Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

Do you set personal goals for yourself? View all responses अरे भाई, मैं तो बस ज़िंदगी जी रहा हूँ! एक ऐसे आलसी इंसान की दास्तान, जिसकी ज़िंदगी बिना किसी पाँच साल की योजना के भी मज़े से चल रही है! एक सवाल है आपसे। क्या आप अपनी ज़िंदगी के लिए लक्ष्य तय करते हैं? मतलब,…

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क्या आप अपने लिए ज़िंदगी के लक्ष्य तय करते हैं?

Do you set personal goals for yourself?

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अरे भाई, मैं तो बस ज़िंदगी जी रहा हूँ!

एक ऐसे आलसी इंसान की दास्तान, जिसकी ज़िंदगी बिना किसी पाँच साल की योजना के भी मज़े से चल रही है!

एक सवाल है आपसे।

क्या आप अपनी ज़िंदगी के लिए लक्ष्य तय करते हैं?

मतलब, सुबह पाँच बजे उठना, गुनगुना पानी पीना, आधा घंटा योग करना, एक घंटा व्यायाम करना, रोज़ पचास पन्ने पढ़ना, तीस साल की उम्र तक करोड़पति बन जाना, चालीस तक अपना साम्राज्य खड़ा कर लेना और पचास की उम्र में रिटायर होकर पहाड़ों पर घर बना लेना!

आजकल सफल लोगों की दिनचर्या सुनकर लगता है कि इंसान नहीं, कोई सुपरकंप्यूटर पैदा हुआ है, जिसे भगवान ने गलती से धरती पर भेज दिया।

और इधर मेरा हाल यह है कि सुबह आँख खुलने के बाद भी दस मिनट तक बिस्तर पर लेटे-लेटे यही गंभीर चिंतन चलता रहता है कि पहले चाय पी जाए या नहाया जाए!

सच कहूँ तो मैं थोड़ा आलसी किस्म का इंसान हूँ। ऐसा नहीं कि ज़िंदगी से हार मानकर बैठ गया हूँ। बस, मेरा मानना है कि ज़िंदगी में पहले ही इतनी परेशानियाँ हैं, तो क्यों न कुछ परेशानियाँ अपनी तरफ़ से पैदा ही न की जाएँ!

ज़िंदगी के लिए लक्ष्य तय करना तो दूर, मैंने कभी यह लक्ष्य भी तय नहीं किया कि सोमवार की सुबह बिस्तर से कितने बजे उठना है!

और मज़े की बात देखिए, इसके बावजूद ज़िंदगी चल रही है। काम हो रहे हैं, जिम्मेदारियाँ निभ रही हैं और गाड़ी किसी तरह आगे बढ़ रही है।

अब यह मेरी काबिलियत है या हनुमान जी की विशेष कृपा, इस पर शोध होना बाकी है!

मेरी ज़िंदगी, मेरे नियम और मेरा आरामदायक टाइमटेबल

मैंने कभी अपनी ज़िंदगी को किसी एक्सेल शीट में नहीं बाँधा। मेरे पास न कोई विज़न बोर्ड है, न दीवार पर चिपके हुए प्रेरणादायक पोस्टर और न ही ऐसा कोई चार्ट, जिसमें लिखा हो कि अगले छह महीनों में मुझे कहाँ पहुँचना है।

अगर कभी मेरा विज़न बोर्ड बना, तो उस पर एक प्याली गरमागरम चाय, समोसे की प्लेट, आरामदायक कुर्सी, कुछ पुराने दोस्त और एक तख्ती ज़रूर होगी।

उस पर लिखा होगा—

“बिना चाय लाए परेशान करने वालों का प्रवेश वर्जित है!”

मेरा कोई सख़्त नियम नहीं है कि सुबह उठते ही सबसे पहले जीवन का उद्देश्य ढूँढ़ना है। कभी चाय के साथ दिन शुरू होता है, कभी अख़बार के साथ और कभी किसी पुराने दोस्त के फ़ोन से, जो बिना किसी भूमिका के पूछता है, “और भाई, क्या चल रहा है?“

मैं कहता हूँ, “बस ज़िंदगी चल रही है। तू सुना!“

अब इसमें भी क्या कम आनंद है?

