हज़रतगंज की गलियों में मोहब्बत, कॉफी और चाय की खुशबू —
Love Lane से Janpath तक

कुछ जगहें हमसे छूट जाती हैं, मगर उनकी यादें हमारा हाथ कभी नहीं छोड़तीं।
हज़रतगंज के लिए हमारे पास एक अलग ही क्रिया थी।
कोई नहीं कहता था “शॉपिंग करने चलें।” सब कहते थे, “चलो, गंजिंग करते हैं” —
और उस एक शब्द में पूरी शाम समाई होती थी।
अगर हज़रतगंज सिर्फ एक सड़क होता, तो शायद उसकी याद इतनी गहरी न होती।
वह सड़क नहीं थी।
वह हमारे यौवन का एक मौसम था।
गंजिंग असल में कभी ख़रीदारी के लिए नहीं होती थी।
यह देखे जाने के लिए होती थी, सोलह बरस का होने के लिए होती थी, और यह दिखाने के लिए कि हम किसी को नहीं ढूँढ रहे,
जबकि साँस ठीक उसी वजह से फूलती थी।
वहाँ जाने के लिए हमेशा कोई जरूरी काम नहीं होता था। कभी किसी दोस्त ने कहा— “चलो गंज चलते हैं।”
बस इतना सुनना काफी था।
कहाँ जाना है?
किस दुकान पर जाना है?
क्या खरीदना है?
कुछ पता नहीं।
फिर भी हम निकल पड़ते थे।
क्योंकि असली मकसद खरीदारी नहीं था।
गंजिंग करना था।
और गंजिंग का मतलब था—चलते रहना, लोगों को देखते रहना, दोस्तों के साथ हँसना, किसी पुराने परिचित से टकरा जाना और शाम को यह महसूस करना कि आज का दिन कुछ ज्यादा ही अच्छा था।
Love Lane — जहाँ जवानी अपने आप मुस्कुरा देती थी
सब उसे लव लेन कहते थे, हालाँकि किसी नक़्शे पर वह नाम कभी नहीं छपा। वह मुख्य सड़क के भीतर एक गुप्त नस की तरह बहती थी, जिसके दोनों तरफ़ फ़ैशन का हर सामान बिकता था।
बेल-बॉटम, चूड़ियाँ, फ़िल्मी पोस्टर, और वो इत्र जो शायद कभी असल में विदेशी नहीं था। लव लेन जवानी ख़ुद बेचती थी, सामान की शक्ल में।
लड़के उसे दो बार चलते, देखने का बहाना करते हुए। लड़कियाँ एक बार चलतीं, न देखने का बहाना करते हुए।
वो गलियारा, जहाँ से बचना नामुमकिन था
बाज़ार के बीचोंबीच कहीं वह गली इतनी सँकरी हो जाती थी कि दो लोग बिना कंधे छुए वहाँ से गुज़र ही नहीं सकते थे।
सब उस भीड़ की शिकायत करते थे। सच कहें तो, उससे बचने की कोशिश शायद ही किसी ने पूरे दिल से की हो।
एक याद, जो आज भी मुस्कुरा देती है
बिन्नू एक बार उस सँकरी गली से गुज़रते हुए इतना घबरा गया, कंधे से कंधा टकराते हुए उस लड़की के, जिसे वह दो साल से पसंद करता था, कि अपना बटुआ ही यूनिवर्सल बुक स्टोर के काउंटर पर भूल आया। हम तीन बार वहाँ लौटे, तब जाकर उसमें हिम्मत आई कि वह उससे एक लफ़्ज़ भी कह सके।
हज़रतगंज के उस दौर को याद करते हुए Love Lane का नाम अपने आप याद आ जाता है।
नाम ही ऐसा था कि जवान दिलों को वहाँ पहुँचने के लिए किसी निमंत्रण की जरूरत नहीं थी।
यह वह जगह थी जहाँ लड़के-लड़कियाँ अक्सर अपने दोस्तों के साथ घूमते दिखाई देते थे।
किसी के हाथ में किताब।
किसी के हाथ में shopping bag।
किसी के चेहरे पर संकोची मुस्कान।
और किसी की आँखों में वह सवाल, जो शायद शब्दों में कभी नहीं आया—
“कल फिर मिलोगे?”
