What’s a personal mantra or philosophy you live by?
View all responses
मेरी जिंदगी का वह मंत्र, जिसने मुझे कई बार टूटने से बचाया
कुछ लोग जिंदगी जीने के लिए नियम बनाते हैं।
कुछ लोग सिद्धांत बनाते हैं।
और कुछ लोग बस एक लाइन पकड़ लेते हैं और जिंदगी भर उसी से लड़ते-भिड़ते, गिरते-पड़ते, उठते-बैठते आगे बढ़ते रहते हैं।
मैं शायद तीसरी श्रेणी का आदमी हूँ।
मेरी जिंदगी का मंत्र बहुत बड़ा नहीं है। कोई संस्कृत का कठिन श्लोक नहीं, कोई मोटिवेशनल किताब का भारी-भरकम सिद्धांत नहीं।
बस चार शब्द हैं—
“कभी अलविदा न कहना।”
या थोड़ा अंग्रेज़ी वाला अंदाज़ रखें तो—
Never Say Die.
अब आप कहेंगे—“भाई, यह तो बहुत सुना हुआ है।”
बिल्कुल सुना हुआ है।
लेकिन जिंदगी की मजेदार बात यही है कि कई बार सबसे पुराने वाक्य ही सबसे ज्यादा काम आते हैं।
जैसे माँ की डाँट।
पिता की चुप्पी।
पुराने दोस्तों की गाली।
और वह आवाज़ जो भीतर से कहती है—
“अभी कहानी खत्म नहीं हुई है।”
जब जिंदगी ने कहा—“बस, अब बहुत हुआ”
मेरी जिंदगी में भी ऐसे दिन आए हैं जब लगा कि शायद अब आगे कुछ बचा नहीं है।
काम अटक गया।
पैसे की चिंता।
किसी योजना का फेल हो जाना।
किसी अपने का व्यवहार उम्मीद के उलट निकलना।
कभी खुद पर भरोसा कम होना।
और कभी ऐसा भी लगा कि दुनिया बहुत तेज भाग रही है और मैं वहीं खड़ा हूँ, हाथ में अपना पुराना बैग लिए।
ऐसे समय में आदमी दूसरों से नहीं हारता।
वह अपने दिमाग से हारने लगता है।
दिमाग बड़ा चालाक जीव है।
जब सब अच्छा चल रहा हो तो वह कहता है—
“देखा! तुम कमाल हो।”
और जब दो चीजें खराब हो जाएँ तो वही दिमाग कहता है—
“तुमसे कुछ नहीं होगा।”
मैंने धीरे-धीरे समझा कि दोनों बातें पूरी तरह सच नहीं हैं।
अच्छे दिन आपको महान नहीं बनाते।
और बुरे दिन आपको निकम्मा नहीं बना देते।
दिन बदलते हैं। आदमी को बस मैदान नहीं छोड़ना चाहिए।
यही शायद Never Say Die का पहला पाठ है।
एक चाय, दो आदमी और जिंदगी का दर्शन
एक बार की बात है।
मैं एक चाय की दुकान पर बैठा था।
दुकान वही भारतीय किस्म की थी—एक तरफ उबलती हुई चाय, दूसरी तरफ बिस्कुट के डिब्बे, सामने प्लास्टिक की कुर्सियाँ और पीछे रेडियो, जो अपनी मर्जी से कभी गाना बजाता था, कभी समाचार।
वहीं एक बुजुर्ग सज्जन बैठे थे।
उम्र लगभग सत्तर के आसपास होगी।
मैंने उनसे बातचीत शुरू कर दी।
उन्होंने अपनी जिंदगी की कई बातें सुनाईं।
व्यापार में नुकसान हुआ था।
एक समय ऐसा आया जब घर चलाना भी मुश्किल हो गया था।
मैंने पूछा—
“फिर आपने क्या किया?”