हैरानी की बात यह है कि काम फिर भी हो जाते हैं। कभी समय पर, कभी थोड़ी भागदौड़ के बाद और कभी उस अंतिम घड़ी में, जब इंसान को अपनी सारी योग्यताएँ अचानक याद आने लगती हैं।

मुझे तो लगता है कि मेरे भीतर कोई छिपा हुआ टैलेंट है—काम को आख़िरी समय तक टालने और फिर किसी तरह पूरा कर लेने का!

और जब कोई काम बिना किसी बड़ी परेशानी के पूरा हो जाता है, तो मैं मन ही मन कहता हूँ, “जय बजरंगबली! आपकी कृपा बनी रहे!”

क्योंकि श्रेय लेने में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं। मैं जानता हूँ कि मेरे योगदान से ज़्यादा योगदान कभी-कभी ऊपरवाले की कृपा का होता है।

दुनिया भाग रही है, लेकिन भाई, जाना कहाँ है?

आप अपने आसपास देखिए। हर कोई भाग रहा है।

किसी को तीस साल की उम्र तक करोड़पति बनना है। किसी को चालीस से पहले आलीशान मकान खरीदना है। कोई साल में पाँच देशों की सैर करना चाहता है। कोई अपना वज़न घटाने में लगा है, कोई मांसपेशियाँ बनाने में और कोई अपनी कंपनी को यूनिकॉर्न बनाने के सपने देख रहा है।

आजकल तो लगता है कि अगर आपके पास पाँच साल की योजना नहीं है, तो आप इंसान नहीं, समाज पर बोझ हैं!

लोगों के पास हर चीज़ का लक्ष्य है।

कितना कमाना है, कहाँ पहुँचना है, कितने फ़ॉलोअर्स चाहिए, कितने देशों में घूमना है और कितने साल में रिटायर होना है।

मैं इन लोगों की मेहनत की इज़्ज़त करता हूँ। सपने देखना अच्छी बात है। उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करना उससे भी अच्छी बात है।

लेकिन कभी-कभी मन करता है कि भागते हुए किसी महानुभाव को रोककर पूछ ही लूँ—

“भाई साहब, एक मिनट रुकिए! इतनी जल्दी कहाँ जा रहे हैं? और वहाँ पहुँचकर करना क्या है?”

हो सकता है वह मुझे घूरकर देखे और कहे, “तुम जैसे आलसी लोगों को क्या पता कि सफलता क्या होती है!”

मैं हाथ जोड़कर कहूँगा, “बिल्कुल सही फ़रमाया आपने। लेकिन ज़रा यह भी बताइए कि इतनी दौड़भाग के बीच चाय पीने का समय मिलता है या नहीं?”

मेरा एक छोटा-सा सवाल है।

हम अपनी पूरी ज़िंदगी बेहतर ज़िंदगी हासिल करने के लिए लगा देते हैं। लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि इस बेहतर ज़िंदगी की तैयारी करते-करते हम वर्तमान की ज़िंदगी जीना ही भूल जाते हैं?

मेरा पाँच साल का प्लान? कल पूछिएगा!

अगर कोई मुझसे पूछे कि अगले पाँच साल में तुम क्या करना चाहते हो, तो मेरा जवाब बहुत सीधा है।

मैं चाहता हूँ कि स्वस्थ रहूँ, मन प्रसन्न रहे, खाने-पीने का आनंद बना रहे और आसपास ऐसे लोग हों जिनके साथ बैठकर समय का पता ही न चले।

इतना कमा लूँ कि ज़रूरतें पूरी होती रहें और रेस्टोरेंट में मेन्यू देखते समय हर व्यंजन की कीमत देखकर दिल की धड़कन न बढ़ जाए।

जब मौका मिले, घूमने निकल जाऊँ। मन करे तो कुछ लिखूँ, कुछ पढ़ूँ, पुराने गीत सुनूँ और दोस्तों के साथ गप्पें मारूँ।

ज़िंदगी में कुछ अच्छा, बड़ा या असाधारण कर पाया, तो बहुत अच्छी बात है। नहीं कर पाया, तो कम से कम मेरे पास सुनाने के लिए कुछ अच्छी कहानियाँ तो होंगी!

