वह लोक संगीत परंपरा जो अब भी दिल में झूला झुलाती है
बादलों की गड़गड़ाहट, भीगी मिट्टी की गंध, और कहीं दूर से आती एक कजरी की तान —
यह सिर्फ एक मौसम नहीं, एक पूरी सभ्यता का गीत है
सावन आता है, तो सबसे पहले वह कहीं बाहर नहीं, भीतर बरसता है।
किसी परदेसी की आँखों के कोर में, किसी बुढ़िया दादी के होंठों पर अटकी किसी अधूरी तान में, किसी पुराने घर की काई-लगी दीवार की महक में। और उसी बरसते हुए सावन के साथ, हवा में घुल जाती है एक आवाज़ — कजरी की।
यह आवाज़ किसी एक गाँव की नहीं है, यह बिहार से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक, गंगा-घाघरा-सरयू के पूरे मैदान की साझी विरासत है।
सावन में कजरी गीत केवल मनोरंजन का साधन कभी नहीं रहे — ये उस मिट्टी की सांसें हैं, जो हर मॉनसून में फिर से जी उठती है।
जो लोग पूर्वांचल, अवध या बिहार की माटी से दूर, किसी अजनबी शहर की चमकती सड़कों पर सावन गुज़ार रहे हैं, उनके लिए यह लेख महज़ जानकारी नहीं, एक वापसी का रास्ता है।
एक ऐसा रास्ता, जो पेड़ों पर पड़े झूलों तक ले जाता है, जहाँ स्त्रियाँ कभी झूलतीं और गातीं थीं, और जिनकी आवाज़ें आज भी, अगर कान थोड़ा भीतर की ओर मोड़ लिया जाए, तो साफ़ सुनाई देती हैं।
कजरी शब्द की उत्पत्ति: काजल जैसे काले बादलों की कविता
कजरी शब्द सुनते ही आँखों के सामने सबसे पहले क्या उभरता है? किसी स्त्री की आँख का काजल, या फिर मॉनसून के आसमान में उमड़ते वे काले बादल, जो बरसने से पहले पूरे गगन को काजल जैसा रंग देते हैं।
दरअसल दोनों ही सही हैं। कजरी शब्द की जड़ें काजल में हैं, और यह काजल यहाँ सीधे मानसून के उन घने काले बादलों का प्रतीक बन जाता है, जो सावन की पहचान हैं।
यह कोई संयोग नहीं कि जिस भाषा में यह गीत रचे गए, उसी भाषा ने बादल की कालिमा को स्त्री के श्रृंगार से जोड़ दिया — मानो पूरा आकाश किसी विरहिणी की आँख हो, जो अपने प्रियतम की राह तकते-तकते काजल-सी काली हो गई हो।
“कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया
बदरिया घेरि आइल ननदी
तू त जात हउ अकेली
कौनौ संग न सहेली…“
इस एक कजरी में पूरा सावन ठहरा हुआ है।
एक ननद अपनी भाभी से पूछ रही है — अकेले सावन कैसे खेलोगी, जब बदरिया घिर आई है और साथ कोई सहेली भी नहीं। यह सवाल सुनते ही किसी भी घर की दहलीज़ पर बैठी औरत की आँखें भर आती थीं, क्योंकि सावन में सबसे तीखी चुभन यही थी — साथ का अभाव, प्रिय का बिछोह, और चारों तरफ भीगती हुई धरती के बीच अकेलापन।
पूरबिया लोक संगीत परंपरा:
बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उस मिट्टी की साझी धड़कन
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश — दोनों को अलग-अलग नक्शों पर भले बाँट दिया गया हो, मगर सावन और कजरी ने इन्हें कभी अलग नहीं होने दिया। यही वह पूरबिया लोक संगीत परंपरा है, जिसमें भाषा, बोली, लय और भाव इतने घुले-मिले हैं कि सरहद पहचानना मुश्किल हो जाता है।
