्ट भी दोनों तरफ से बंधी हुई थी, दाईं ओर एक सैफ, यानी, एक सीधी तलवार और बाईं ओर एक खंजर था। इस अजीब लुक को पूरा करने वाली चीज़ एक कमज़ोर छड़ी थी जिसने इस बूढ़े आदमी को एक और अनचाहा कदम उठाने में मदद की!
साफ़ है, इस किरदार ने मीर तकी मीर को मज़ाक का पात्र बनते देखा, जो तब और बढ़ गया जब दर्शकों में से किसी ने मज़ाक उड़ाते हुए पूछा, ‘महाराज का पैतृक घर कहाँ है?’ मीर, जो इस विदेशी धरती पर अपनी आँखों के सामने जो कुछ हुआ था, उससे पहले से ही परेशान थे, उन्होंने बिना सोचे-समझे यह मशहूर कविता लिखी और पढ़ी,
क्या बद -ओ -बश पूछो हो पूरब के साकिनो
हम को गरीब जान के हंस-हंस पुकार के ,
दिल्ली जो इक शहर था आलम में इंतखाब
रहते थे मुन्तख़ब ही जहाँ रोज़गार के ,
उस को फलक ने लूट के बर्बाद कर दिया
हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के
(“Oh, easterners, why do you ask about my home and origin?
Considering me a stranger, calling out to me with laughter?
Delhi, which was the choicest place in the world,
where the choicest ones of the age lived,
Which was looted and desolated by the heavens,
I am a dweller of that very ruined land“)
इन पंक्तियों ने जो भावुक माहौल बनाया, उससे हर कोई मीर से दिल से माफ़ी मांगने लगा। और जैसे ही सुबह हुई, लखनऊ में मीर का आगमन गर्व और जश्न का मौका बन गया। इस घटना के बारे में पता चलने पर, नवाब ने उन्हें दो सौ रुपये का वज़ीफ़ा दिया।
और दिल्ली की तरह ही, मीर तकी मीर जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति के लिए सम्मान और शोहरत ने एक बार फिर अपनी जगह बनाई।
मेरा छोटा-सा अनुभव
मैंने एक बार चौक में एक बुज़ुर्ग को मीर का ज़िक्र करते सुना।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“बेटा, मीर को पढ़ने से पहले थोड़ा-सा अकेलापन चाहिए।”
मैंने पूछा—”क्यों?”
वे बोले—
“क्योंकि मीर दिल के शायर हैं। भीड़ में नहीं समझ आते।”
उनकी बात आज भी मेरे भीतर गूँजती है
मीर के साथ थे मिर्ज़ा मोहम्मद रफ़ी सौदा (1713–1781), जिनकी ‘क़सीदा’ और ‘हज्व’ पर पकड़ इतनी सम्मानित थी कि ख़ुद मुग़ल शासक शाह आलम उनसे शायरी सीखते थे।
और थे ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी तथा इमाम बख़्श नासिख़, जिनकी ज़िंदगी की नश्वरता पर लिखी पंक्तियाँ आज भी उस हर इंसान के दिल को छूती हैं, जिसने किसी अपने की याद को धुंधलाते देखा हो।
चैन दुनिया में ज़मीं से ता-फ़लक दम भर नहीं
दाग़ हैं ये गुल नहीं नासूर हैं अख़्तर नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
सुनहरी टीस: अमीर मीनाई और इंतज़ार की शायरी

सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा
मैं ने दुनिया छोड़ दी जिन के लिए
अमीर मीनाई
अगर लखनऊ की शायरी का कोई दिल है, तो अमीर मीनाई (1829–1900) यक़ीनन उसी में बसते हैं।
फ़रंगी महल से तालीम पाने वाले अमीर मीनाई ने ऐसी नज़ाकत से लिखा, जो लगभग असहनीय महसूस होती है —
ऐसी शायरी, जो किसी अजनबी के ग़म को भी अपना बना देती है। उन्होंने ऐसे ज़ख़्मों की बात की, जिन्हें ‘आहिस्ता, आहिस्ता’ छूना पड़ता है, और ऐसे दर्द की, जो इतना सार्वभौमिक था कि पूरी दुनिया मानो उनके दिल का एक हिस्सा अपने भीतर समेटे हुए थी।
वही रह जाते हैं ज़बानों पर
शेर जो इंतिख़ाब होते हैं
अमीर मीनाई
अमीर मीनाई उर्दू और फ़ारसी के कवि थे। उन्हें शब्दकोश बनाने वाले, सूफ़ी, विद्वान, संपादक, गद्य लेखक, अनुवादक और भाषा के जानकार के तौर पर भी जाना जाता है।