उन्होंने चाय का कप मेज पर रखा और बोले—
“क्या करता? अगली सुबह फिर दुकान खोल दी।”
बस।
इतना ही।
न कोई TED Talk।
न कोई मोटिवेशनल कोट।
न कोई “Believe in yourself” वाला भाषण।
अगली सुबह दुकान खोल दी।
मैं काफी देर तक उस बात के बारे में सोचता रहा।
शायद जिंदगी में बहादुरी का मतलब हमेशा बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ना नहीं होता।
कभी-कभी बहादुरी का मतलब सिर्फ इतना होता है कि—
कल जो हुआ, उसे कल के साथ छोड़कर आज फिर दुकान खोल देना।
हम हारते कहाँ हैं?
हम अक्सर समझते हैं कि हार तब होती है जब हम असफल हो जाते हैं।
मुझे ऐसा नहीं लगता।
हार शायद तब होती है जब हम कोशिश करना बंद कर देते हैं।
एक परीक्षा में असफल होना हार नहीं है।
एक बिजनेस का बंद हो जाना हार नहीं है।
किसी नौकरी का छूट जाना हार नहीं है।
किसी रिश्ते का टूट जाना भी जरूरी नहीं कि हार हो।
लेकिन अपने बारे में यह तय कर लेना कि—
“अब मुझसे कुछ नहीं होगा।”
शायद असली हार वहीं से शुरू होती है।
इसलिए मैं असफलता से इतना नहीं डरता जितना उस दिन से डरता हूँ जब मैं कोशिश करना छोड़ दूँ।
क्योंकि जब तक कोशिश बाकी है—
कहानी बाकी है।
बचपन में हमें गिरना आता था
कभी आपने छोटे बच्चे को साइकिल चलाते देखा है?
पहली बार वह गिरता है।
फिर उठता है।
फिर गिरता है।
फिर उठता है।
फिर कोई उसे पकड़कर चलाता है।
फिर वह अकेले चलता है।
और कुछ महीनों बाद वही बच्चा साइकिल लेकर इतनी तेजी से निकलता है कि माँ पीछे से चिल्लाती है—
“धीरे चला!”
बच्चा सुनता नहीं।
क्यों?
क्योंकि उसने अभी तक यह दर्शन नहीं सीखा कि—
“अगर मैं गिर गया तो लोग क्या कहेंगे?”
हम बड़े होकर यह सीख जाते हैं।
यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है।
बच्चा गिरने को सीखने का हिस्सा समझता है।
बड़ा आदमी गिरने को अपनी इज्जत का सवाल बना लेता है।
और फिर गिरने से बचने के लिए चलना ही बंद कर देता है।
मेरा मंत्र मुझे बार-बार उस बच्चे की याद दिलाता है।
गिरो। चोट लगेगी। धूल झाड़ो। फिर चलो।
बस।
कभी-कभी जिंदगी आपको बेवकूफ समझती है
और सच कहूँ तो Never Say Die वाला आदमी बाहर से थोड़ा बेवकूफ भी दिखाई दे सकता है।
लोग कहेंगे—
“अरे भाई, छोड़ो अब।”
“इस उम्र में क्या नया करोगे?”
“यह काम तुमसे नहीं होगा।”
“बहुत लोग कोशिश करके देख चुके हैं।”
“इतना आसान नहीं है।”
और सबसे खतरनाक वाक्य—
“Practical बनो।”
मैं Practical होने के खिलाफ नहीं हूँ।
लेकिन मैंने देखा है कि दुनिया में बहुत सी अच्छी चीजें पहले किसी को अव्यावहारिक लगी थीं।
हर नया विचार शुरुआत में थोड़ा पागल लगता है।
हर नई शुरुआत में थोड़ा जोखिम होता है।
और हर सपने के साथ एक आवाज आती है—
“तुम कौन होते हो इसे करने वाले?”