और सुनने वाले दोस्त भी, जो हर कहानी के बाद कहें, “अच्छा, फिर क्या हुआ?”

मेरे लिए यही जीवन की छोटी-छोटी उपलब्धियाँ हैं।

हाँ, यह मत कहिएगा कि इन्हें भी एक्सेल शीट में डालकर हर महीने प्रगति की रिपोर्ट बनाइए।

भगवान के लिए, मुझे बख्श दीजिए!

हनुमान जी हैं न, मेरे अनौपचारिक लाइफ़ मैनेजर!

मेरी ज़िंदगी में हनुमान जी की कृपा और आस्था का अपना महत्त्व है।

जब कोई परेशानी आती है, तो मैं उन्हें याद करता हूँ। जब मन बेचैन होता है, तो प्रार्थना करता हूँ। और जब कोई उलझा हुआ काम अचानक बन जाता है, तो मन में एक ही भाव आता है—उनकी कृपा है।

अब इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि मैं दिनभर सोफ़े पर लेटा रहूँ और उम्मीद करूँ कि हनुमान जी मेरे बिजली के बिल भर देंगे, बैंक का काम कर देंगे और शाम को सब्ज़ी भी काटकर रख देंगे!

भक्ति अपनी जगह है और कर्म अपनी जगह।

मेरी छोटी-सी समझ यही है कि जो काम हमारे हाथ में है, उसे ईमानदारी से करना चाहिए। अपनी तरफ़ से कोशिश करनी चाहिए और जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, उसे लेकर हर समय परेशान होते रहने से बचना चाहिए।

मैं भी काम करता हूँ, जिम्मेदारियाँ निभाता हूँ और कोशिश करता हूँ कि किसी को मेरी वजह से परेशानी न हो। बस, हर काम के लिए लंबी-चौड़ी रणनीति बनाने और भविष्य की हर संभावना का हिसाब लगाने में मेरी विशेष रुचि नहीं है।

कभी-कभी ज़िंदगी को थोड़ा खुला छोड़ देना भी अच्छा लगता है।

और जब कोई काम बन जाए, तो हनुमान जी को धन्यवाद।

जब न बने, तो दोबारा कोशिश!

आख़िर हनुमान जी ने भी समुद्र पार करने के लिए केवल प्रार्थना नहीं की थी, उड़ान भी भरी थी!

आख़िर में सबको स्क्वायर वन पर ही तो लौटना है! Back to square one!

अब ज़रा गंभीर हो जाएँ। घबराइए मत, बहुत देर तक नहीं रहूँगा!

ज़िंदगी की एक सच्चाई है, जिसे हम जानते तो हैं, लेकिन रोज़मर्रा की भागदौड़ में भूल जाते हैं।

हम चाहे कितनी भी संपत्ति बना लें, कितनी भी बड़ी गाड़ी खरीद लें, कितने ही पुरस्कार जीत लें या दुनिया में अपना नाम कमा लें, एक दिन सब कुछ यहीं छोड़कर जाना है।

गाड़ी गैराज में रह जाएगी। मकान में कोई और रहने लगेगा। बैंक बैलेंस की चिंता किसी और के हिस्से आ जाएगी। जिस कुर्सी पर बैठकर हम दुनिया पर राज करने के सपने देखते थे, उस पर कोई दूसरा बैठा होगा।

हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाएँगे।

इस लिहाज़ से देखें, तो अंत में हम सबको अपने-अपने स्क्वायर वन पर ही लौटना है।

अब इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पैसा कमाना छोड़ दीजिए, करियर मत बनाइए या सपने देखना बंद कर दीजिए। पैसा ज़रूरी है, मेहनत ज़रूरी है और अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य बनाना भी ज़रूरी है।

लेकिन इन सबके बीच अपने वर्तमान को जीना भी तो ज़रूरी है!

