Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए, बिन्नू की कहानी, भारतीय भाषाएँ, अवधी, संस्कृत, कन्नड़, भारतीय साहित्य, लोकभाषा, भाषा और संस्कृति, मातृभाषा, भारतीय भाषाई विविधता बिन्नू की आँखों से — अवधी से संस्कृत, कन्नड़ से होते हुए इंसान तक की एक मज़ेदार, भावुक और थोड़ी शरारती यात्रा “संस्कृत किताब में नहीं, घर में बोलो!” बिन्नू…

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भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए: Part 2

भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए, बिन्नू की कहानी, भारतीय भाषाएँ, अवधी, संस्कृत, कन्नड़, भारतीय साहित्य, लोकभाषा, भाषा और संस्कृति, मातृभाषा, भारतीय भाषाई विविधता

बिन्नू की आँखों से — अवधी से संस्कृत, कन्नड़ से होते हुए इंसान तक की एक मज़ेदार, भावुक और थोड़ी शरारती यात्रा

भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए

“संस्कृत किताब में नहीं, घर में बोलो!”

बिन्नू की मुलाकात उस घर से जहाँ भाषा ने समय को चौंका दिया

एक बार जब बिन्नू कर्नाटक गए, ये घटना उनके मुँह से

और मैं आपको सच बताऊँ—दक्षिण भारत पहुँचते ही मेरी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि मुझे यह समझने में समय लगा कि कौन-सा शब्द अभिवादन है और कौन-सा मेरे लिए दिशा-निर्देश।

मैं सामने वाले को देखकर मुस्कुराता।

वह कुछ कहता।

मैं मुस्कुराता।

वह फिर कुछ कहता।

मैं फिर मुस्कुराता।

कुछ देर बाद मुझे लगा कि अगर यही चलता रहा तो लोग मुझे बहुत विनम्र आदमी समझेंगे।

लेकिन भाषाएँ ऐसी ही होती हैं।

पहले वे आपको बाहर खड़ा करती हैं।

फिर धीरे-धीरे दरवाज़ा खोलती हैं।

और इसी यात्रा में मुझे एक ऐसा परिवार मिला जिसने मुझे चौंका दिया।

घर में संस्कृत बोली जाती थी।

मैंने पूछा—

किताब वाली संस्कृत?”

उन्होंने कहा—

“हाँ।”

मैंने पूछा—

श्लोक वाली?”

“हाँ।”

“मतलब सुबह उठकर भी?”

हाँ।”

खाना खाते समय भी?”

“हाँ।”

और अगर बच्चा शरारत करे?”

उन्होंने कहा—

तब भी।

मैंने मन में कहा—

वाह! यह तो वह संस्कृत है जिसे मैंने कभी नहीं देखा।

मैंने संस्कृत को हमेशा किताब में देखा था।

यहाँ वह रसोई में खड़ी थी।

मैंने पहली बार महसूस किया—

भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए

किसी भाषा की उम्र उसकी किताबों से नहीं, उसकी आवाज़ से तय होती है।

वसंत माधव और उनकी पत्नी सावित्री का परिवार लगभग 37 वर्षों तक संस्कृत को दैनिक जीवन में बोलता रहा। कहानी 1989 के आसपास शुरू हुई, जब संस्कृत को घर की बातचीत का हिस्सा बनाने का निर्णय लिया गया।

अब सोचिए, किसी परिवार का यह निर्णय कितना असाधारण रहा होगा।

हमारे घरों में बच्चे से कहा जाता है—

अंग्रेज़ी सीखो।”

यहाँ कहा गया—

“संस्कृत बोलो।”

और बच्चा स्कूल पहुँचा तो एक और मजेदार स्थिति हुई।

स्कूल में शिक्षक कन्नड़ में बोल रहे थे।

बच्चा संस्कृत में।

शिक्षक कन्नड़ में।

बच्चा संस्कृत में।

मैं वहाँ होता तो शायद बीच में खड़ा होकर कहता—

“भाइयों, पहले तय कर लो कि मीटिंग की भाषा क्या होगी!”