पेड़ों पर पड़े झूले, और उन झूलों पर झूलती-गाती स्त्रियाँ — यह दृश्य पूर्वांचल के हर गाँव, हर कस्बे की पहचान हुआ करता था। आज यह दृश्य दुर्लभ होता जा रहा है, मगर स्मृति में यह अब भी उतना ही जीवंत है, जितना बरसों पहले था।
एक याद, बहराइच के आँगन से
बहराइच के जिस पुराने घर में बचपन बीता, वहाँ आँगन के कोने में एक पुराना नीम का पेड़ था, और सावन आते ही उस पेड़ पर हर साल एक झूला पड़ता था।
दादी और उनकी सहेलियाँ शाम ढलते ही वहाँ जमा होतीं, और झूले की चरचराहट के साथ जो पहला गीत हवा में तैरता, वह अक्सर कजरी ही होता। हमारा दोस्त बिन्नू उस झूले पर सबसे ऊँचा झूलने की ज़िद करता, और दादी हर बार डाँटतीं —
“अरे रुक, बदरिया घेरि आइल है, गिर जइबू।
” उस समय समझ नहीं आता था कि यह डाँट भी कजरी की एक पंक्ति से उधार ली गई है।
आज, इतने बरसों बाद, जब कहीं परदेस में बारिश की पहली बूँद गिरती है, तो सबसे पहले वही चरचराता झूला और दादी की वह पंक्ति याद आती है, न कि कोई मौसम विभाग की चेतावनी।
यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं। लगभग हर उस घर की कहानी है, जो कभी इस मिट्टी से जुड़ा रहा।
सावन के गीत केवल गाए नहीं जाते थे, वे जिए जाते थे — रसोई में, आँगन में, कुएँ की जगत पर, और सबसे ज़्यादा उन झूलों पर, जो पेड़ों की डालियों से बँधे, हवा में झूलती हुई स्त्रियों को पल भर के लिए वह आज़ादी देते थे, जो बाकी साल उन्हें नसीब नहीं होती थी।
महेंद्र मिसिर की पूरबी: पूरबी सम्राट जिसने भोजपुरी को महाकाव्य दिया
सारण जिले के एक साधारण से गाँव में जन्मे महेंद्र मिसिर को इतिहास ने ‘पूरबी सम्राट‘ और ‘पुरबिया उस्ताद‘ की उपाधि यूँ ही नहीं दी। पूरबी और ठुमरी की उनकी गायन शैली ने भोजपुरी को वह गरिमा दी, जिसकी वह हमेशा से हकदार थी। उन्होंने भोजपुरी में पहला महाकाव्य रचा — ‘अपूर्व रामायण’ — और यह सिद्ध किया कि लोकभाषा में भी महाकाव्य की गहराई और गरिमा संभव है।
मगर महेंद्र मिसिर को असली अमरता मिली एक छोटी-सी, मार्मिक कजरी से, जो आज भी हर उस स्त्री की ज़ुबान पर आती है, जिसका भाई परदेस में है।
“अंगुरी में डसले बिया नगिनिया हे
ए ननदी, दियरा जरा दे
दियरा जरा दे, अपना भैया के जगा द
नसे-नसे उठेला लहरिया हे…“
एक स्त्री को साँप ने डस लिया है, और वह अपनी ननद से दीया जलाने और भाई को जगाने की गुहार लगा रही है, क्योंकि विष उसकी हर नस में लहर की तरह फैल रहा है।
इस गीत में जो तड़प है, वह किसी भी शास्त्रीय शोक-गीत से कम गहरी नहीं है।
महेंद्र मिसिर की शैली पर आज शोध हो रहे हैं, विश्वविद्यालयों में उन पर थीसिस लिखी जा रही हैं — यह इस बात का प्रमाण है कि लोकगीत कभी ‘छोटी विधा’ नहीं थे, बल्कि साहित्य और संगीत के समांतर एक गंभीर, समृद्ध परंपरा थे, जिसे अकादमिक जगत अब जाकर पहचान रहा है।
भिखारी ठाकुर और बिदेसिया: भोजपुरी के शेक्सपियर की विरह-गाथा

सारण जिले के ही कुतुबपुर गाँव में एक नाई परिवार में जन्मे भिखारी ठाकुर को यूँ ही ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ नहीं कहा जाता।