अमीर ने अपने समय के बड़े कवियों और लेखकों के साथ भी गहरी दोस्ती की। ग़ालिब, अमीर से बीस साल बड़े होने के बावजूद, उन्हें अपने दोस्तों में मानते थे—शायद इसलिए क्योंकि दोनों रामपुर के दरबार से जुड़े थे। अमीर की अपने समकालीन महान कवि दाग़ देहलवी के साथ बहुत गहरी निजी दोस्ती थी—और साथ ही उनके बीच ज़बरदस्त काव्य-प्रतिद्वंद्विता भी थी।
सरकती जाए है रुख से नकाब आहिस्ता, आहिस्ता…’
अमीर मीनाई के बोल, ग़ज़ल उस्ताद जगजीत सिंह द्वारा गाए और लोकप्रिय हुए और बाद में ऋषि कपूर और टीना मुनीम अभिनीत एक फिल्म में भी दिखाई दिए।
यही लखनऊ के शायरों का अनोखा जादू है। उन्होंने सिर्फ़ इश्क़ और जुदाई के बारे में नहीं लिखा, उन्होंने पाठक को उसमें शरीक कर दिया। आप अमीर मीनाई को पढ़ते नहीं, आप उन्हें याद करते हैं, भले ही आप कभी उनसे मिले न हों।
जब फ़िक्शन को आवाज़ मिली: मिर्ज़ा मुहम्मद हादी रुस्वा

शायरी अकेली सौग़ात नहीं थी, जो लखनऊ ने अदब को दी।
मिर्ज़ा मुहम्मद हादी रुस्वा (1857–1931) ने उर्दू साहित्य को उसके सबसे चिरस्थायी उपन्यासों में से एक दिया — उमराव जान
एक तवायफ़ और शायरा की कहानी, जिसकी ज़िंदगी पूरे युग के विरोधाभासों का आईना बन गई: सुंदरता और शोषण, कला और परित्याग, प्रेम और हानि, सब कुछ ऐसे गद्य में बुना गया, जो एक लंबी, टीसती हुई ग़ज़ल जैसा पढ़ता है।
इस पर मुज़फ्फर अली ने इसी नाम से एक फिल्म बनाई थी जो की एक खूबसूरत अदायगी थी – इस किरदार की– जिसे रेखा ने बड़ी ही खूबसूरती से परदे पर उकेरा.
बुत-परस्ती में न होगा कोई मुझ सा बदनाम
झेंपता हूँ जो कहीं ज़िक्र-ए-ख़ुदा होता है
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
एक और शेर मौज़ूं है-
मरने के दिन क़रीब हैं शायद कि ऐ हयात
तुझ से तबीअ’त अपनी बहुत सैर हो गई
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
हसरत मोहानी — जिन्होंने इश्क़ और इंक़लाब को एक साथ जिया

वफ़ा तुझ से ऐ बेवफ़ा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
हसरत मोहानी
बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो कलम से भी लड़ते हैं और विचारों से भी।
हसरत मोहानी उन्हीं विरले लोगों में थे।
वे केवल शायर नहीं थे।
वे स्वतंत्रता सेनानी भी थे।
उन्होंने प्रेम को भी पूरी शिद्दत से लिखा और आज़ादी को भी उसी ईमानदारी से जिया।
उनका प्रसिद्ध नारा—
“इंक़लाब ज़िंदाबाद”
आज भी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अमर है।
इसी तरह उनकी ग़ज़लों में प्रेम किसी सीमा में कैद नहीं होता।
वह इंसान को बेहतर बनाता है।
यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
आरज़ू तेरी बरक़रार रहे
दिल का क्या है रहा रहा न रहा
हसरत मोहानी
हसरत मोहानी अगर उर्दू ग़ज़ल का एक बड़ा नाम हैं तो ये वही थे जिन्होंने मुल्क को इन्क़लाब ज़िंदाबाद का नारा दिया, अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ गोरिला जंग की वकालत की, महात्मा गांधी को स्वदेशी आंदोलन की राह सुझाई, सबसे पहले हिंदुस्तान की मुकम्मल आज़ादी की मांग की, देश विभाजन का विरोध किया, संविधान निर्माण असैंबली और पार्लियामेंट के सदस्य होते हुए, घर में सिले, बग़ैर इस्त्री के कपड़े पहने, ट्रेन के थर्ड क्लास और शहर के अंदर यक्का पर सफ़र किया, छोटे से मकान में रहते हुए घर का सौदा सामान ख़रीदा और पानी भरा और ये सब तब था जबकि उनका सम्बंध एक जागीरदाराना घराने से था। सियासत को न वो रास आए न सियासत उनको रास आई। उनकी मौत के साथ उनका सियासी संघर्ष मात्र इतिहास का हिस्सा बन गया लेकिन शायरी उनको आज भी पहले की तरह ज़िंदा रखे हुए है।
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
ये उनकी एक बड़ी मशहूर ग़ज़ल है जिसे बाद में गुलाम अली ने आवाज़ दी
लखनऊ हमें क्या सिखाता है?