लेकिन इसी घटना में भाषा की एक बहुत गहरी सच्चाई छिपी थी।

बच्चे के लिए संस्कृत कोई कठिन विषय नहीं थी।

वह उसके घर की भाषा थी।

माँ की आवाज़ उसी में थी।

पिता की आवाज़ उसी में थी।

घर की दिनचर्या उसी में थी।

इसलिए संस्कृत उसके लिए “प्राचीन” नहीं थी।

वह वर्तमान थी।

और तभी मुझे अपने बचपन के संस्कृत के श्लोक याद आए।

हमने पढ़े थे—

“सत्यमेव जयते।”

लेकिन कभी सोचा नहीं कि इस छोटे-से वाक्य में कितनी बड़ी बात है।

फिर—

“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।”

केवल इच्छा करने से काम पूरे नहीं होते, प्रयास करना पड़ता है।

बिन्नू के लिए तो यह श्लोक विशेष रूप से उपयोगी है।

क्योंकि मैंने जीवन में कई कामों की शुरुआत केवल इच्छा से की है।

पूरा किसी को नहीं किया।

लेकिन संस्कृत वाले ऋषियों ने हजारों साल पहले ही चेतावनी दे दी थी—

“भाई, सपना देखना ठीक है, उठकर काम भी कर लो।”

फिर एक दिन मैंने सुना—

“तमसो मा ज्योतिर्गमय।”

अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

और उसके बाद—

“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”

सब सुखी हों, सब निरोग हों।

मैं कुछ देर चुप रहा।

क्योंकि देखिए न—

गोंडा में डॉक्टर मरीज से पूछ रही थी—

“कहाँ पीर होत है?”

और हजारों वर्ष पुरानी संस्कृत की प्रार्थना कह रही थी—

“सर्वे सन्तु निरामयाः।”

अर्थात—

सब निरोग रहें।

भाषा बदल गई।

समय बदल गया।

भूगोल बदल गया।

लेकिन मनुष्य की चिंता वही रही।

दर्द कम हो।

अंधेरा हटे।

मनुष्य सुखी रहे।

तभी मुझे कन्नड़ की याद आई।

भाषा जब दिल की धड़कन बन जाए:

क्योंकि कर्नाटक की धरती पर भाषा केवल बोली नहीं जाती—वह गाई भी जाती है।

भक्ति-कविता की परंपरा में पुरंदर दास का नाम आता है। उनके गीतों ने कठिन आध्यात्मिक भावों को लोक के बीच गेय और सरल बनाया।

और उनकी प्रसिद्ध पंक्ति—

“ಜಗದೋದ್ಧಾರಣ ಆಡಿಸಿದಳೆ ಯಶೋದೆ…”

Jagadoddhārana āḍisidale Yaśōde…

अर्थात—यशोदा उस जगत के उद्धारक को अपने आँगन में खिलाती है।

अब सोचिए इस दृश्य को।

जिसे संसार ईश्वर मानता है—

वह माँ के लिए बच्चा है।

जिसे दर्शनशास्त्र ब्रह्म कहता है—

वह घर में खेल रहा है।

और भाषा?

भाषा ने दर्शन को गोद में बैठा दिया।

मैंने सोचा—

यही तो भाषा का असली काम है।

वह बड़ी से बड़ी बात को इतना अपना बना देती है कि हम उससे डरते नहीं, उससे रिश्ता बना लेते हैं।

संस्कृत ने ज्ञान को श्लोक बनाया।

कन्नड़ ने भक्ति को गीत बनाया।

अवधी ने जीवन को लोकगीत बनाया।

और तीनों मिलकर जैसे मुझसे कह रही थीं—

“बिन्नू, भाषा पढ़ने की चीज़ कम, जीने की चीज़ ज्यादा है।”

मैंने सिर हिलाया।

फिर धीरे से पूछा—

“लेकिन तीन पीढ़ियाँ एक भाषा कैसे बचा लेती हैं?”