उनकी असाधारण प्रतिभा ने भोजपुरी लोकनाट्य और लोकगाथा शैली को देश भर में पहचान दिलाई।
उनका सबसे मार्मिक सृजन था — ‘बिदेसिया’ — वह लोकनाट्य, जो हर उस स्त्री की कहानी कहता है, जिसका पति रोज़ी-रोटी की तलाश में कलकत्ता या किसी और परदेस चला गया, और वह अकेली पीछे रह गई।
विरह में डूबी वह स्त्री, जिसका पिया परदेस गया — यही बिदेसिया की आत्मा है, यही सावन की भी
पति के परदेस जाने पर पत्नी अकेली रह जाती है, और भिखारी ठाकुर ने इस विरह-वेदना की जो मार्मिकता ‘बिदेसिया’ में दिखाई, वह अद्भुत है।
सोचिए उस दौर के गाँवों को, जहाँ बरसात का पूरा मौसम, पूरा सावन, स्त्रियाँ अपने पिया की चिट्ठी की बाट जोहते हुए गुज़ार देती थीं। खेत भीगे हुए, आसमान बादलों से घिरा हुआ, और मन उतना ही खाली, जितना वह चौका जिसमें दो की जगह एक ही थाली परोसी जाती थी। भिखारी ठाकुर ने इसी खालीपन को शब्द दिए, सुर दिए, और सदियों तक के लिए अमर कर दिया।
आ ई भारत से बाहर मॉरिशस जइसन भोजपुरी भाषी देस सभ ले पहुँच गइल।
मूल रूप से “बिदेसिया” एक ठो अइसन आदमी जे कलकत्ता कमाए गइल (आ बिदेसी हो गइल) के मेहरारू धनिया के वियोग आ एक ठो बटोही से अपना पति के लवट आवे के अरज करत सनेसा के कहानी हवे।
विंध्यवासिनी देवी: बिहार की पहली लोक गायिका, जिन्होंने घर की देहरी लाँघी
आज जब किसी लड़की का संगीत की दुनिया में कदम रखना सामान्य बात लगती है, उस दौर की कल्पना करना ज़रूरी है, जब किसी स्त्री का घर से निकलना ही एक क्रांतिकारी कदम माना जाता था।
विंध्यवासिनी देवी ने वही क्रांतिकारी कदम उठाया, और बिहार की पहली लोक गायिका बनीं। आकाशवाणी पटना के तत्कालीन महानिदेशक जगदीश चंद्र माथुर ने उस ज़माने में उन्हें लोकगीत संयोजिका के पद पर नियुक्त किया — यह अपने आप में एक साहसिक फैसला था।
असम के मशहूर संगीतकार और गायक भूपेन हज़ारिका ने छठ पर लिखे उनके दो लोकगीतों को अपनी आवाज़ दी,
और यह जुगलबंदी इस बात का प्रमाण बनी कि सच्चा लोक संगीत भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को कभी नहीं मानता। 1974 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनका ‘विंध्य कला मंदिर’ आज भी उनकी शिष्याओं के माध्यम से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। मगर एक दुखद सच्चाई यह भी है कि उनके योगदान को उतनी व्यापक पहचान नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी — पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार, दोनों जगह के लोग उन्हें भूलते जा रहे हैं, जबकि मॉरीशस जैसे दूर देश में उन्हें खास पहचान मिली, वह भी कजरी गायन के लिए।
जिसने दी थी सुरों को अपनी उमर की कमाई
वो आज गुमनाम है, ये कैसी रुसवाई
मिट्टी ने जिसको ओढ़ाई थी सुरों की चादर
उसी मिट्टी ने आज उसको भुलाई
शारदा सिन्हा: ‘बिहार कोकिला’ और छठ के गीतों की अमर आवाज़

छठ पर्व के गीतों की बात हो, और शारदा सिन्हा का नाम न आए, यह लगभग असंभव है।
