Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

जीये जाते थे” “कितने आदमी थे ““सरदार। …दो ““वो दो और तुम तीन। ….खाली हाथ आ गए। ..“क्या समझते थे ! सरदार बहुत खुस होगा। ..साबासी देगा ““अरे ये तीनों हमरा नाम मिटटी में डुबो दिए “हाल में सन्नाटा छाया था। सामने स्क्रीन पर गब्बर सिंह अपने सामने खड़े कालिया और उसके साथियों पर दहाड़…

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“जब डायलॉग बोले नहीं जाते थे

जीये जाते थे”

“कितने आदमी थे “
“सरदार। …दो “
“वो दो और तुम तीन। ….खाली हाथ आ गए। ..
“क्या समझते थे ! सरदार बहुत खुस होगा। ..साबासी देगा “
“अरे ये तीनों हमरा नाम मिटटी में डुबो दिए “

हाल में सन्नाटा छाया था। सामने स्क्रीन पर गब्बर सिंह अपने सामने खड़े कालिया और उसके साथियों पर दहाड़ रहा था। हम लोग इंतज़ार सांस रोके इंतज़ार कर रहे थे। ..की अब क्या होगा। ……..
और उसके बाद तो rest is history .

कुछ यादें होती हैं…
जो कभी पुरानी नहीं होतीं।

वो दिल के किसी कोने में चुपचाप बैठी रहती हैं…
बस इंतज़ार करती हैं—
किसी आवाज़ का… किसी गीत का… या किसी डायलॉग का।

और फिर… अचानक सब कुछ वापस आ जाता है।

जैसे आज…
इस अखबार के एक टुकड़े ने मुझे सीधा पहुँचा दिया—
बहराइच के पीपल चौराहे पर।

पहलवान पान वाले—एक दुकान, एक सिनेमा

वो कोई साधारण पान की दुकान नहीं थी।
वो हमारी फिल्मी दुनिया का दरवाज़ा थी।

पहलवान पान वाले शाम होते ही अपना रिकॉर्ड प्लेयर चालू करते…

और फिर—

“कितने आदमी थे?”

छोटा शहर था –बहराइच – और कोई सोशल मीडिया का ज़माना तो था नहीं , बस ऐसे ही मौज़ ली जाती थी। उस समय के आदमी के पास समय ही समय था। .उसे कहीं जाने की जल्दी नहीं होती। मौज़ करना उसकी आदत में शुमार था. इस लिए मौका मिलते ही आनंद लेने के जुगाड़ में आ जाता।

बस…
पूरा चौराहा रुक जाता।

साइकिल रुक जाती।
बातें रुक जातीं।
समय रुक जाता।

क्योंकि उस पल…
हम बहराइच में नहीं थे…
हम रामगढ़ में थे।

जब हीरो भगवान हुआ करते थे

हमें याद है की उस वक्त फ़िल्मी एक्टर किसी भगवान् से कम न थे. छोटा शहर था और हम उस समय सातवें या आठवें के स्टूडेंट थे।

आज के हीरो स्टार हैं…
तब के हीरो भगवान थे।

उस समय एक बार सुजीत कुमार और राममोहन बहराइच आये। सारे स्कूलों में छुट्टी कर दी गयी थी। …उनके दर्शन पाने के लिए।

वो वहां केवल बीस-पचीस मिनट ही रहे। ..जिसने उन्हें देखा। ..वो धन्य हो गया।

..बिन्नू और हम भी उन खुशनसीबों में से एक थे.

जब सुजीत कुमार और राम मोहन बहराइच आए—
तो मानो मेला लग गया।

स्कूल बंद।
कॉलेज खाली।
लड़के दीवार फांद कर भागे।

बस एक झलक के लिए।

“दर्शन हो गया?”
“हाँ… देख लिया!”

और वो खुशी…
जैसे कोई सपना पूरा हो गया हो।

डायलॉग—जो दिल में बस गए

फिर भाई। ..दीवार आयी। ..एंग्री यंग मैंन। …अमिताभ बच्चन की। उसका एक डायलॉग था -“ मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता हूँ”

एक और डायलॉग था -“पीटर तुम मुझे वहां ढूंढ रहे थे और मैं तुम्हारा यहाँ इंतज़ार कर रहा था”
भैय्या– बस हाल में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज गयी. वहां स्क्रीन पर अमिताभ नहीं। ..मानो हम दर्शक खुद ही बोल रहे हों. चार बार देखी थी ये पिक्चर।

उस दौर में डायलॉग सिर्फ शब्द नहीं थे…
वो जज़्बात थे।

राजेश खन्ना की स्टाइल ” बाबू मोशाय “ डायलॉग नहीं एक दर्शन था , फिलोसोफी थी.
आनंद में उनका डायलॉग “ बाबू मोशाय ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए -लम्बी नहीं” न जाने कितनों को ज़िन्दगी दे गया.

