संयुक्त परिवार की वो रातें, और अज़ान व घंटियों वाली सुबह
बिजली जाने की रातें · संयुक्त परिवार की यादें · बहराइच से
शाम का धुँधलका उतर चुका था। आँगन में आंटी दाल छौंक रही थीं, मम्मी रोटियों की गिनती में उलझी थीं, और छत पर हम सात भाई और एक बहन पतंग की डोर सुलझाने का नाटक कर रहे थे। तभी, खट! पंखे ने आख़िरी साँस ली, बल्ब ने एक बार पलक झपकाई और पूरे घर पर काली चादर तन गई।
एक सेकंड की ख़ामोशी। फिर आँगन से, रसोई से, छत से, एक साथ बहुत सारे गलों से एक ही नारा फूटा: “लाइट गई!”
हमारे घर में ये दो शब्द किसी सायरन से कम नहीं थे। इनका मतलब था: आज रात छत की रात है। आज बिस्तर नहीं बिछेंगे, छत का फ़र्श ही बिस्तर होगा। आज कोई टीवी नहीं, कोई जल्दी नहीं। बस ऊपर आसमान, नीचे दरी, और चारों तरफ़ वो पूरा परिवार जिसे गिनने में मम्मी को हर बार दो बार कोशिश करनी पड़ती थी।
बिजली जाने की रातें, यानी वो रातें जब रोशनी बुझती थी और रिश्ते जल उठते थे। चलो, आज तुम्हें उन्हीं रातों में ले चलता हूँ। पानी का गिलास पास रख लो। फ़ोन चाहे हाथ में ही रहे, मैं बुरा नहीं मानूँगा। बस थोड़ी देर के लिए, ऊपर आसमान की तरफ़ भी देख लेना।
बिजली गई तो आसमान क़रीब आ गया,
हर छत पे तारों का इक मेला सजा गया।
एक घर, इतने दिल कि गिनती भूल जाए
हमारा घर संयुक्त परिवार का वो पुराना, भरा-पूरा घर था जहाँ “कितने लोग रहते हैं” का सही जवाब आज तक किसी के पास नहीं है। सात भाई, एक बहन, कई चाचा, कई चाचियाँ, कभी कोई मेहमान जो “दो दिन के लिए” आया और दो हफ़्ते टिक गया, और बीच-बीच में वो रिश्तेदार जिनका रिश्ता समझाने में पाँच मिनट लगते थे।
रसोई पर दो महारानियों का राज था: मम्मी और आंटी। एक के हाथ में आटे की नरमी, दूसरी के हाथ में छौंक की ख़ुशबू, और दोनों की एक ही नीति: “जो आए, खाकर जाए।” तवे पर रोटियाँ ऐसे बनती थीं जैसे किसी कारख़ाने में, और थाली में कभी किसी ने अपनी पसंद की सब्ज़ी नहीं माँगी, क्योंकि वहाँ जो बनता था वही पसंद हो जाता था।
सात भाइयों की इकलौती बहन होने का मतलब क्या होता है, ये हमारी बहन से पूछो। सबसे ज़्यादा लाड़ और सबसे ज़्यादा हुकूमत। छत पर सोने की जगह तय करनी हो तो उसकी पसंद पहले, कहानी की फ़रमाइश करनी हो तो उसकी बारी पहले, और किसी भाई ने ग़लती से भी उसकी चप्पल पहन ली, तो पूरी अदालत बैठ जाती थी।
इन सबके बीच दो किरदार ऐसे थे जिनके बिना ये कहानी पूरी हो ही नहीं सकती: राधे मामा और मुन्नू चाचा।
राधे मामा और वो एक ग़लत सुना हुआ शब्द
राधे मामा का क़द थोड़ा ऊँचा, दुबले पतले और स्वभाव थोड़ा नाज़ुक था, मतलब वही नाज़ुक जो शीशे की तरह नहीं, छुई-मुई की तरह होता है। कान उन्हें ज़रा धोखा दे जाते थे, पर दिल वो कभी धोखा नहीं देता था। मुश्किल बस ये थी कि आधी बात सुनकर वो पूरी बात का मतलब ख़ुद गढ़ लेते थे, और अक्सर उनका मतलब यही निकलता था कि सब मिलकर उन्हीं पर हँस रहे हैं।
उस रात पूर्णिमा थी। हम सब छत पर लेटे थे। चाँद इतना बड़ा और इतना साफ़ निकला था कि मुन्नू चाचा बच्चों जैसी ख़ुशी से बोल उठे, “अरे वाह, आज तो चाँद कितना गोल है!”