उस समय मोबाइल फोन नहीं थे।
WhatsApp नहीं था।
Seen और Last Seen जैसी कोई चीज़ नहीं थी।
किसी से मिलने का मतलब सचमुच मिलने जाना था।
और किसी का इंतज़ार करने का मतलब सचमुच इंतज़ार करना था।
शायद इसी वजह से उन मुलाकातों में आज की तुलना में कुछ ज्यादा ही जादू था।
Fashion Bazaar — जहाँ फैशन की पूरी दुनिया मिल जाती थी
और फिर था हमारा अपना Fashion Bazaar।
उस समय हमें लगता था कि दुनिया की हर fashionable चीज़ यहीं मिल सकती है।
कपड़े।
छोटे-मोटे accessories।
किताबें।
Cards।
Posters।
Gifts।
और ऐसी कितनी ही चीज़ें जिनकी उस समय हमें जरूरत तो बिल्कुल नहीं होती थी, लेकिन उन्हें देखते ही लगता था—
“यह तो लेना ही पड़ेगा!”
जेब में पैसे सीमित होते थे।
इच्छाएँ नहीं।
कई बार पूरी दुकान घूमने के बाद सिर्फ एक छोटी-सी चीज़ खरीदते थे।
और फिर उसी चीज़ को ऐसे संभालकर घर लाते थे जैसे कोई बहुत बड़ी दौलत हासिल कर ली हो।
आज बड़ी-बड़ी shopping malls हैं।
लेकिन उस छोटे-से Fashion Bazaar में जो excitement थी, वह शायद किसी mall में नहीं मिल सकती।
हज़रतगंज का वह Corridor — भीड़, शरारत और जवानी
Love Lane और आसपास के उस corridor की अपनी ही दुनिया थी।
रास्ता बहुत चौड़ा नहीं था।
लोग लगातार आते-जाते रहते थे।
दोनों तरफ दुकानें।
बीच से निकलती भीड़।
कंधे से कंधा छू जाने की मजबूरी।
कभी किसी अनजान व्यक्ति से टकरा जाने पर—
“Sorry!”
और कभी दोस्तों के बीच दबे स्वर में हँसी।
उस corridor से गुजरना कभी-कभी अपने आप में एक adventure था।
किसी को जल्दी थी।
किसी को कोई जल्दी नहीं थी।
किसी की नजर दुकान पर थी।
किसी की नजर सामने से आते परिचित चेहरे पर।
और कुछ नौजवान ऐसे भी थे जो उस रास्ते को शायद जरूरत से थोड़ा लंबा करके चलते थे।
क्यों?
इसका जवाब पूछना शायद जरूरी नहीं था।
जवानी में कुछ रास्ते मंज़िल के लिए नहीं, एहसास के लिए तय किए जाते हैं।
Ranjana Café — जहाँ प्रेमी फुसफुसाते थे
और फिर आता है Ranjana Café।
रंजना कैफ़े छोटा था, हल्का अँधेरा था, और शायद इसी वजह से बिल्कुल सही जगह था। एक कोल्ड कॉफ़ी, दो स्ट्रॉ, और एक घंटा जो सिर्फ़ आपका अपना लगता था।
रंजना में कोई सवाल नहीं पूछता था। वहाँ के वेटरों ने कहीं और देखने की कला बख़ूबी सीख ली थी।
कॉलेज के जोड़े उसे अपनी ख़ुद की अदालत मानते थे, जहाँ प्यार के फ़ैसले चुपचाप, भाप छोड़ते गिलासों के बीच सुनाए जाते थे।
उन दिनों के lovebirds के लिए यह सिर्फ café नहीं था।
यह एक छोटा-सा संसार था।
दो लोग सामने बैठे हैं।
टेबल पर चाय या कॉफी।
बातें धीमी।
हँसी हल्की।
और समय जैसे थोड़ा ठहर गया हो।
किसी के लिए वह पहली मुलाकात थी।
किसी के लिए दोस्ती की शुरुआत।
किसी के लिए शायद आखिरी मुलाकात भी।
कितने रिश्ते वहाँ शुरू हुए होंगे, कितने धीरे-धीरे खत्म हुए होंगे—इसका हिसाब शायद किसी के पास नहीं।
लेकिन यादें?