जिस घर को बनाने के लिए आपने सालों मेहनत की, अगर उसमें परिवार के साथ बैठकर हँसने का समय ही नहीं मिला, तो क्या कमी रह गई?

जिस दौलत को कमाने के लिए आपने दिन-रात एक कर दिए, अगर उसे खर्च करते समय भी मन में डर बना रहा, तो उस दौलत का आनंद कहाँ है?

और जिस मंज़िल तक पहुँचने के लिए आपने पूरी ज़िंदगी लगा दी, अगर रास्ते में खिले फूलों को देखने की फुर्सत ही नहीं मिली, तो सफ़र में क्या देखा?

मुझे लगता है कि ज़िंदगी के अंत में हमारे पास सिर्फ़ यह हिसाब नहीं होना चाहिए कि हमने क्या-क्या हासिल किया। यह भी होना चाहिए कि हमने कितने लोगों को खुशियाँ दीं, कितने रिश्तों को सँभाला और कितने खूबसूरत पल जिए।

मैं चाहूँगा कि जब मेरी ज़िंदगी की शाम आए, तो मेरे पास अधूरे लक्ष्यों की लंबी सूची के बजाय यादों का एक सुंदर ख़ज़ाना हो।

मेरा सबसे बड़ा लक्ष्य—प्यार बाँटते चलो!

एक पुराना हिंदी फ़िल्मी गीत है—“प्यार बाँटते चलो”।

बस, यही बात मेरे दिल को छूती है।

प्यार बाँटते चलो। खुशियाँ बाँटते चलो। लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश करते चलो।

किसी की मदद कर सकते हो, तो करो। किसी को हँसा सकते हो, तो हँसाओ। किसी दोस्त का मन उदास है, तो उसके पास बैठो। माता-पिता अपनी पुरानी कहानी पंद्रहवीं बार सुना रहे हैं, तो शायद सोलहवीं बार भी सुन लो।

क्या पता, आपकी ज़िंदगी का कोई मामूली-सा पल किसी दूसरे की सबसे प्यारी याद बन जाए!

मैं भी ज़िंदगी को किंग साइज़ जीना चाहता हूँ।

लेकिन मेरे लिए किंग साइज़ का मतलब ज़रूरी नहीं कि महल जैसा घर हो, महँगी गाड़ी हो या विदेश में छुट्टियाँ मनाने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालता रहूँ।

मेरे लिए किंग साइज़ ज़िंदगी का मतलब है—मन भरकर जीना।

सड़क किनारे किसी चाय की दुकान पर घंटों बैठकर दोस्तों के साथ गप्पें मारना।

पुराने दोस्तों से मिलकर बचपन की शरारतों को याद करना।

बिना किसी योजना के अचानक कहीं घूमने निकल जाना।

परिवार के साथ बैठकर खाना खाना।

किसी बेवकूफ़ी भरे चुटकुले पर इतना हँसना कि आँखों में आँसू आ जाएँ।

और कभी-कभी सुबह की चाय के साथ चुपचाप बैठकर यह महसूस करना कि ज़िंदगी इतनी भी बुरी नहीं है!

अगर इन सब चीज़ों से मैं अपने जीवन का राजा बन सकता हूँ, तो मुझे अपना साम्राज्य मंज़ूर है।

मेरी गद्दी सड़क किनारे रखी प्लास्टिक की कुर्सी हो सकती है। मेरे दरबार में तीन दोस्त हो सकते हैं, जो क्रिकेट, राजनीति और महँगाई पर बहस करते हुए समोसे की प्लेट ख़त्म कर दें।

और मेरा शाही फ़रमान?

“भाई, एक चाय और लगवा दो!“

तो क्या मैं अपने लिए कोई लक्ष्य तय नहीं करता?

इतनी लंबी कहानी सुनाने के बाद अब आप कहेंगे कि भाई, कुछ लक्ष्य तो तुम्हारे भी होंगे!

