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Wanderings with Nikhil explores the beauty and history of the Gomti Ghats, Lucknow. Join me as I explore the fascinating Gomti Ghats of Lucknow and share insights from my journey. गोमती के घाट –जहाँ आज भी साँस लेती है लखनऊ की तहज़ीब एक समय था…जब शाम होते ही परिवार घाटों पर आ बैठते थे।कुल्हड़ की…
By
Nikhilbinnu
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लखनऊ के गोमती घाट: समय के साथ एक सफ़र
Wanderings with Nikhil explores the beauty and history of the Gomti Ghats, Lucknow.
Join me as I explore the fascinating Gomti Ghats of Lucknow and share insights from my journey.
कहीं वह किसी किले से बनती है। कहीं किसी मंदिर से। कहीं किसी बाज़ार से।
लेकिन लखनऊ…
क्या आपने कभी सोचा है कि अगर गोमती बोल सकती, तो वह लखनऊ के बारे में क्या कहती?
लखनऊ की पहचान उसकी तहज़ीब, उसकी ज़ुबान, उसकी गलियाँ और सबसे बढ़कर उसकी गोमती है।
गोमती के घाट.
गोमती केवल नदी नहीं है।
वह इस शहर की धड़कन है।
सुबह की पहली किरण से लेकर शाम की आरती तक, उसने सदियों से लखनऊ को जीते हुए देखा है।
उसने नवाबों का दौर देखा।
अंग्रेज़ों का शासन देखा।
आज का बदलता शहर भी देख रही है।
और इन सबकी गवाह हैं…
गोमती के घाट।
गोमती के किनारे, लखनऊ केवल रहता नहीं — याद करता है। हर घाट उस किताब का एक पन्ना है जो यह शहर सदियों से लिख रहा है — पानी में, पत्थर में, आस्था में और विस्मरण में।
नवाबी दौर के गुंबदों और मीनारों के पीछे, हजरतगंज की भीड़ और चारबाग के धुएँ के पार, एक दूसरा लखनऊ बसता है। यह शांत है। यह पुराना है। यह पानी के किनारे जीता है — उन पत्थर की सीढ़ियों पर जो गोमती में उतरती हैं, उन चबूतरों पर जहाँ शाम को दीये तैरते हैं, उन घाटों पर जो पीढ़ियों का दुख और उल्लास समेटे हैं।
प्रसिद्ध मानवशास्त्री प्रोफ़ेसर नदीम हसनैन ने अपनी कृति द अदर लखनऊ में लिखा है कि ये नदी तट सांस्कृतिक चौराहे हैं — जहाँ इतिहास, आस्था और सार्वजनिक जीवन का संगम होता है। “ये घाट सिर्फ रस्म-अदायगी के स्थान नहीं हैं। ये इस शहर की आत्मा को आईना दिखाते हैं — इसकी मिश्रित संस्कृति को, इसकी जीवित परंपराओं को और प्रकृति से इसके आध्यात्मिक जुड़ाव को।”
गोमती से पूछो, वो क्या-क्या जानती है, हर घाट की एक अलग कहानी मानती है। कभी आरती, कभी खेल, कभी मातम — यह नदी हर रंग को अपना मानती है।
सर्पाकार जीवनरेखा — गोमती और उसका शहर-गोमती के घाट
गोमती लखनऊ में किसी पुराने, विश्वस्त रिश्तेदार की तरह प्रवेश करती है — बिना जल्दी के, कहानियाँ बटोरती हुई। वह भागती नहीं। मुड़ती है। झुकती है। और हर मोड़ पर उसने एक अलग मानवीय कहानी को अपनी गोद में लिया है — एक विवाह-स्नान, एक अंतिम विदाई, किसी बच्चे का पहला तैरना, किसी कवि की खोई हुई दोपहर।
सदियों तक, लखनऊ का जीवन इस नदी के इर्द-गिर्द बुना गया। नवाबों ने इसके किनारे बाग लगाए। मंदिर इसके प्राकृतिक संगम पर उठे। धोबियों ने इसके गर्म पत्थरों पर चादरें बिछाईं। मछुआरों ने इसके मिज़ाज को उसी तरह पढ़ा जैसे किसान आसमान को पढ़ते हैं।