मामा से शरारत
मुँडेर के पास बैठे मामा के कान तक बस आख़िरी हिस्सा पहुँचा: “…कितना गोल है!” और ठीक उसी वक़्त, ऐसा संयोग देखो, हम भाइयों में से किसी की पुरानी शरारत पर हँसी का फ़व्वारा फूट पड़ा। मामा के माथे पर बल पड़ गए। उन्होंने मूँछों पर हाथ फेरा, गला साफ़ किया और ऐलान किया: “कौन गोल है? किसको बोला? मुझे बोला?”
हम सब ख़ामोश। मामा और भड़क गए। “हम सब समझते हैं! सब मिलकर हमें गोलू बना रहे हो!” और वो उठे, चप्पल पहनी, और सीधे मम्मी की अदालत में पहुँच गए, जहाँ मम्मी चटाई पर बैठी पंखा झल रही थीं। “मम्मी, सुना आपने? ये लड़के हमारा मज़ाक़ उड़ा रहे हैं!”
मम्मी ने अपनी हँसी दबाकर कहा, “राधे, चाँद की बात हो रही थी।”
मामा ने थोड़ी देर सोचा, फिर गंभीर होकर पूछा, “चाँद? तो चाँद हमें देखकर हँस क्यों रहा था?”
उसके बाद क्या हुआ, ये बताने की ज़रूरत नहीं। पूरी छत हँसी से गूँज उठी। इस बार सबसे ऊँची हँसी ख़ुद राधे मामा की थी, क्योंकि जैसे ही बात समझ आई, उन्होंने ही सबसे पहले ठहाका मारा और कहा, “अरे, तुम लोग बताते क्यों नहीं! मैंने तो सोचा…” फिर रुककर, “ख़ैर, चाँद है भी तो गोल।”
अगली शाम मोहल्ले में उन्होंने ये क़िस्सा सुनाया, मगर अपने संस्करण में, जहाँ वो एक बहादुर इंसान थे जिसने अपनी इज़्ज़त के लिए पूरी छत से लोहा लिया। हम बच्चे जानते थे कि असली क़िस्सा क्या है, मगर कभी टोकते नहीं थे। कारण सीधा था: मामा का रूठना हमारे लिए फ़िल्म के इंटरवल जैसा था, क्योंकि असली मज़ा उसके बाद आता था: मनाना। मम्मी का उनके कंधे पर हाथ रखना, मुन्नू चाचा का गरम चाय का कप लेकर पहुँचना, और मामा का नाराज़गी से मुस्कान तक का वो छोटा-सा सफ़र, जिसे देखने के लिए हम साँस रोके बैठे रहते थे।
मुन्नू चाचा: जिन्हें अँधेरे में सबसे साफ़ दिखता था
अगर राधे मामा हमारे घर की नाटकीयता थे, तो मुन्नू चाचा उसकी धड़कन थे। आँखों की रोशनी उनकी ज़रा कम थी, चश्मे का शीशा मोटा, मगर घर का ऐसा कोई काम नहीं था जो उनके हाथों से होकर न गुज़रता हो। भाभियों के लिए, यानी मम्मी और आंटी के लिए, वो हर वक़्त हाज़िर रहते। “भाभी, आप बैठिए, मैं देखता हूँ,” ये उनका तकिया-कलाम था। और जब कोई हँसकर कहता, “चाचा, आप कैसे देखेंगे?” तो वो अपने हाथ उठाकर कहते, “अरे, मैं हाथों से देखता हूँ, आँखों से तो सब देख लेते हैं!”