जी हाँ, हैं तो सही।

मैं चाहता हूँ कि थोड़ा ज़्यादा हँसूँ और कम शिकायत करूँ।

जिन चीज़ों पर मेरा बस नहीं है, उनके लिए बेवजह परेशान होना कम करूँ।

ईमानदारी से काम करूँ, लेकिन हर घंटे को किसी प्रतियोगिता का हिस्सा न बना दूँ।

अपने प्रिय लोगों के साथ समय बिताऊँ और उन्हें यह एहसास कराता रहूँ कि वे मेरी ज़िंदगी में कितने महत्त्वपूर्ण हैं।

कुछ नया सीखता रहूँ, नई जगहें देखूँ और छोटी-छोटी चीज़ों में खुशियाँ ढूँढ़ता रहूँ।

और सबसे बढ़कर, जहाँ भी जाऊँ, वहाँ थोड़ा प्यार और थोड़ी मुस्कान छोड़ता चलूँ।

अब इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कल सुबह पाँच बजे उठने की उम्मीद मत पाल बैठिएगा।

इतनी भी जल्दी क्या है?

हो सकता है मैं सात बजे उठूँ, आठ बजे चाय पियूँ और नाश्ते के बाद दुनिया में शांति स्थापित करने निकल पड़ूँ।

या फिर दोपहर के खाने के बाद।

और अगर कल भी न हो पाया, तो परसों सही!

आख़िर आदतें इतनी आसानी से कहाँ जाती हैं!

लेकिन कोशिश जारी रहेगी। अपने तरीके से, अपनी गति से।

क्योंकि मैंने एक बात समझ ली है—ज़िंदगी सिर्फ़ किसी मंज़िल तक पहुँचने का नाम नहीं है, बल्कि रास्ते का आनंद लेने का नाम भी है।

कोई सबसे ऊँचा पहाड़ चढ़ना चाहता है। कोई दुनिया जीतना चाहता है। कोई इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहता है।

और हममें से कुछ लोग बस एक अच्छी, सुकून भरी ज़िंदगी चाहते हैं। अपना काम करते हुए, अपनों के साथ हँसते हुए और दुनिया में थोड़ी-सी अच्छाई छोड़ते हुए।

कौन-सा रास्ता सबके लिए सही है, यह मैं नहीं जानता।

लेकिन मुझे अपना रास्ता पसंद है।

अंत में बस इतनी-सी गुज़ारिश!

दोस्तों, लक्ष्य बनाइए, सपने देखिए, मेहनत कीजिए और सफलता हासिल कीजिए। अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य बनाइए। अपनी क्षमताओं को पहचानिए और जीवन में आगे बढ़िए।

लेकिन कभी-कभी रुक भी जाइए।

एक कप चाय पी लीजिए।

किसी पुराने दोस्त को फ़ोन कर लीजिए।

डूबते सूरज को देख लीजिए।

अपनी ही किसी बेवकूफ़ी पर हँस लीजिए।

और याद रखिए कि आप एक इंसान हैं, कोई ऐसा प्रोजेक्ट नहीं जिसे हर दिन पहले से बेहतर बनाना अनिवार्य हो!

जहाँ तक मेरी बात है, मैं तो अपना काम करता रहूँगा, हनुमान जी पर भरोसा रखूँगा और ज़िंदगी को किंग साइज़ जीने की कोशिश करता रहूँगा।

और अगर कभी आप मुझे किसी चाय की दुकान पर दोस्तों के साथ बैठकर हँसते हुए और “प्यार बाँटते चलो” गुनगुनाते हुए देखें, तो मेरे पास आकर पाँच साल की योजना मत पूछिएगा।

बस एक कुर्सी खींचकर बैठ जाइए।

चाय मँगवाइए।

और गपशप में शामिल हो जाइए।

आख़िर जब एक दिन सबको खाली हाथ ही लौटना है, तो क्यों न इस सफ़र को यादगार बनाया जाए? क्यों न कुछ प्यार बाँटा जाए? क्यों न कुछ खुशियाँ बटोरी जाएँ?

ज़िंदगी छोटी-सी है, यार! इसे सिर्फ़ गुज़ारिए मत, जी भरकर जिएँ।

प्यार बाँटते चलो, खुशियाँ बाँटते चलो। ज़िंदगी मिली है तो मुस्कुराते चलो!

जय बजरंगबली!


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