आज, वह रिश्ता उधड़ने लगा है। गोमती सिकुड़ गई है। उसमें ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से गिर गया है। पर्यावरण विशेषज्ञ प्रो. वेंकटेश दत्ता ने बार-बार चेताया है। फिर भी, घाट — वे पत्थर की सीढ़ियाँ जो शहर को उसके पानी से जोड़ती हैं — अभी भी साँस लेते हैं। वे जीवित रहने पर अड़े हैं।
“ये घाट सिर्फ रस्मों के लिए नहीं हैं। ये इस शहर की आत्मा का दर्पण हैं — उसकी मिश्रित संस्कृति का, उसकी जीवित परंपराओं का और प्रकृति से उसके आध्यात्मिक जुड़ाव का।” — प्रो. नदीम हसनैन, मानवशास्त्री
यदि किसी एक घाट ने पिछले कुछ वर्षों में लखनऊवासियों का दिल फिर से जीता है, तो वह है कुड़िया घाट।
रूमी दरवाज़ा और बड़ा इमामबाड़ा के निकट स्थित यह घाट शाम ढलते ही एक अलग ही रूप धारण कर लेता है।
घंटियों की ध्वनि…
अगरबत्ती की सुगंध…
गोमती की लहरों पर तैरते दीप…
और आरती के स्वर।
कुछ क्षणों के लिए लगता है कि समय ठहर गया है।
कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली पर यहाँ का दृश्य किसी चित्रकार की कल्पना जैसा प्रतीत होता है। सैकड़ों दीप नदी की सतह पर झिलमिलाते हैं और पूरा वातावरण श्रद्धा से भर उठता है।
हर शहर की एक आत्मा होती है। लखनऊ की आत्मा आज भी गोमती के किनारे बैठी शाम का इंतज़ार करती है।
गोमती के घाट -बचपन की एक तस्वीर
बहुत से लखनऊवासी बताते हैं कि बचपन में परिवार के साथ शाम को कुड़िया घाट जाना किसी पिकनिक से कम नहीं होता था।
घर से पूरियाँ और आलू की सब्ज़ी बनती।
कुल्हड़ की चाय पी जाती।
बच्चे कबूतरों के पीछे दौड़ते।
और बड़े लोग गोमती की ओर देखते हुए जीवन की बातें करते।
आज भी वे यादें कई लोगों के मन में दीपक की तरह जलती हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर ने बताया कि उनके पिता — 1960 के दशक के एक सरकारी अफ़सर — हर सुबह अपने काम पर जाने से पहले कुड़िया घाट पर जाते थे। “वो कहते थे कि गोमती उनसे बातें करती थी,” उन्होंने कहा। “वो अपनी परेशानियाँ नदी से कहते थे। नदी बस बहती रहती थी। बस इतना काफ़ी था।” वो मौन आज भी घाट पर मौजूद है — ढूँढने वाला हो तो।
कुड़िया घाट पर जब दीये जलते हैं, आसमान भी झुककर पानी को छूता है। शहर के शोर में कहीं खो गई है आरती, पर गोमती का दर्द आँखों में उतरता है।
अगर आपका बचपन लखनऊ में बीता है, तो यकीन मानिए… गोमती के किनारे आपकी भी कोई न कोई याद ज़रूर छूटी होगी।
देवराहा और कारौंदा घाट — पवित्र जुड़वाँ तट
राज भवन रोड से सुलभ, देवराहा घाट उस महान संत का नाम लेकर चलता है जिनका असर गाँव की कुटियाओं से लेकर राष्ट्रीय राजनीति के गलियारों तक था — देवराहा बाबा। उनके नाम का घाट वैसा ही है — जहाँ हवा कुछ और ही महसूस होती है। भारी। गर्म। अधिक उपस्थित।
भीड़ कम होती है।
शोर कम होता है।
लेकिन सुकून कहीं अधिक होता है।
कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालुओं की भीड़ यहाँ स्नान के लिए उमड़ती है। मान्यता है कि इस दिन गोमती में स्नान करने से मन और आत्मा दोनों पवित्र होते हैं।
यही वह स्थान है जहाँ नदी हमें धीमे चलना सिखाती है।