घर के एक सदस्य ने कहा—

बोलते रहिए।”

बस।

इतना ही।

बोलते रहिए।

भाषा को बचाने की सबसे बड़ी रणनीति।

न कोई भारी अभियान।

न कोई भाषण।

और कोई सम्मेलन।

बस—

बोलते रहिए।

माँ बच्चे से।

बच्चा भाई से।

भाई पिता से।

और फिर वही भाषा अगली पीढ़ी में उतरती चली जाती है।

मैंने सोचा—

हम भाषा को बचाने के लिए कितने बड़े-बड़े उपाय खोजते हैं।

जबकि भाषा कहती है—

“पहले मुझसे बात तो करो।”

और शायद इसी बात ने मेरी पूरी यात्रा बदल दी।

क्योंकि अब मुझे समझ में आ रहा था—

अवधी में किसी का दर्द सुनना हो,
संस्कृत में किसी के लिए मंगलकामना करनी हो,
या कन्नड़ में किसी भक्ति-गीत को गाना हो—

हम हर बार उसी एक चीज़ की तलाश कर रहे हैं—एक-दूसरे तक पहुँचने की।

और तब मेरे भीतर एक सवाल उठा—

अगर ये भाषाएँ इतनी अलग हैं,
तो इनके भीतर इतनी समानता क्यों है?

इस सवाल का जवाब मुझे तीसरे हिस्से में मिला।

“कुछ भाषाएँ बूढ़ी नहीं होतीं…”

उस घर से निकलते हुए मेरे मन में एक अजीब-सी शांति थी।

मैं सोच रहा था—हम कितनी आसानी से किसी भाषा को “पुरानी” कह देते हैं।

पुरानी?

भला वह भाषा पुरानी कैसे हो सकती है जिसमें अभी-अभी किसी बच्चे ने अपनी माँ को पुकारा हो?

जिसमें किसी पिता ने बेटे से कहा हो—बैठो।

जिसमें रसोई से आवाज़ आई हो—

“भोजनं सिद्धम्!”

और सामने से बच्चे ने जवाब दिया हो—

“आगच्छामि!”

नहीं।

उस दिन मैंने समझा—

भाषा तब पुरानी होती है, जब उसकी आखिरी आवाज़ चुप हो जाए।
जब तक कोई उसे प्रेम से बोल रहा है, वह जीवित है।

और संस्कृत ने मुझे एक और बात सिखाई—

किसी भाषा को बचाने के लिए उसे संग्रहालय में मत रखिए।

उसे घर में रखिए।

बातचीत में रखिए।
हँसी में रखिए।
डाँट में रखिए।
लोरी में रखिए।
बच्चों की शरारत में रखिए।

क्योंकि किताबें भाषा का इतिहास बचा सकती हैं,
लेकिन घर उसकी साँस बचाता है।

मैंने पीछे मुड़कर उस घर को देखा और मन में कहा—

“नमस्ते, संस्कृत।”

आज पहली बार लगा कि तुम किसी पुराने ग्रंथ का अध्याय नहीं हो।

तुम तो वह आवाज़ हो जो सदियों से कहती आ रही है—

“तमसो मा ज्योतिर्गमय।”

अंधकार से प्रकाश की ओर।

और शायद यही हमारी भाषाओं का काम भी है—

हमें एक-दूसरे की ओर ले जाना।

अवधी ने मुझे किसी अजनबी के दर्द तक पहुँचाया था।
संस्कृत ने मुझे समय के पार एक परिवार तक पहुँचा दिया।

लेकिन मेरी यात्रा अभी बाकी थी।

क्योंकि कर्नाटक की उसी धरती पर एक और भाषा मेरा इंतज़ार कर रही थी—
एक ऐसी भाषा जिसने कविता को गीत, भक्ति को संगीत और ईश्वर को घर का सदस्य बना दिया था।

कन्नड़।

और मुझे तब क्या पता था कि अगली मुलाकात में भाषा मेरे कानों से नहीं,
सीधे सुरों के रास्ते मेरे भीतर उतरने वाली है।

शायद वहाँ जाकर मुझे पहली बार समझ आएगा—

शब्द जब अर्थ से आगे बढ़ते हैं,
तो गीत बन जाते हैं।
और जब गीत दिल से निकलता है,
तो भाषा की कोई सीमा नहीं रहती।


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