लखनऊ कहता है—
“मत पूछो कि सामने वाला कौन है। पहले यह पूछो कि वह इंसान कैसा है।”
शायद यही कारण है कि यहाँ शायरी केवल भाषा नहीं रही।
वह जीवन जीने का तरीका बन गई।
सफ़ी लखनवी — सादगी की सबसे खूबसूरत आवाज़
जनाज़ा रोक कर मेरा वो इस अंदाज़ से बोले
गली हम ने कही थी तुम तो दुनिया छोड़े जाते हो
सफ़ी लखनवी
सफ़ी लखनवी का नाम आते ही दिल में एक अजीब-सी नरमी उतर आती है।
उन्होंने ऊँची आवाज़ में कभी कुछ नहीं कहा।
उनकी शायरी धीरे-धीरे दिल में उतरती है।
जैसे शाम के समय गोमती नदी पर चलती हवा।
या जैसे पुराने मकान की खुली खिड़की।
जैसे दादी की धीमी आवाज़ में सुनाई गई कोई कहानी।
उनके शब्दों में बनावटी चमक नहीं थी।
बल्कि मिट्टी की सोंधी खुशबू थी।
इसीलिए उनकी रचनाएँ समय के साथ पुरानी नहीं हुईं।
पैग़ाम ज़िंदगी ने दिया मौत का मुझे
मरने के इंतिज़ार में जीना पड़ा मुझे
सफ़ी लखनवी
अवध की शामें क्यों अलग होती हैं?
शायद इसलिए कि यहाँ सूरज डूबने के बाद भी रोशनी खत्म नहीं होती।
दीयों की लौ जलती है।
मशायरों की महफ़िल सजती है।
कहीं तबले की थाप सुनाई देती है।
कहीं कोई बच्चा अपनी पहली कविता सुनाता है।
और तभी महसूस होता है—
यह शहर केवल वर्तमान में नहीं जीता।
यह अपने अतीत को साथ लेकर चलता है।
मेरे दिल से निकला एक छोटा-सा शेर
गोमती की लहरों में अब भी कोई साज़ बजता है,
लखनऊ का हर मौसम किसी शायर-सा सजता है।
जो एक बार यहाँ की हवा में साँस ले ले,
उसका दिल उम्र भर इसी शहर में बसता है।
“कुछ शहर कभी अलविदा नहीं कहते…”

शाम अब धीरे-धीरे अपनी चादर समेट रही थी।
गोमती की लहरों पर डूबते सूरज की सुनहरी परछाइयाँ किसी पुराने ख़त की फीकी पड़ चुकी स्याही जैसी लग रही थीं। हवा में हल्की-सी ठंडक घुल चुकी थी। चौक की गलियों में दुकानों की रोशनियाँ एक-एक कर जलने लगी थीं। कहीं चाय की केतली फिर से चढ़ चुकी थी। कहीं किसी पुराने रेडियो पर धीमी आवाज़ में ग़ज़ल बज रही थी। ऐसा लग रहा था मानो पूरा लखनऊ दिनभर की थकान के बाद अपनी यादों की गठरी खोलकर बैठ गया हो।
मैंने अख़बार का वह विशेष पृष्ठ एक बार फिर देखा।
वे सभी चेहरे अब केवल तस्वीरें नहीं रहे थे।
मीर की आँखों में सदियों का दर्द था।
हसरत मोहानी की मुस्कान में इंक़लाब की गर्मी थी।
सफ़ी लखनवी के शब्दों में शाम की नरमी थी।
और मुझे लगा… वे सब कहीं गए ही नहीं।
वे आज भी यहीं हैं।
शायद किसी पुरानी लाइब्रेरी की अलमारी में…
या शायद किसी उर्दू की किताब के पीले पड़ चुके पन्नों में…
शायद किसी बुज़ुर्ग उस्ताद की आवाज़ में…
या फिर उस बच्चे की कॉपी में, जिसने पहली बार अपनी ज़िंदगी का पहला शेर लिखा होगा।
तभी मुझे अपने बचपन की याद आ गई।