देवराहा से सटा है कारौंदा घाट — जो सिंधी समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है, विशेषकर संत झूलेलाल की जयंती के अवसर पर। छपर मैदान के पास स्थित ये घाट अध्यात्म और स्थानीय संस्कृति को आपस में बुनते हैं। बदलते शहर के बीच, ये अपनी जगह पर खड़े रहते हैं — शांत, अड़ियल और ज़रूरी।
चेटीचंड के अवसर पर सिंधी समाज यहाँ बड़ी संख्या में एकत्र होता है।
भजन गूँजते हैं।
ध्वज लहराते हैं।
प्रसाद बाँटा जाता है।
और पूरा घाट रंगों, श्रद्धा और उत्साह से भर उठता है।
यही तो लखनऊ की खूबसूरती है।
हर समुदाय अपनी परंपरा निभाता है।
और पूरा शहर उसका सम्मान करता है।
मिलकर, ये दोनों घाट लखनऊ की उस खूबी को जीवित रखते हैं जो हमेशा इस शहर की पहचान रही है — एक ही जगह में कई परंपराओं को समाना, बिना किसी को दबाए। यही तहज़ीब है।
विभाजन के बाद की एक कहानी
अलीगंज की एक बुज़ुर्ग सिंधी महिला ने बताया कि उनकी नानी विभाजन के बाद लखनऊ आईं और कारौंदा घाट पर खड़े होकर पहली बार घर जैसा महसूस किया। “वो कहती थीं — नदी को सरहद का पता नहीं होता,” उन्होंने बताया। “गोमती बस बहती रही। और वो वहाँ खड़ी रोईं — पर दुख से नहीं, राहत से।” पानी की कोई बोली नहीं होती। वो बस ग्रहण करता है।
शुक्ला और पंचवटी घाट — ख़ामोश मगर ज़िंदा
पतंग पार्क के पास, शुक्ला घाट कार्तिक पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं की भीड़ से भरता है — पवित्र डुबकी और आरती के साथ। यहाँ चुन्नी देवी ट्रस्ट का मंदिर भी है।
नज़दीकी पंचवटी घाट वह स्थान माना जाता है जहाँ माँ सीता ने वनवास के दिन बिताए — इस भौगोलिक काव्यात्मकता ने घाट को एक पौराणिक गहराई दे दी है।
पंचवटी नाम सुनते ही रामायण की याद आती है।
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस क्षेत्र का नाम भी उसी स्मृति से जुड़ा है।
घने पेड़…
शांत वातावरण…
और छोटी-सी हनुमान प्रतिमा।
इन सबके बीच यह घाट ध्यान और आत्मचिंतन के लिए एक आदर्श स्थान बन जाता है।
हरियाली से घिरा, पंचवटी घाट में एक शयन-मुद्रा हनुमान मंदिर है। दूसरे घाटों से शांत, यह घाट उन स्थानीय भक्तों का है जो तमाशे के लिए नहीं, बल्कि निरंतरता के लिए आते हैं — पवित्र जल को छूने और घर लौटने के लिए, पहले से थोड़ा हल्का होकर।
शुक्ला और पंचवटी घाट हमें याद दिलाते हैं कि हर पवित्र स्थान को भीड़ की ज़रूरत नहीं। कुछ घाट फुसफुसाहट में काम करते हैं। वे उन थोड़े लोगों की सेवा करते हैं जो नियमित, श्रद्धापूर्वक आते हैं — बिना कैमरे, बिना उत्सव की ऊर्जा के। यही साधारण भक्ति किसी नदी के सांस्कृतिक जीवन की असली रीढ़ है।
पंचवटी के घाट पर बड़ी शांति है, जहाँ सीता ने खोजी थी अपनी छाँती है। आज भी वो पेड़, वो पानी, वो पत्थर — एक पुरानी कहानी की गवाही है।
गोमती की हर लहर एक कहानी है। हर घाट एक किताब है। और हर सीढ़ी पर किसी का बचपन बैठा हुआ है।
डालीगंज पुल के पास, लल्लू मल्ल घाट उस उपेक्षा से बिल्कुल अलग है जो दूसरे घाटों पर दिखती है। लगभग एक सदी पहले लल्लू मल्ल भगवान दास उमर वैष्णय द्वारा निर्मित, यह घाट आज भी सुव्यवस्थित है — इसकी धर्मशालाएँ और बरामदे बरकरार हैं, पत्थर साफ़ हैं, उद्देश्य अडिग है।