‘बिहार कोकिला’ के नाम से मशहूर शारदा सिन्हा खासकर छठ गीतों के लिए जानी जाती हैं, और उनकी आवाज़ में वह पवित्रता है, जो सूर्य को दिया जाता अर्घ्य और नदी किनारे उगता सूरज, दोनों में एक साथ महसूस होती है।
उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण, और मरणोपरांत पद्म विभूषण से नवाज़ा गया — यह सम्मान उनकी कला की गहराई का प्रमाण है, न कि केवल औपचारिकता।
उनकी परंपरा को अब उनकी बेटी वंदना आगे बढ़ा रही हैं,
जो इस बात की गवाह है कि लोक संगीत की धारा किसी एक पीढ़ी में सिमटकर नहीं रह जाती। यह माँ से बेटी को, दादी से पोती को, और सबसे बढ़कर, एक कान से दूसरे कान को सौंपी जाने वाली विरासत है — बिना किसी लिखित पाठ्यक्रम के, बिना किसी औपचारिक संस्था के, केवल स्नेह और स्मृति के सहारे।
लोकप्रिय लोक गायिका शारदा सिन्हा के सबसे प्रसिद्ध गानों में
“पाहिले पहिल छठी मईया”, “केलवा के पात पर”, “बहंगी लचकत जाए”, और हिंदी फिल्म मैंने प्यार किया का गीत “काहे तो से सजना” शामिल हैं।
उनके ये गीत विवाह और छठ पर्व के दौरान विशेष रूप से सुने जाते हैं।
प्रसिद्ध छठ गीत

आज की भोजपुरी लोक गायिकाएं:
वह परंपरा जो हर पीढ़ी में नए स्वर पाती है
यह सोचना गलत होगा कि पूरबिया लोक संगीत परंपरा अतीत में ही कैद है।
कल्पना पटवारी भोजपुरी लोक गायन में एक महत्वपूर्ण नाम हैं, जिन्होंने भिखारी ठाकुर पर शोध भी किया है — दिलचस्प बात यह है कि कल्पना मूलतः असम की रहने वाली हैं, जो एक बार फिर इस बात की मिसाल है कि सच्ची कला किसी सीमा में बंधकर नहीं रहती।
गायिका दीपाली का भी इस परंपरा में अहम योगदान है।
भोजपुरी लोकगीतों को भौंडे बोलों से बचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गई है, और यह लड़ाई अब भी जारी है।
उदय नारायण सिंह और चंदन तिवारी ने समृद्ध लोक साहित्य को अपनी आवाज़ से सहेजा है। भरत शर्मा, भरत सिंह भारती ने भोजपुरी की लोक विधाओं को नई ऊँचाई दी है।
और एक नया नाम भी उभरा है — मैथिली ठाकुर, जिन्होंने मैथिली और भोजपुरी लोकगीतों के ज़रिये कम उम्र में ही बड़ी ख्याति अर्जित की है। पल्लवी विश्वास बिहार की पहली ऐसी कलाकार हैं, जिन्होंने लोक से इतर शास्त्रीय गायन और कथक नृत्य में योगदान दिया, और एनसीईआरटी ने उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पाठ्य-पुस्तक समिति का सदस्य बनाया।
महेंद्र मिसिर · भिखारी ठाकुर · विंध्यवासिनी देवी · शारदा सिन्हा · कल्पना पटवारी · दीपाली · मैथिली ठाकुर · पल्लवी विश्वास
झूलों की वह शाम, जो अब सिर्फ स्मृति में झूलती है
यह लेख अगर सिर्फ नामों और सम्मानों की सूची बनकर रह जाए, तो सावन में कजरी गीत की उस आत्मा से अन्याय होगा, जो इन नामों से कहीं परे है।
असली सावन उस पल में है, जब गाँव की किसी कच्ची पगडंडी पर, दूर कहीं से कजरी की धीमी तान हवा के साथ बहती हुई आती है, और सुनने वाले के भीतर कुछ पिघल जाता है। यह वह क्षण है, जब समय ठहर जाता है — न आज बचा रहता है, न कल, केवल वह सावन बचता है, जो बचपन में बीता था।
हज़रतगंज की एक शाम, जब कजरी बारिश में घुल गई