सब्ज़ी लाना, आटा पिसवाना, पानी भरना, गैस का सिलेंडर बदलना, हम बच्चों के जूते ढूँढ़ना, मेहमानों के लिए चाय बनाना, सब कुछ। और ये सब वो गुनगुनाते हुए करते थे। किशोर कुमार के पुराने गाने उनकी ज़ुबान पर ऐसे चढ़े थे जैसे कोई अपना ही नाम याद रखता है। उनकी जेबें हमारे लिए ख़ज़ाने की पेटियाँ थीं: कभी संतरे की गोलियाँ, कभी पारले-जी का पैकेट, कभी बस एक चवन्नी जो वो आँख मारकर थमा देते थे।
सबसे प्यारे चाचा
इसीलिए वो घर के सबसे प्यारे चाचा थे। बच्चों के लिए तो वो चाचा से ज़्यादा दोस्त थे। हमारी सारी शिकायतें, सारे राज़, सारी फ़रमाइशें सबसे पहले उन्हीं तक पहुँचती थीं।
मगर मुन्नू चाचा का असली जलवा तब दिखता था जब बिजली जाती थी।
जिस पल अँधेरा घिरता, सबके हाथ-पैर ठिठक जाते। कोई सीढ़ी पर डरता, कोई कोने में टकरा जाता। और तब अँधेरे के बीच से एक आवाज़ गूँजती: “आ जाओ सब, पकड़ो मेरा कुरता!” हम सब बच्चे एक के पीछे एक उनके कुरते का कोना थाम लेते, और मुन्नू चाचा सीढ़ियाँ चढ़ने लगते, बिना टटोले, बिना रुके, बिना किसी मोमबत्ती के। उन्हें घर की हर सीढ़ी, हर मोड़, हर चौखट हथेली की तरह याद थी। वो हँसकर कहते, “आज तुम सब मेरे स्कूल में हो, और मैं हेडमास्टर।” पीछे से हम “मुन्नू चाचा एक्सप्रेस, छुक-छुक छुक-छुक” करते हुए छत तक पहुँच जाते।
जो उजाले में पीछे था, अँधेरे में आगे चला,
जिसे दिल से दिखता हो, उसे चराग़ों की क्या ज़रूरत।मौलिक शेर
छत का फ़र्श, एक पूरी बिरादरी का बिस्तर
छत पर पहुँचकर पहला काम होता था बाल्टी से पानी के छींटे मारना। दिन भर की तपी ईंटों पर पानी पड़ता और सोंधी-सी भाप उठती, गीली मिट्टी और पहली बारिश की मिली-जुली ख़ुशबू। फिर दरियाँ बिछतीं, उन पर चादरें, और चादरों पर तकिये, इतने तकिये कि गिनती में हर रात एक-दो कम पड़ ही जाते, और फिर वही पुरानी लड़ाई: “ये मेरा है!” “नहीं, मेरा!”
मुँडेर के पास चाचाओं की क़तार लगती, बीच में बच्चे, और सबसे सुरक्षित कोने में मम्मी, आंटी और हमारी बहन। मटके का ठंडा पानी बीच में रखा जाता, ऊपर उल्टा गिलास, और एक कोने में कछुआ छाप की महकती लकीर। फ़र्श अब भी हल्का गर्म था, पीठ को ऐसी राहत मिलती थी जैसे किसी ने गर्म हथेली रख दी हो। और ऊपर, ऊपर था वो आसमान, जिसे देखने के लिए आज लोग हिल स्टेशन जाते हैं।
रात गहराती तो चाचाओं के खर्राटे शुरू होते, और उनकी अपनी बारी-बारी की शिफ़्टें चलतीं। एक चाचा का खर्राटा “भों-भों”, दूसरे का “सीं-सीं”, और तीसरे का तो पूरी धुन थी, आरोह-अवरोह के साथ। हम बच्चे दबी हँसी में लोटते रहते, जब तक मम्मी की धीमी डाँट न आती: “अब सो जाओ, सुबह उठना भी है।”