पितृ पक्ष, छठ पूजा और अन्नवर्षम पर यह घाट गतिविधियों का केंद्र बनता है। पास में महादेव नर्मदेश्वर मंदिर शैव श्रद्धा की एक परत जोड़ता है। दशहरे पर रामलीला मैदान में होती है। होली पर रंग नदी तक पहुँचते हैं।
लल्लूमल्ल घाट यह सिखाता है कि रखरखाव प्रेम का एक रूप है। जब कोई घाट की सीढ़ियाँ बुहारता है, दीये भरता है, दीवारें सँभालता है — तो वहाँ आने वाला समुदाय भी अपने-आप को सँभाला हुआ महसूस करता है।
पुराने पुजारी की बात
उन्नाव के पास के एक गाँव से आए एक अस्सी वर्षीय बुज़ुर्ग पाँच दशकों से लल्लू मल्ल घाट के मंदिर की देखभाल करते हैं। “नदी ने मुझे यहाँ रोक लिया,” उन्होंने बिना किसी नाटकीयता के कहा। हर सुबह वो सीढ़ियाँ बुहारते हैं। हर शाम दीये जलाते हैं। गोमती ने उन्हें पचास साल यही करते देखा है। “और कोई करेगा?” उन्होंने पूछा — शिकायत नहीं, बस एक तथ्य। जिसमें एक पूरी भक्ति-दर्शन की भारी शांति थी।
भैंसा कुंड घाट — दो पुलों के बीच
गोमती बैराज और निशातगंज पुल के बीच बसा भैंसा कुंड घाट एक सुसज्जित श्मशान स्थल के रूप में उभरा है, जिसे सहारा इंडिया परिवार प्रबंधित करता है। यह घाट अब नदी की जल-गुणवत्ता के निगरानी बिंदुओं में से एक है।
इस सबके बावजूद, मकर संक्रांति और कार्तिक पूर्णिमा पर यहाँ बड़े फुटबॉल मैच होते हैं। यह विरोधाभास अनोखी तरह से लखनवी है — एक श्मशान जो खेल का मैदान बन जाता है, एक शोक-स्थल जो कुछ घंटों के लिए जयकारों से गूँजता है। जीवन और मृत्यु एक ही धरती पर, केवल मौसम और अवसर से अलग।
लखनऊ विश्वविद्यालय के पास स्थित विसर्जन घाट दुर्गा पूजा, गणेश चतुर्थी और अन्य LMC उत्सवों के बाद मूर्ति-विसर्जन का प्रमुख स्थल बन गया है। विसर्जन घाट में एक गहरी भावुकता है — यह अंत के लिए बना स्थान है, पवित्र को उस तत्व में वापस करने के लिए जिससे वह आया था।
हर वर्ष गणेश उत्सव और दुर्गा पूजा के बाद हजारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
मूर्ति विसर्जन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है।
यह हमें सिखाता है कि हर मिलन का एक दिन विदा भी होती है।
लोग नम आँखों से कहते हैं—
“अगले बरस तू जल्दी आना।”
और प्रतिमा धीरे-धीरे गोमती की गोद में समा जाती है।
झूलेलाल की मूर्ति का विसर्जन यहाँ भारी भीड़ खींचता है। बुनियादी सुविधाओं की कमी के बावजूद, घाट जीवित रहता है — क्योंकि शहर का पंचांग इसकी माँग करता है। कुछ चीज़ें नीति के कारण नहीं, बल्कि इसलिए बचती हैं क्योंकि लोग उन्हें जाने देने से इनकार करते हैं।
विसर्जन के घाट पर जब मूर्ति डूबती है, एक युग की आस्था पानी में घुलती है। आँखें भर आती हैं, होंठ पर दुआ है — यह अंत नहीं, यह वापसी है, यह नई शुरुआत है।
जो घाट ख़ामोश हो गए
हर घाट समय के साथ अपनी गरिमा नहीं बचा पाया। पिपरा घाट, गोलाइस घाट, काले कुठी घाट और छत मेला घाट — ये नाम सरकारी कागज़ों में हैं, पर ज़मीन पर इनकी हकीकत धुंधली हो गई है। रखरखाव की कमी, पहुँच की दिक्कत और प्रशासनिक उपेक्षा ने इन्हें अँधेरे में धकेल दिया है।
नगर-योजनाकारों, पर्यावरणविदों और जागरूक नागरिकों ने आवाज़ उठाई है। कला केंद्र और छत मेला जैसे संगठनों ने पुनरुद्धार के प्रयास किए हैं। बाधाएँ परिचित हैं — धन, अधिकार-क्षेत्र, प्राथमिकताओं की होड़। पर असली बाधा इन सबसे गहरी है — नदी किनारे जाने की आदत का खो जाना।