वे आज भी मौजूद हैं।
कभी-कभी सोचता हूँ—
उन टेबलों पर बैठे कितने लड़के-लड़कियों ने उस समय यह कल्पना की होगी कि वर्षों बाद वे उन शामों को याद करेंगे?
शायद किसी ने नहीं।
हम जवानी में भविष्य की चिंता कम और उस पल को जीने की कोशिश ज्यादा करते थे।
Sharma Chai — एक कप चाय और पूरी शाम

और फिर थी Sharma Chai।
लखनऊ की चाय का अपना ही मिज़ाज है।
चाय यहाँ सिर्फ चाय नहीं होती।
वह बातचीत का बहाना होती है।
दो दोस्त मिले—
“चाय पी जाए?”
तीन दोस्त मिले—
“चलो Sharma चलते हैं।”
किसी से कोई शिकायत थी—
चाय के साथ सुनाई गई।
किसी की प्रेम कहानी थी—
वह भी चाय के साथ बताई गई।
किसी परीक्षा का तनाव था।
किसी नौकरी की चिंता।
किसी लड़की की मुस्कान का विश्लेषण।
किसी दोस्त की नई मोटरसाइकिल की चर्चा।
सब कुछ चाय के साथ चलता था।
कप खाली हो जाता था।
कहानी नहीं।
Christmas की रात और Cathedral की रोशनी

और फिर दिसंबर आता था।
हज़रतगंज में क्रिसमस की अपनी ही चुपचाप जादूगरी थी, जो पूरी तरह कैथेड्रल चर्च के इर्द-गिर्द घूमती थी।
लंबी, चमकती क़तारों में मोमबत्तियाँ जलतीं, जिन्हें थामने वाले हाथ सब एक ही मज़हब के नहीं होते थे।
हिंदू परिवार ईसाई परिवारों के बग़ल में खड़े होते, सब एक ही लौ को अँधेरे में काँपते देखते।
किसी को यह अजीब नहीं लगता था।
यह बस लखनऊ था, वही करता हुआ जो वह हमेशा से सबसे अच्छा करता आया है।
“मोमबत्ती की लौ में सारे मज़हब एक हो जाते हैं,
हज़रतगंज की रातें यूँ ही रौशन हो जाती हैं।”
Christmas की शामें हज़रतगंज को कुछ और ही बना देती थीं।
Cathedral Church की ओर जाते हुए ठंडी हवा चेहरे को छूती थी।
चारों तरफ सजावट।
रोशनियाँ।
लोगों की चहल-पहल।
और चर्च के भीतर एक अलग ही शांति।
मोमबत्ती जलाने का वह छोटा-सा क्षण आज भी कितना गहरा लगता है।
एक मोमबत्ती हाथ में।
आँखें बंद।
मन में जाने कितनी इच्छाएँ।
किसी के लिए परीक्षा में सफलता।
किसी के लिए नौकरी।
किसी के लिए परिवार की खुशी।
और किसी के लिए बस इतना—
“वह मुझे समझ जाए।”
उस समय शायद हमें पता नहीं था कि मोमबत्ती की वह छोटी-सी लौ कितनी बड़ी याद बन जाएगी।
आज भी Christmas आता है तो उन ठंडी शामों की तस्वीर आँखों के सामने आ जाती है।
Mayfair और Basant — जब सिनेमा एक त्योहार था

फिर आता था cinema का दौर।
Mayfair और Basant Picture Hall जैसे नाम सुनते ही एक पूरी पीढ़ी की यादें जाग सकती हैं।
बसंत का अपना वफ़ादार तबका था, जो पूरे यक़ीन से मानता था कि उसका पर्दा शहर के हर सिनेमाघर से बेहतर है।
मेफ़ेयर अपनी ख़ामोश शाइस्तगी से जवाब देता था।
फिल्म देखने जाना अपने आप में कार्यक्रम हुआ करता था।
पहले दोस्तों से योजना बनती थी।
फिर टिकट का इंतज़ाम।
फिर समय से पहले पहुँचने की कोशिश।
और टिकट हाथ में आते ही एक छोटी-सी जीत का अहसास।
आज एक क्लिक में फिल्म शुरू हो जाती है।
तब फिल्म तक पहुँचने की भी एक कहानी होती थी।
कौन साथ जाएगा?