वह समय, जब शाम ढलते ही दादाजी अख़बार मोड़कर रख देते थे। दादी तुलसी के चौरे पर दीपक जलाती थीं। रेडियो पर विविध भारती बजता था। हम बच्चों को समझ भी नहीं आता था कि बड़े लोग इतनी देर तक किताबों और कविताओं की बातें क्यों करते हैं।
आज समझ आता है…
वे केवल साहित्य की चर्चा नहीं करते थे।
वे अपनी पीढ़ियों को ज़िंदा रख रहे थे।
किताबें केवल शब्द नहीं होतीं।
वे उन लोगों की आवाज़ होती हैं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं।
शायद इसीलिए जब भी किसी पुराने लेखक को पढ़ता हूँ, तो लगता है जैसे मैं किताब नहीं, अपने किसी बिछड़े हुए रिश्तेदार से मिल रहा हूँ।
मैंने धीरे से अख़बार बंद किया।
हवा ने उसके पन्नों को एक बार फिर हिलाया…
मानो कोई कह रहा हो—
“अभी इतनी जल्दी विदा मत लो… अभी लखनऊ की दास्तान अधूरी है।”
मैं मुस्कुराया।
आसमान की ओर देखा।
पहला तारा दिखाई दे चुका था।
और उसी पल यह एहसास हुआ कि शहर केवल ईंटों और सड़कों से नहीं बनते।
शहर उन लोगों से बनते हैं जो अपने जाने के बाद भी हमें जीना सिखाते रहते हैं।
लखनऊ ऐसा ही शहर है।
यह आपको रोकता नहीं…
लेकिन हर बार लौट आने की एक वजह ज़रूर दे देता है।
क्या आपके शहर में भी कोई ऐसी गली है, जहाँ यादें आज भी रहती हैं?
यदि इस यात्रा ने आपको अपने बचपन, अपने शहर या किसी प्रिय पुस्तक की याद दिलाई हो, तो अपनी स्मृतियाँ टिप्पणी में अवश्य साझा कीजिए।
हो सकता है, आपकी एक छोटी-सी याद किसी दूसरे पाठक को उसके बीते हुए दिनों तक पहुँचा दे।
यदि आपको “लखनऊ की साहित्यिक विरासत” की यह यात्रा पसंद आई हो, तो इसे अपने उन मित्रों तक ज़रूर पहुँचाइए जो किताबों, शायरी, इतिहास और भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब से प्रेम करते हैं।
अगले भाग में हम मिलेंगे मजाज़ लखनवी, कृष्ण बिहारी ‘नूर’, मुन्नवर राना, जावेद अख्तर और योगेश प्रवीन से—उन शब्द-यात्रियों से, जिन्होंने लखनऊ की रूह को अपनी लेखनी में हमेशा के लिए अमर कर दिया।
क्योंकि… कुछ कहानियाँ एक ही बैठक में पूरी नहीं होतीं।
“यादें कभी पुरानी नहीं होतीं…
बस उन्हें सुनाने वाला कोई मुसाफ़िर मिलना चाहिए।”
— Wandering with Nikhil
क्रमशः…
भाग–2 में हम मिलेंगे:
- मजाज़ लखनवी – रोमांस और बग़ावत के शायर
- वाली आसी
- कृष्ण बिहारी ‘नूर’
- मुन्नवर राना
- जावेद अख्तर
- योगेश प्रवीन – जिन्होंने लखनऊ को शब्दों में अमर कर दिया
- और कुछ ऐसे संस्मरण, जो आपको पुराने लखनऊ की गलियों में ले जाएँगे।
“शहर वही नहीं होता जहाँ हम रहते हैं,
शहर वह भी होता है जो हमारी रूह में बस जाता है।”
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