रात की महफ़िल: क़िस्से, पहेलियाँ और सात भाइयों की सरदार बहन
मगर सोने से पहले एक रस्म होती थी, और वो रस्म बिजली जाने की रातों का असली दिल थी: क़िस्सों की महफ़िल। इसका उद्घाटन हमेशा हमारी बहन करती थी। “सबसे पहले मेरी फ़रमाइश,” वो ऐलान करती, और सातों भाई ऐसे सिर झुका लेते जैसे दरबार में रानी ने हुक्म सुनाया हो। फ़रमाइश आमतौर पर एक ही होती: “चाचा, वो वाली सुनाओ, जिसमें राजा की नाक कट जाती है।”
फिर चाचाओं की बारी आती। कोई अपने कॉलेज के दिनों की शरारत सुनाता, कोई रेल के सफ़र की, कोई उस बारात की जिसमें दूल्हा ग़लत घर पहुँच गया था। बीच-बीच में पहेलियाँ चलतीं: “एक थाल मोतियों से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा।” और जवाब देने की होड़ में हम भाई आपस में उलझ जाते, जबकि जवाब ऊपर ही टँगा होता था, चमकता हुआ।
मस्ती का आलम
कभी-कभी अंताक्षरी छिड़ जाती, और तब राधे मामा की शान देखने लायक होती थी। गाने के बोल उन्हें कुछ अपने ढंग से सुनाई देते, और वो पूरे आत्मविश्वास से अपने ढंग से गाते। असली बोल की जगह उनका गढ़ा हुआ बोल इतना बेहतर निकलता कि हम सब बाद में उसी को असली मानकर गाने लगते। आज भी कभी रेडियो पर वो गाना बजे तो हमारी ज़ुबान से अनायास मामा वाली पंक्ति निकल जाती है।
बग़ल की छत से अक्सर चौबे अंकल की गूँजती आवाज़ भी आती, जो अपनी भारी आवाज़ में किसी भूतिया पीपल की कहानी बाँध रहे होते। हम सब कान उसी तरफ़ लगा देते। उनकी छत पर बिन्नू अपनी टॉर्च से हाथों की परछाइयाँ बनाकर हमें इशारे करता, कभी ख़रगोश, कभी मगरमच्छ, और कभी वो अजीब-सा जीव जो हाथी कम और परेशान भैंस ज़्यादा लगता था। इधर से हम सब सीटियाँ बजाकर वाह-वाह करते।
फिर आता था वो सवाल जो हर रात किसी न किसी के मुँह से निकलता: “बड़े होकर क्या बनोगे?” कोई पायलट, कोई क्रिकेटर, कोई सीधा तेंदुलकर। एक भाई ने एक रात ऐलान किया कि वो बड़ा होकर “बिजली विभाग का मालिक” बनेगा, ताकि जब चाहे बिजली जाए और जब चाहे आए। उस रात हम सब ने उसे ख़ूब आशीर्वाद दिया और उसी वक़्त मुन्नू चाचा बोले, “पर बेटा, तब ये रातें कौन देगा?” उस सवाल पर पूरी छत सोच में पड़ गई।
जब “आ गई!” पर किसी ने ताली नहीं बजाई