जब एक घाट ख़ामोश होता है, तो केवल आगंतुक नहीं जाते। स्मृतियाँ भी जाती हैं। उसकी सीढ़ियों पर जो बातें हुईं, जो गीत गाए गए, जो विवाह संपन्न हुए — सब कुछ बेपता हो जाता है। एक भूला हुआ घाट, एक शहर का अपनी ही कहानी का एक हिस्सा भूलना है।
“रखरखाव की कमी या प्रशासनिक उदासीनता ने इन्हें अँधेरे में धकेला — पर गोमती हर उस घाट को याद रखती है जो कभी ज़रूरी था।”
“आज शहर बदल गया है… लेकिन गोमती अब भी बह रही है। वह आज भी हमारी यादों को अपने साथ लेकर चलती है।”
अगर आप समझना चाहते हैं कि ये घाट लखनऊ के लिए क्या मायने रखते हैं, तो छठ पूजा के समय आइए। सब कुछ बदल जाता है। शहर खुद को नदी के इर्द-गिर्द फिर से व्यवस्थित करता है। सड़कें बंद होती हैं। लोकगीत भोर के अंधेरे में लाउडस्पीकरों से बहते हैं। जो परिवार साल भर गोमती नहीं गए, वो बाँस की टोकरियों में फल, गन्ना और ठेकुआ लेकर पहुँचते हैं।
दृश्य आत्मा को हिला देता है। स्त्रियाँ कमर तक पानी में खड़ी हैं, उनके चेहरे उगते और डूबते सूरज की ओर। उनके भाव में कुछ ऐसा है जिसका कोई पर्याप्त शब्द नहीं — समर्पण, कृतज्ञता और एक उग्र प्रेम का मिश्रण। सीढ़ियों पर खड़े पुरुष और बच्चे उतने ही उस क्षण के गुरुत्वाकर्षण में खिंचे हैं।
इसके अलावा, घाटों पर छठ यह याद दिलाती है कि रस्में नॉस्टेल्जिया नहीं होतीं। वे सामुदायिक जीवन का जीवित ऊतक हैं। वे यह तरीका हैं जिससे एक शहर खुद को याद दिलाता है कि वो क्या क़द्र करता है।
छठ पर घाटों पर जो दीप जले, वो सिर्फ रोशनी नहीं, एक वादा थे। गोमती से बंधे हैं हम सब इस तरह, जैसे धागे से मनके पिरोए जाते हैं।
कल्पना कीजिए… डूबता सूरज, मंदिर की घंटियाँ, दूर से आती अज़ान, कुल्हड़ की चाय और गोमती की ठंडी हवा। यही तो है असली लखनऊ।
पारिस्थितिकी का सवाल — एक शहर और उसकी ज़मीर
हर दीये और हर प्रार्थना के पीछे एक ख़ामोश आपात स्थिति है। गोमती तनाव में है। कई हिस्सों में ऑक्सीजन का स्तर लगभग शून्य हो गया है। नालों का पानी, निर्माण का मलबा और अनुपचारित अपशिष्ट मिलकर एक ऐसी नदी बना रहे हैं जिसे यह शहर पूजता है — और अक्सर ज़हर भी देता है।
प्रो. वेंकटेश दत्ता साफ़ कहते हैं: “प्रदूषण जमाव के कारण नदी में ऑक्सीजन का स्तर लगभग शून्य पर आ गया है।” राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने इसे दर्ज किया है। नागरिक समूहों ने सफाई अभियान चलाए हैं। पर चुनौती विशाल है — इसलिए नहीं कि समाधान नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि समाधान के लिए वर्षों का निरंतर राजनीतिक संकल्प और नागरिक प्रतिबद्धता चाहिए।
पारिस्थितिक संकट सांस्कृतिक संकट भी है। जब गोमती बीमार बहती है, तो घाट अपना सबसे ज़रूरी गुण खो देते हैं — जीवित जल से इंसान को जोड़ने की क्षमता। एक मरती नदी को की गई प्रार्थना में एक अजीब भार होता है — वो जाने-अनजाने, नदी के अपने जीवन की प्रार्थना बन जाती है।
क्या हम सचमुच आधुनिक हो गए हैं… या हमने अपनी नदियों और अपनी यादों से रिश्ता तोड़ लिया है?