लखनऊ के हज़रतगंज की उन गलियों में, जहाँ नवाबी तहज़ीब की खुशबू आज भी दीवारों में रची-बसी है, एक बार सावन की शाम अचानक बारिश शुरू हो गई थी। किसी पुरानी दुकान के छज्जे के नीचे शरण लेते हुए, बगल की एक खिड़की से रेडियो पर बजती हुई कजरी की धुन कानों में पड़ी थी। बारिश की बूँदों की टप-टप और कजरी की तान — दोनों मिलकर एक ऐसा संगीत रच रहे थे, जिसे शब्दों में बाँधना आज भी मुश्किल लगता है। उस पल में समझ आया कि सावन और कजरी दरअसल दो अलग चीज़ें नहीं, एक ही भावना के दो नाम हैं।
जो लोग आज अपने गाँव, अपने कस्बे, अपनी माटी से हज़ारों मील दूर किसी अजनबी शहर में सावन गुज़ार रहे हैं — दुबई की गगनचुंबी इमारतों में, लंदन की बरसाती शामों में, या अमेरिका के किसी ऐसे कोने में जहाँ बारिश तो होती है पर उसमें मिट्टी की सोंधी गंध नहीं होती —
उनके लिए यह कजरी परंपरा एक पुल की तरह है। यह पुल उन्हें उस आँगन तक वापस ले जाता है, जहाँ कभी झूला पड़ा करता था, जहाँ कभी दादी-नानी की आवाज़ में सावन के गीत गूँजते थे।
लोक गायन के संरक्षण की चुनौती:
क्षीण होती परंपरा को बचाने की कोशिश
यह मानना ज़रूरी है कि विंध्यवासिनी देवी जब तक जीवित रहीं, यह परंपरा काफी समृद्ध रही, लेकिन अब यह क्षीण पड़ रही है। हालांकि इसे बचाने के प्रयास भी हो रहे हैं। सवाल यह है कि सरकार लोक गायन के संरक्षण के लिए क्या कर रही है? कला एवं संस्कृति विभागों को लोक गायन और लोक संस्कृति के संरक्षण में जितना काम करना चाहिए, उतना नहीं हो पा रहा है। इसीलिए कलाकार अब महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं, और गाँव की वे पगडंडियाँ, जिन पर कभी कजरी की तान बहती थी, आज खामोश होती जा रही हैं।
मगर उम्मीद पूरी तरह टूटी नहीं है। हर बार जब कोई मैथिली ठाकुर जैसी युवा आवाज़ सामने आती है, हर बार जब कोई कल्पना पटवारी भोजपुरी लोकगीतों को भौंडेपन से बचाने की लड़ाई लड़ती है, तब यह भरोसा फिर से जागता है कि यह परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं होगी। यह सिर्फ नई शक्ल में, नए मंचों पर, नई पीढ़ी की आवाज़ में ढलकर आगे बढ़ेगी।
बरसे बादल तो याद आए वो आँगन
जहाँ झूला था, और था एक सावन
आज भी जब कोई कजरी गूँजे कहीं
लौट आता है खोया हुआ बचपन
सावन हर साल आता है, बादल हर साल बरसते हैं, मगर वह कजरी जो कभी पेड़ों पर पड़े झूलों से उठा करती थी, अब धीरे-धीरे रेडियो की पुरानी रिकॉर्डिंग्स और यूट्यूब के किसी पुराने वीडियो में सिमटती जा रही है। फिर भी
, जब तक कोई एक भी आवाज़ इसे गुनगुनाती रहेगी, जब तक कोई एक भी दादी अपनी पोती को यह सिखाती रहेगी कि “कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया”, तब तक यह परंपरा जीवित रहेगी। यह लेख उन सभी परदेसियों को समर्पित है, जो इस सावन में अपनी मिट्टी से दूर हैं, मगर जिनके भीतर आज भी वही झूला झूल रहा है, वही कजरी गूँज रही है। बादरिया चाहे जहाँ घिरे, यह याद हमेशा साथ रहेगी।
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