बिजली आती तो पहले तो हर तरफ़ से “आ गई!” की चीख़ उठती, और फिर, ये मैं तुम्हें बता दूँ, हमारे घर में एक अजीब-सा नियम था: जिसे देखकर हर किसी को ख़ुश होना चाहिए था, उसी पर कोई ताली नहीं बजाता था। नीचे आँगन में बल्ब जल उठता, पंखे घर्र-घर्र करके जाग जाते, और छत पर से हम सब एक-दूसरे को देखते जैसे किसी ने नींद से जगा दिया हो।
फिर मुन्नू चाचा चुपचाप उठते, सीढ़ियाँ उतरकर जाते और मेन स्विच बंद कर आते। लौटकर कहते, “अभी बिजली विभाग वालों को थोड़ा और सोने दो, हमें कहानी पूरी करने दो।” और छत पर एक बार फिर ठहाके गूँज उठते। उस रात बिजली हमारे लिए दुश्मन नहीं थी, बस एक मेहमान थी जो ग़लत वक़्त पर आ गई थी।
उजाला लौटा तो हमने ख़ुद ही बुझा दिया,
कुछ रातें रोशनी से ज़्यादा रौशन थीं।
वो सुबह, जो सिर्फ़ हमारी थी
और फिर आती थी वो सुबह, जिसकी ख़ातिर शायद ये पूरी रात रची गई थी।
कोई अलार्म नहीं, कोई घड़ी नहीं। आँख खुलती तो एक आवाज़ से, पूरी तरह से बिन बुलाए, हवा में घुलती हुई: नानपारा मस्जिद की अज़ान। इतनी दूर से, ठंडी हवा पर सवार, नरम और साफ़। उसमें न कोई जल्दी थी, न कोई शोर। बस एक पुकार, जो छतों के ऊपर से बहती हुई सीधे हमारी पलकों पर आकर बैठ जाती थी।
हम आँखें खोलते तो आसमान स्याह से धीरे-धीरे राख जैसा नीला हो रहा होता। चादर पर ओस की ठंडक होती, और मुँडेर पर कबूतर अपनी जगह बनाने के लिए गुटर-गूँ कर रहे होते। कोई करवट बदलता, कोई चादर खींचकर कहता, “थोड़ा और।” मगर कोई उठता नहीं था, क्योंकि सबको पता था कि अब कुछ और आने वाला है।
और कुछ देर बाद, जब अज़ान की आख़िरी गूँज हवा में घुलकर ग़ायब हो जाती, तभी गुड़री रोड वाले मंदिर की घंटी की आवाज़ आने लगती। टन-टन, टन-टन, धीमे-धीमे, जैसे कोई आसमान को धीरे से थपथपाकर जगा रहा हो। वो घंटी हमारे कानों तक आते-आते अज़ान की उसी हवा में घुल जाती, जैसे दो नदियाँ किसी संगम पर मिल रही हों। उस पल छत पर कोई कुछ नहीं बोलता था। वातावरण में कुछ ऐसा दैवीय होता था कि हम बच्चे भी, जो दिन भर शोर मचाते थे, चुपचाप लेटकर बस सुनते रहते।
मन मगन
इधर अज़ान का नूर, उधर घंटी की सदा,
एक ही आसमान में दोनों, एक-सी दुआ।
तभी सीढ़ियों पर किसी के क़दमों की आहट आती और साथ में चाय की ख़ुशबू। मुन्नू चाचा, हाथ में केतली और पीछे कुल्हड़ों की थैली लिए, बिना टटोले ऊपर आ जाते। “भाभी लोग उठ गई हैं? लो, चाय पियो, सब लोग।” और उनके पीछे-पीछे मम्मी और आंटी भी चादरें समेटती आतीं। राधे मामा आँखें मलते हुए पूछते, “रात को क्या-क्या हुआ? मुझे किसी ने बताया क्यों नहीं?” और हम सब ठहाका मारकर कह उठते, “मामा, आपने ही तो सबसे ज़्यादा सुनाया!”