मेरे पास उस आवाज का एक ही जवाब है—
“देखते हैं।”
क्योंकि कई बार जिंदगी को चुनौती देने के लिए आत्मविश्वास से ज्यादा जरूरी होता है—थोड़ा सा जिद्दी होना।
जिंदगी कोई सीधी सड़क नहीं है
हम चाहते हैं कि जिंदगी एक एक्सप्रेसवे की तरह चले।
सीधी सड़क।
साफ रास्ता।
कोई ट्रैफिक नहीं।
हर जगह बोर्ड लगा हो—
“यहाँ से सफलता 12 किलोमीटर।”
लेकिन जिंदगी Lucknow की पुरानी गलियों जैसी है।
कहीं सड़क अचानक संकरी हो जाती है।
कहीं सामने से रिक्शा आ जाता है।
कहीं कोई दुकान वाला अपना सामान सड़क पर फैला देता है।
कहीं आप गलत मोड़ ले लेते हैं।
और कभी-कभी तो Google Maps भी कह देता है—
“Recalculating…”
मेरी जिंदगी ने भी कई बार recalculate किया है।
मैंने कुछ सोचा था।
हुआ कुछ और।
कहीं पहुँचना था।
पहुँच कहीं और गया।
कभी लगा कि यह रास्ता गलत है।
फिर बाद में समझ आया—
शायद रास्ता गलत नहीं था।
बस मंजिल बदल रही थी।
Never Say Die का मतलब यह नहीं कि हमेशा जीतोगे
यह बात बहुत जरूरी है।
Never Say Die का मतलब यह नहीं है कि जिंदगी में आप हमेशा जीतेंगे।
नहीं।
आप हारेंगे।
कई बार बुरी तरह हारेंगे।
कुछ लोग आपको छोड़कर चले जाएंगे।
कुछ सपने पूरे नहीं होंगे।
कुछ मौके हाथ से निकल जाएंगे।
कुछ दरवाजे आपके सामने बंद होंगे।
और कुछ दरवाजे आप जितना धक्का दें, खुलेंगे ही नहीं।
तब Never Say Die का मतलब बदल जाता है।
उस समय इसका मतलब जीतना नहीं होता।
उसका मतलब होता है—
“ठीक है। यह दरवाजा नहीं खुला। देखते हैं अगला कौन-सा है।”
यानी मंजिल से पहले रास्ते से दोस्ती कर लेना।
एक और चाय और एक छोटी-सी सीख
कुछ साल पहले एक परिचित से मुलाकात हुई।
उन्होंने कहा—
“यार, मेरी जिंदगी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा।”
मैंने पूछा—
“कितने दिन से?”
उन्होंने कहा—
“काफी समय से।”
मैंने पूछा—
“फिर भी सुबह उठते हो?”
उन्होंने कहा—
“हाँ।”
“नहाते हो?”
“हाँ।”
“काम पर जाते हो?”
“हाँ।”
“लोगों से बात करते हो?”
“हाँ।”
मैंने कहा—
“तो फिर तुम हार कैसे गए?”
वह मेरी तरफ देखने लगे।
मैंने कहा—
“तुम परेशान हो सकते हो। थके हुए हो सकते हो। टूटे हुए महसूस कर सकते हो। लेकिन तुम अभी भी चल रहे हो।”
कई बार हमें यह एहसास ही नहीं होता कि हम जितना सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा मजबूत हैं।
हम सोचते हैं कि हम जिंदगी से लड़ रहे हैं।
जबकि कई बार—
हमारा हर अगला दिन इस बात का सबूत होता है कि जिंदगी हमें अभी तक हरा नहीं पाई है।
मेरी जेब में कोई जादू की छड़ी नहीं है
मैं कोई संत नहीं हूँ।
मुझे भी गुस्सा आता है।
मैं भी परेशान होता हूँ।
मैं भी procrastinate करता हूँ।
कभी किसी काम को देखकर सोचता हूँ—
“कल कर लेंगे।”
फिर कल आता है और मैं कहता हूँ—
“सोमवार से शुरू करेंगे।”
सोमवार आता है तो—
“अगले महीने से।”
और कभी-कभी तो नया साल आ जाता है और पुराने सारे resolutions चुपचाप कोने में बैठे मुस्कुरा रहे होते हैं।
मैं भी इंसान हूँ।
मेरे अंदर डर भी है, संदेह भी है और थकान भी।
लेकिन शायद मेरी एक छोटी-सी जिद है—
मैं अंतिम फैसला बुरे दिन पर नहीं करता।