कौन टिकट लाएगा?
कौन देर से आएगा?
Interval में क्या खाएँगे?
और फिल्म खत्म होने के बाद कहानी पर बहस कौन करेगा?
फिल्म पर्दे पर दो-ढाई घंटे चलती थी।
उसकी चर्चा कई दिनों तक।
India Coffee House — जहाँ कॉफी के साथ विचार भी मिलते थे

अगर Ranjana दिलों का café था, तो India Coffee House जैसे स्थान बातचीत और विचारों का ठिकाना थे।
यहाँ सिर्फ कॉफी नहीं मिलती थी।
यहाँ opinions मिलते थे।
किताबों पर बहस।
साहित्य पर चर्चा।
राजनीति पर तर्क।
फिल्मों पर राय।
किसी नए लेखक का जिक्र।
किसी पुराने शायर का शेर।
और कभी-कभी ऐसी बहस होती है कि दो दोस्त जाते समय साथ हों और लौटते समय दोनों अपनी-अपनी विचारधारा लेकर निकलें।
लेकिन दोस्ती बनी रहे।
इंडिया कॉफ़ी हाउस कॉफ़ी जितना ही बहस पर चलता था।
शायर इंजीनियरों से भिड़ते।
रिटायर प्रोफ़ेसर कॉलेज छोड़ चुके लड़कों से उलझते।
और सब, किसी तरह, बराबर यक़ीन रखते कि सही वही हैं।
कलफ़ लगी पगड़ियों में वेटर मेज़ों के बीच यूँ घूमते जैसे रेफ़री हों, जिन्होंने कब का जीत-हार का हिसाब रखना छोड़ दिया हो।
मेरे पिता एक बार पूरा इतवार वहीं बिता आए, एक फ़िल्म पर बहस करते हुए जो उन्होंने देखी तक नहीं थी, बस इसलिए क्योंकि बात ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी।
आज की दुनिया में हम disagreement को अक्सर दूरी बना देते हैं।
तब शायद लोग असहमति के साथ भी बैठना जानते थे।
एक मेज़ पर अलग-अलग विचार हो सकते थे, मगर दोस्ती फिर भी उसी मेज़ पर बैठी रहती थी।
Universal Book Store — जहाँ किताबें ही नहीं, यादें भी खरीदीं

कार्ड्स, पोस्टर और उधार लिया गया वक़्त
और फिर आता था Universal Book Store।
यूनिवर्सल बुक स्टोर से एक साथ ताज़ी स्याही और पुराने काग़ज़ की महक आती थी।
एक शेल्फ़ पर जन्मदिन के कार्ड सजे होते, दूसरी पर फ़िल्मी पोस्टर, और दरवाज़े के पास सब्र से पत्रिकाएँ रखी रहतीं।
हर वैलेंटाइन हफ़्ते वह दुकान एक छोटी सी तीर्थयात्रा का ठिकाना बन जाती। लड़के वो कार्ड ख़रीदते, जिन्हें देने की हिम्मत उनमें कभी नहीं आती थी।
उनमें से कुछ कार्ड, मुझे लगता है, शहर की किसी पुरानी दराज़ में आज भी बिना भेजे पड़े होंगे।
मेरे जैसे न जाने कितने युवाओं के लिए यह जगह किसी treasure house से कम नहीं रही होगी।
किताबें।
Magazines।
Greeting Cards।
Posters।
और जाने कितनी ऐसी चीज़ें जिनके लिए हम अंदर जाते थे और बाहर निकलते समय जेब हल्की हो चुकी होती थी।
कभी किसी दोस्त का birthday था।
Card चाहिए।
कभी कमरे की दीवार खाली लग रही थी।
Poster चाहिए।
कभी कोई नई magazine आई थी।
उसे लेना जरूरी था।
कभी कोई किताब सामने आ गई।
पैसे कम थे।
लेकिन किताब उससे ज्यादा जरूरी लग रही थी।
ऐसे में budget का क्या होता था?