वो सुबह हमारी थी। इस घर की, इन लोगों की, इस छत की। हर रात की कहानी के बाद एक ऐसी सुबह, जिसमें दो इबादतों की आवाज़ें एक ही आसमान के नीचे गले मिलती थीं।
आज की रात: वही छत, नया रंग
पिछले महीने लखनऊ में एक शाम बिजली गई। फ़्लैट की खिड़कियों से सामने की इमारत भी अँधेरे में डूबी दिखी। घर के बच्चे, यानी वो सब जिन्होंने बिजली जाने की रातें कभी देखी ही नहीं थीं, पहले तो परेशान हुए। “वाई-फ़ाई गया!” किसी ने कहा। “बैटरी बस बीस प्रतिशत है!” किसी ने जोड़ा।
तभी हमारे बीच का एक भाई, जो उस दिन आया हुआ था, हँसकर बोला, “चलो, छत पर चलते हैं।” बच्चों ने पूछा, “क्यों?” वो बोला, “क्योंकि आज चाँद गोल है।” और मैं ख़ुद अपनी हँसी नहीं रोक पाया।
गर्मियों की रात
हमने छत पर दरी बिछाई। बच्चों ने अपने फ़ोन की टॉर्च जलाई, लेकिन मज़े की बात देखो, उन्होंने फ़ोन नीचे नहीं रखा, ऊपर उठा लिया। और फिर टॉर्च की रोशनी में उनकी उँगलियों से दीवार पर परछाइयाँ बनने लगीं। मैंने उन्हें हाथी बनाना सिखाया, और जो बना वो वही पुराना हाथी-भैंस था। बच्चे हँस-हँसकर लोट गए। एक बच्ची ने उसकी रील बना ली, जिसे देखकर हमारे बाक़ी भाई-बहन अलग-अलग शहरों से कमेंट करने लगे। किसी ने लिखा, “ये तो बिन्नू वाला हाथी है!” कोई बोला, “मुन्नू चाचा देखते तो पूरी गली में सुनाते।”
फिर किसी ने ग्रुप कॉल लगा दी। फ़ोन की स्क्रीन पर एक-एक कर चेहरे जुड़ते गए, दिल्ली से, पुणे से, बहराइच से। हमारी बहन ने सबसे पहले फ़रमाइश रखी: “सब सुनो, राधे मामा वाला ‘गोल’ क़िस्सा फिर से सुनाओ।” और फिर जो हुआ, वो मैं बता नहीं सकता। हर कोई अपनी जगह से उस पुरानी रात को दोहरा रहा था, और स्पीकर पर पंद्रह लोगों की हँसी इस तरह गूँजी कि बच्चे हैरान होकर पूछने लगे, “ये सब इतना हँस क्यों रहे हैं?”
मैंने कहा, “क्योंकि ये क़िस्सा अब आपका भी है।”
उस रात फ़ोन ने हमें एक-दूसरे से दूर नहीं किया, पास ही किया। बस फ़र्क़ ये था कि उसकी रोशनी पहली बार किसी का चेहरा चमकाने के बजाय किसी की कहानी रोशन कर रही थी। बैटरी बीस से पाँच प्रतिशत पर आ गई, मगर किसी को परवाह नहीं थी, क्योंकि पास में चार्जर था और साथ में पूरा परिवार था।
आख़िर में: रोशनी बुझाना भी एक कला है
कई बार लोग पूछते हैं कि इतनी पुरानी बातों को क्यों दोहराते रहते हो। जवाब ये है कि मैं पुरानी बातें नहीं दोहरा रहा। मैं उस स्वाद को दोहरा रहा हूँ, जो एक छत पर बीस लोगों के साथ सोने से आता है, जो एक चाचा के कुरते का कोना पकड़कर अँधेरी सीढ़ियाँ चढ़ने से आता है, जो एक ग़लत सुने हुए शब्द पर पूरे परिवार के ठहाके से आता है।
शायद हम बीता हुआ कल नहीं, वो फ़ुर्सत याद करते हैं जो उसमें थी। और अच्छी बात ये है कि वो फ़ुर्सत अब भी हमारे पास है, बस उसे जगाने के लिए कभी-कभी रोशनी ख़ुद बुझानी पड़ती है। फ़ोन का इस्तेमाल बंद नहीं करना, बस उसे कहानी सुनाने वाला बनाना है। किसी को फ़ोन करो, छत पर चढ़ो, ऊपर देखो। हो सकता है कोई राधे मामा तुम्हारे इंतज़ार में बैठा हो, कोई मुन्नू चाचा चाय की केतली लिए।
अब तुम्हारी बारी
अपने बचपन की वो एक चीज़ कमेंट में लिखो जो आज किसी ऐप में नहीं मिलती। छत की रात हो, किसी मामा का रूठना हो, किसी चाचा की जेब की गोलियाँ हों, या किसी सुबह की अज़ान और घंटी, जो भी हो। मैं हर कमेंट पढ़ता हूँ।
और ये कहानी उसे भेजो जो उस रात तुम्हारे साथ छत पर था। हो सकता है वो भी आज रात किसी तारे को देखकर तुम्हें याद कर रहा हो।
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