एक शाम जो मैं अब भी सपने में देखता हूँ
नब्बे के दशक की एक याद है जो मन से नहीं जाती। सुबह का वक़्त है। हवा अक्टूबर की सर्द है और उसमें गेंदे और नदी की मिट्टी की खुशबू है। मैं किसी घाट की सबसे नीचे की सीढ़ी पर खड़ा हूँ — शायद कुड़िया, शायद देवराहा और लल्लू माई के बीच कहीं।
एक बुज़ुर्ग दोनों हथेलियों से मुँह धो रहे हैं। एक नाव खेने वाला लंबे बाँस से नाव को किनारे से दूर धकेल रहा है। एक चील एक बार ऊपर चक्कर लगाती है और गायब हो जाती है। गोमती इतनी चौड़ी है कि दूसरा किनारा सिर्फ एक सुझाव है — भूरे-गुलाबी आसमान के नीचे एक गहरी हरी रेखा। कोई नहीं बोल रहा। कहने को कुछ नहीं। नदी खुद कह रही है।
वो लखनऊ आज भी है। वो पानी के किनारे इंतज़ार कर रहा है — धैर्यवान, थोड़ा धुंधला, असंभव रूप से सुंदर। बस वहाँ जाकर खड़े होना है। बस गोमती को बोलने देना है। उसने बोलना कभी बंद नहीं किया। हम बस किनारे से दूर चले गए। अब वापस लौटने का वक़्त है।
इस शहर को जानना है, तो घाटों पर आओ, जहाँ गोमती बहती है, वहीं खुद को पाओ। नवाबी तहज़ीब की जड़ें यहीं हैं — इस मिट्टी में, इस पानी में, अपना आप समाओ।
लखनऊ की सबसे खूबसूरत कहानी न इमामबाड़े में छिपी है, न रूमी दरवाज़े में… वह आज भी गोमती के घाटों पर बह रही है।
जब हर त्योहार गोमती के घाटों पर उतर आता था
एक समय था जब लखनऊ के त्योहार केवल घरों में नहीं मनाए जाते थे।
वे गोमती के किनारों पर जीवंत हो उठते थे।
कार्तिक पूर्णिमा की सुबह…
देव दीपावली की शाम…
छठ पूजा की आराधना…
मकर संक्रांति का स्नान…
गणेश और दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन…
हर अवसर पर गोमती के घाट आस्था, संस्कृति और सामाजिक मेल-मिलाप का केंद्र बन जाते थे।
सैकड़ों दीप जलते थे।
बच्चों की हँसी गूँजती थी।
परिवार साथ बैठते थे।
और ऐसा लगता था कि पूरी नदी स्वयं एक उत्सव बन गई हो।
“नदियाँ सिर्फ पानी नहीं बहातीं… वे सभ्यताओं और यादों को भी ज़िंदा रखती हैं।
दीपों से जगमगाती शामें
शाम होते ही महिलाएँ पीतल की थालियों में दीप सजाती थीं।
बुज़ुर्ग मंत्र पढ़ते थे।
बच्चे उत्सुकता से दीप पानी में छोड़ते थे।
धीरे-धीरे पूरा नदी तट टिमटिमाते दीपों से भर जाता था।
उन दीपों में केवल घी नहीं जलता था।
जलती थीं उम्मीदें।
और जलती थीं प्रार्थनाएँ।
जलती थीं आने वाले कल की कामनाएँ।
कुछ जगहें केवल देखी नहीं जातीं… उन्हें महसूस किया जाता है। गोमती के घाट भी ऐसी ही एक जगह हैं।