फिर आयी अग्निपथ – ” विजय दीनानाथ चौहान —–पूरा नाम “ अमिताभ की deep bariton आवाज़ में सिहरन पैदा करता था.
धर्मेंद्र जी को हम कहाँ पीछे छोड़ सकते हैं —“कुत्ते –मैं तेरा खून पी जाऊंगा।” उनके अंदर के एक सच्चे आदमी के गुस्से को दिखाता है.

सबसे मज़ेदार बात तो थी कि सिनेमा ने उस समय की जनरेशन को — चाहें कितना बड़ा या छोटा आदमी हो – पूरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले रखा था.

हमारे मुन्नू चाचा तो अपने समय की “ मुगले-आज़म ” के दीवाने थे. और अक्सर अपनी बुलंद आवाज़ में बोलते थे “जिल्लेइलाही’
एक मज़ेदार वाकया है –

एक दिन हम सब परिवार वाले अपने घर के ड्राइंग रूम में बैठे थे। तब हमारे बाबा ज़िंदा थे और वो भी वहीँ थे। उस समय हमारे दोस्त और बहनोई अतुल का विवाह हमारी बहन बंटी से तय हो गया था. मुन्नू चाचा ( उन्हें आँख से कम दिखाई देता था और उस समय वो बाबाजी को नहीं जान पाए थे) उन्होंने अपनी बुलंद आवाज़ में अतुल को मुगले आज़म के डायलॉग से ललकारा- “तकदीरें बदल जातें हैं, मुल्कों की तारीख बदल जाते है, शहंशाह बदल जाते हैं, —-मगर इस बदलती हुई दुनियाँ में मोहब्बत जिसका दामन थाम लेती है , वो इंसान नहीं बदलता “

बाबाजी ने सुना और जोर की डाँट लगाई -“-वो देखो -मुगले आज़म आये हैं।” और मुन्नो चाचा वहां से नौ-दो ग्यारह हो गए.

इस तरह के कई मज़ेदार डायलॉग ने लोगों की बोलचाल में अपना स्थान बना लिया था.
कई एक तो अब भी पॉपुलर हैं –
जैसे शाहरुख़ का डायलॉग “ बड़े बड़े देशों में छोटी छोटी बातें होती रहती है। .सेनोरिटा “
एक और डायलॉग –
इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हे पाने की कोशिश है”
इसके अलावा थ्री इडियट्स में आमिर खान का डायलॉग – All is well . बड़ा पॉपुलर था.
एक और डायलॉग आज की फिल्म धुरंधर से – “घायल हूँ इस लिए घातक हूँ” इसका इस्तेमाल तो अभी अभी राघव चड्ढा ने आप पार्टी छोड़ते हुए विरोधियों को बोला था.

एक सच्ची कहानी… जो आज भी रुला देती है

हमारे जानने वाले एक व्यक्ति…
कैंसर से जूझ रहे थे।

हिम्मत हार चुके थे।

किसी ने कहा—आनंद देखो।

उन्होंने देखा।

और जैसे…
उनके अंदर फिर से जान आ गई।

राजेश खन्ना की मुस्कान…
वो डायलॉग—

“जिंदगी बड़ी होनी चाहिए…”

और वो आदमी…
धीरे-धीरे ठीक हो गया।

दवा ने इलाज किया होगा…
पर जीने की वजह—
आनंद ने दी।

कलम के जादूगर

  • कादर खान
  • जावेद अख्तर
  • गुलज़ार

इन लोगों ने सिर्फ डायलॉग नहीं लिखे…
उन्होंने हमारी ज़िंदगी लिख दी।

एक शेर जो उस दौर को बयान करता है

“कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है…”

वो दौर…
दिल से जुड़ा हुआ था।

अंत—जो कभी खत्म नहीं होता

आज फिल्में आती हैं…
और चली जाती हैं।

पर तब—

“फिल्में आती जाती थीं…
डायलॉग हमेशा के लिए रह जाते थे।”

आज भी…
अगर कहीं कोई कह दे—

“कितने आदमी थे…”

तो दिल मुस्कुरा उठता है।

वो दिन भी क्या दिन थे…”

शायद वो वक्त वापस नहीं आएगा…
पर उसकी खुशबू आज भी हमारे साथ है।

और यही तो यादों की सबसे बड़ी खूबसूरती है—
वो जाती नहीं…
बस चुपचाप हमारे अंदर जीती रहती हैं

शायरी जो उस दौर को बयान करती है

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।”* — मजरूह

यादें कभी खत्म नहीं होतीं…
वो बस दिल में चुपचाप जीती रहती हैं।


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