यह बात मैंने जिंदगी से सीखी है।
जब मन खराब हो, तब जिंदगी के बारे में अंतिम निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
जब रास्ता धुंधला हो, तब यह तय नहीं करना चाहिए कि मंजिल है ही नहीं।
और जब आप थके हों—
तो आराम कीजिए, रिटायर मत हो जाइए।
कभी अलविदा न कहना
मेरे लिए “कभी अलविदा न कहना” का अर्थ यह नहीं कि हर चीज को पकड़े रहो।
कभी-कभी कुछ लोगों को अलविदा कहना पड़ता है।
कुछ आदतों को अलविदा कहना पड़ता है।
कुछ पुराने विचारों को अलविदा कहना पड़ता है।
कुछ असफल योजनाओं को भी अलविदा कहना पड़ता है।
लेकिन एक चीज को अलविदा मत कहिए—
अपने आप को।
अपने भीतर बैठे उस इंसान को मत छोड़िए जो अभी भी कुछ नया करना चाहता है।
उस सपने को पूरी तरह मत मारिए जो अभी थोड़ा-सा जिंदा है।
उस उम्मीद को मत फेंकिए जो अंधेरे कमरे में छोटी-सी मोमबत्ती की तरह जल रही है।
क्योंकि जिंदगी में कभी-कभी बहुत कुछ खत्म हो जाता है।
लेकिन जब तक उम्मीद का एक छोटा-सा टुकड़ा बचा है—
कहानी फिर से शुरू की जा सकती है।
और अगर आज आपका दिन खराब है…
तो मेरी एक छोटी-सी सलाह है।
आज कोई बड़ा फैसला मत लीजिए।
आज खुद को दोष मत दीजिए।
आज अपनी पूरी जिंदगी का हिसाब मत लगाइए।
आज सिर्फ इतना कीजिए—
एक गिलास पानी पीजिए।
थोड़ा बाहर जाइए।
किसी अपने से बात कीजिए।
थोड़ा आराम कीजिए।
और खुद से कहिए—
“आज मुश्किल है। लेकिन यह पूरी जिंदगी नहीं है।”
सुबह फिर आएगी।
चाय फिर बनेगी।
सड़क फिर खुलेगी।
फोन फिर बजेगा।
कोई नया आदमी मिलेगा।
कोई पुराना दोस्त याद आएगा।
कहीं कोई नया अवसर छिपा होगा।
और शायद जिंदगी किसी मोड़ पर खड़ी होकर आपसे कहेगी—
“चलो, एक बार फिर कोशिश करते हैं।”
उस समय बस एक काम करना।
मुस्कुराना।
और कहना—
“चलो।”
क्योंकि अभी कहानी बाकी है…
मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दर्शन शायद यही है—
जीतने की गारंटी किसी के पास नहीं है।
लेकिन मैदान छोड़ने की जरूरत भी किसी को नहीं है।
गिरना पड़े तो गिरेंगे।
रोना पड़े तो रोएँगे।
थकेंगे तो आराम करेंगे।
गलतियाँ करेंगे तो उनसे सीखेंगे।
रास्ता बदलेगा तो रास्ता बदलेंगे।
लेकिन खुद को छोड़कर नहीं जाएंगे।
क्योंकि जिंदगी में बहुत सारे अध्याय ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ते समय लगता है कि कहानी खत्म हो गई।
फिर अगला पन्ना पलटते हैं।
और पता चलता है—
नहीं।
लेखक ने अभी अंतिम शब्द लिखा ही नहीं था।
इसलिए मैं अपनी जिंदगी की किताब के आखिरी पन्ने पर अभी कुछ लिखने को तैयार नहीं हूँ।
अभी तो बहुत कुछ बाकी है।
कुछ यात्राएँ बाकी हैं।
कुछ किताबें बाकी हैं।
कुछ कहानियाँ बाकी हैं।
कुछ दोस्तियाँ बाकी हैं।
कुछ सपने बाकी हैं।
कुछ गलतियाँ भी शायद बाकी हैं।
और सबसे जरूरी—
कुछ चमत्कार बाकी हैं।
इसलिए मेरा मंत्र आज भी वही है—
कभी अलविदा न कहना।
Never Say Die.
क्योंकि—
जब तक सांस है, तब तक संभावना है।
जब तक उम्मीद है, तब तक रास्ता है।
और जब तक कहानी बाकी है—
तब तक अंत कहाँ आया?
This story is incomplete without your thoughts—drop them below!