वह अगली बार देखा जाएगा।
किताब हाथ में आ गई—बस।
आज किताबें फोन पर आ जाती हैं।
तब किताब खरीदने का भी एक आनंद था।
उसके पन्नों की खुशबू।
नया cover।
पहले पन्ने पर अपना नाम लिखना।
और फिर उसे वर्षों तक संभालकर रखना।
Rovers — जहाँ भूख दोस्ती से मिलती थी
इतनी गंजिंग के बाद भूख लगना तय था।
और तब याद आता था Rovers।
रोवर्स पूरी तरह जवानों का था।
कटलेट, पैटीज़, और एक ख़ास तरह का शोर, जो सिर्फ़ किशोर हँसी ही पैदा कर सकती है, हर शाम उस छोटी जगह को भर देता।
रोवर्स में कोई अपने लिए अकेले ऑर्डर नहीं करता था। प्लेटें हमेशा साझा होतीं, बिल पर हमेशा बहस होती, और किसी तरह हर बार वही पाँच दोस्त पैसे चुका देते।
दोस्तों की टोली।
हँसी-मजाक।
Snacks।
कुछ खाना।
फिर किसी को याद आता—
“अरे, पैसे तो कम पड़ रहे हैं!”
जेबें टटोली जाती थीं।
किसी के पास दस रुपये।
किसी के पास बीस।
किसी के पास सिक्के।
फिर हिसाब बैठता था।
और अंत में somehow सबका काम चल जाता था।
उस समय पैसे कम थे।
लेकिन दोस्त बहुत थे।
आज शायद हमारे पास ज्यादा साधन हैं।
लेकिन उन दिनों जैसा बेफिक्र companionship?
वह बहुत कीमती था।
Ganjing के बाद Janpath — शाम अभी खत्म नहीं हुई थी

हज़रतगंज की शाम का एक और पड़ाव था Janpath Market।
पहले गंजिंग।
फिर दुकानों की खिड़कियाँ।
फिर Fashion Bazaar।
फिर शायद कोई चाय।
किसी दोस्त से मुलाकात।
किसी दुकान पर थोड़ी browsing।
और जब लगता कि अब घर लौटना चाहिए—
कोई कह देता,
“चलो Janpath भी हो आते हैं।”
गंजिंग की कोई भी शाम असल में हज़रतगंज पर कभी ख़त्म नहीं होती थी।
वह चुपचाप, बिना ऐलान के, जनपथ बाज़ार की तरफ़ खिसक जाती, जैसे रात को घर लौटने से पहले एक और अध्याय चाहिए हो।
जनपथ ज़्यादा ढीला-ढाला, सस्ता, और शोरगुल भरा लगता था। वहीं जाकर आख़िरकार वह चीज़ ख़रीदी जाती, जिसे शाम भर सिर्फ़ लव लेन में देखा था।
और फिर पूरी टोली उधर निकल पड़ती।
क्योंकि उस उम्र में घर लौटने की जल्दी कहाँ थी?
शाम को जितना लंबा खींच सकें, खींच लो।
क्योंकि अगले दिन वही college।
वही classes।
वही assignments।
वही जिंदगी।
लेकिन आज की शाम?