घाटों की बदलती तस्वीर
समय के साथ शहर बढ़ा।
सड़कें चौड़ी हुईं।
ऊँची इमारतें बनीं।
नई कॉलोनियाँ बस गईं।
लेकिन इसी विकास के बीच कुछ घाट अपनी पुरानी चमक खोते चले गए।
जहाँ कभी नावें बंधती थीं…
वहाँ अब सन्नाटा है।
जहाँ शाम को लोकगीत गूँजते थे…
वहाँ अब वाहनों का शोर सुनाई देता है।
फिर भी…
घाट आज भी हार नहीं माने हैं।
वे अब भी हर सुबह लोगों का इंतज़ार करते हैं।
प्रदूषण—सबसे बड़ी चुनौती
गोमती केवल हमारी विरासत नहीं है।
वह हमारी जिम्मेदारी भी है।
दुर्भाग्य से वर्षों तक बढ़ते प्रदूषण, सीवर के पानी, प्लास्टिक और लापरवाही ने नदी को बहुत नुकसान पहुँचाया।
कई घाटों पर स्नान करना कठिन हो गया।
जलीय जीव कम होने लगे।
किनारों की प्राकृतिक सुंदरता प्रभावित हुई।
फिर भी पिछले कुछ वर्षों में सफाई और संरक्षण के प्रयासों ने नई उम्मीद जगाई है।
यह सफर अभी लंबा है।
लेकिन शुरुआत हो चुकी है।
क्या केवल सरकार जिम्मेदार है?
अक्सर हम सोचते हैं कि नदियों को बचाना केवल सरकार का काम है।
लेकिन सच इससे कहीं बड़ा है।
यदि हर व्यक्ति घाट पर प्लास्टिक न छोड़े…
और यदि पूजा सामग्री सही स्थान पर डाले…
यदि नदी को कूड़ेदान न समझे…
तो आधी समस्या स्वयं समाप्त हो सकती है।
नदियाँ कानून से नहीं…
संस्कारों से बचती हैं।
गोमती हमें क्या सिखाती है?
गोमती कहती है—
बहते रहो।
रुकना मत।
अपना स्वभाव मत छोड़ो।
जो तुम्हें गंदा करे, उसे भी जीवन दो।
जो तुम्हें छोड़ जाए, उसकी याद भी अपने साथ बहा ले जाओ।
यही तो नदी का धर्म है।
बशीर बद्र का एक प्रासंगिक शेर
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
गोमती के घाट भी कुछ ऐसे ही उजाले हैं।
जो हमारी यादों के साथ हमेशा चलते रहते हैं।
यदि घाट बोल पाते…
शायद वे कहते—
“हमने तुम्हारे पूर्वजों को देखा है।
तुम्हारे बचपन को देखा है।
और तुम्हारे त्योहार देखे हैं।
तुम्हारे आँसू भी देखे हैं।
अब हमारी भी थोड़ी चिंता कर लो।”
गोमती के घाट क्यों देखने चाहिए?
इमारतें शहर बनाती हैं… लेकिन नदियाँ उसकी पहचान बनाती हैं।
यदि आप इतिहास प्रेमी हैं—
तो यहाँ आइए।
यदि आप फोटोग्राफर हैं—
तो यहाँ आइए।
यदि आप लेखक हैं—
तो यहाँ आइए।
यदि आप जीवन की भागदौड़ से थक गए हैं
तो भी यहाँ आइए।
क्योंकि कभी-कभी उत्तर किताबों में नहीं…
नदी किनारे बैठने से मिलते हैं।
लखनऊ को केवल बड़ा इमामबाड़ा, रूमी दरवाज़ा या टुंडे कबाबी से नहीं जाना जा सकता।
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