आज की शाम हमारी थी।
जब तक घर पहुँचते, पाँव दुखने लगते, जेब खाली हो चुकी होती, और फिर भी, हर बार, सफ़र वसूल लगता।
किसी के पास प्रेम था, किसी के पास सिर्फ उम्मीद

हज़रतगंज की इन जगहों को याद करता हूँ तो लगता है कि हर व्यक्ति अपनी अलग कहानी लेकर वहाँ आता था।
किसी के साथ उसका प्रेम था।
किसी के साथ दोस्ती।
किसी के पास नई नौकरी का सपना।
किसी के पास परीक्षा का डर।
किसी के पास घर से छिपाकर खर्च करने के लिए थोड़े पैसे।
किसी के पास सिर्फ उम्मीद।
और किसी के पास कुछ भी नहीं—
सिर्फ दोस्तों की टोली।
फिर भी सब खुश थे।
शायद इसलिए क्योंकि खुश रहने के लिए बहुत कुछ होना जरूरी नहीं था।
कभी-कभी सही लोग और एक खुली शाम ही काफी होती है।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ…
आज उन दिनों को याद करता हूँ तो समझ आता है कि हम उस समय इतिहास के बीच रह रहे थे।
लेकिन हमें पता ही नहीं था।
हमारे लिए Love Lane सिर्फ Love Lane थी।
Fashion Bazaar सिर्फ खरीदारी की जगह।
Ranjana Café सिर्फ मिलने की जगह।
Sharma Chai सिर्फ चाय।
Mayfair और Basant सिर्फ cinema halls।
India Coffee House सिर्फ coffee।
Universal Book Store सिर्फ किताबों और cards की दुकान।
Rovers सिर्फ खाने की जगह।
Janpath सिर्फ अगला पड़ाव।
हमें कहाँ मालूम था कि एक दिन यही छोटी-छोटी जगहें हमारी जिंदगी की बड़ी यादें बन जाएँगी।
और शायद यही जवानी की सबसे खूबसूरत बात है
जवानी में हम यादें बनाने नहीं निकलते हैं।
हम बस जिंदगी जीने निकलते हैं।
एक चाय पीते हैं।
एक फिल्म देखते हैं।
किसी से मिलने जाते हैं।
किसी किताब को खरीदने के लिए पैसे जोड़ते हैं।
किसी दोस्त के साथ बेवजह घूमते हैं।
Christmas पर एक candle जलाते हैं।
और फिर सालों बाद समझ आता है—
वह सब बेवजह नहीं था।
वही तो जिंदगी थी।
हज़रतगंज अब भी है… मगर हमारा हज़रतगंज कहाँ है?

शहर बदलते हैं।
दुकानें बदलती हैं।
सिनेमाघर बदल जाते हैं।
पुराने café किसी और नाम में बदल जाते हैं।
नई पीढ़ियाँ उन्हीं सड़कों पर नए सपनों के साथ चलती हैं।
यह स्वाभाविक है।
समय कभी पीछे नहीं चलता।
लेकिन यादें?
वे अपनी घड़ी खुद चलाती हैं।
कभी कोई पुराना गीत बजता है।
कभी कोई पुराने दोस्त का फोन आता है।
कभी किसी पुराने अख़बार की कतरन हाथ लग जाती है।
और अचानक…
हम फिर हज़रतगंज में होते हैं।
वही सड़क।
वही corridor।
वही भीड़।
वही Sharma की चाय।
वही Ranjana की मेज़।
वही cinema का ticket।
वही किताबों की दुकान।
वही Janpath की ओर बढ़ते कदम।
और वही हम—
थोड़े कम उम्र के,
थोड़े ज्यादा बेफिक्र,
और शायद…
थोड़े ज्यादा खुश।
कुछ शामें खत्म नहीं होतीं
वे कैलेंडर से निकलकर स्मृतियों में चली जाती हैं।
हज़रतगंज की वे शामें भी ऐसी ही थीं।
हमने उन्हें उस समय साधारण समझा था।
आज लगता है—
वे हमारी जिंदगी के सबसे असाधारण दिनों में से थीं।
अगर कभी फिर उस पुराने हज़रतगंज से गुजरना हो…
तो शायद थोड़ा धीरे चलूँगा।
किसी दुकान के सामने रुकूँगा।
पुरानी इमारतों को देखूँगा।
और मन ही मन उन दोस्तों को आवाज़ दूँगा जो कभी मेरे साथ वहाँ चला करते थे।
शायद कोई पीछे से हँसते हुए कहे—
“क्या हुआ? चलो न… अभी Janpath भी जाना है!”
और मैं मुस्कुराकर कहूँगा—
“हाँ… चलो।
आज फिर थोड़ी-सी गंजिंग कर लेते हैं।”
हज़रतगंज ने हम में से किसी को कभी सचमुच जाने नहीं दिया।
वह बस, सब्र से, अगली पीढ़ी के उसी पुराने शब्द — गंजिंग — सीखने और उससे फिर से मोहब्बत करने का इंतज़ार करता रहा।
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