जब इशहाक खान ने तिवारी जी के लिए इंसानियत की मिसाल पेश की”

आज के दैनिक भास्कर में एक खबर पढ़ी, लगा की दोस्त ही सब कुछ है, इस दुनिया में- – उसे न आपसे कुछ नहीं चाहिए –सिवाय आपकी दोस्ती के -और हमेशा आपको देने के लिए तैयार रहने वाला जज्बा – ये होता है एक दोस्त में- वो केवल दोस्त होते हैं- न हिन्दू – न मुसलमान – न बड़े आदमी – न छोटे आदमी। हमने भी दोस्ती जी है – इसलिए दोस्ती की कद्र मालूम है. आज हम यहाँ आपके लिए इसी दोस्ती की कहानी लाये हैं. आप भी जितना भर भर के दोस्ती जी पाईं -जी लें. पता नहीं – कल हो न हो।
महोबा से आई उस तस्वीर ने जैसे दिल को थाम लिया…
कोई बड़ी घटना नहीं थी, कोई खबरों की सुर्खी बनने वाला मामला नहीं था—
लेकिन उसमें जो था, वो आज के दौर में बहुत दुर्लभ है…
एक इंसान का दर्द… और दूसरे इंसान का बिना सोचे दौड़ पड़ना।
तस्वीर में थे—
तिवारी जी… जिनके पैर में कांच चुभ गया था…
और इशहाक खान… जो दौड़ते हुए आए, और अपने दोस्त का इलाज किया।
उस पल में ना कोई मजहब था, ना कोई पहचान—
बस दोस्ती थी…
और जैसे मिर्ज़ा ग़ालिब का ये शेर जैसे इस पल को बयान करता है—
“बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।”
आज इंसान होना ही मुश्किल हो गया है…
और वहाँ, एक इंसानियत का जिंदा उदाहरण हमारे सामने था।
एक छोटी-सी घटना, लेकिन गहरा एहसास
दोपहर की हल्की धूप, गांव की शांत गलियां…
और अचानक एक दर्द की आवाज—
“अरे राम!”
तिवारी जी के पैर में कांच चुभ गया था।
खून बहने लगा… लोग इकट्ठा हुए…
पर हर कोई बस खड़ा था।
तभी आवाज आई—
“इशहाक भाई को बुलाओ!”
और जैसे ही ये बात इशहाक खान तक पहुंची,
वो बिना कुछ सोचे दौड़ पड़े…
ये वही दोस्ती है, जिसके लिए बशीर बद्र ने कहा था—
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता…”
लेकिन यहां तो कोई मजबूरी नहीं थी—
बस सच्ची दोस्ती थी, जो हर मजबूरी से ऊपर थी।
❤️ दोस्ती का असली मतलब
इशहाक खान आए…
घुटनों के बल बैठे…
अपने दोस्त का पैर अपने हाथों में लिया…
कांच निकाला…
घाव साफ किया…
पट्टी बांधी…
उस वक्त ना कोई धर्म था, ना कोई दूरी—
बस दिल से दिल का रिश्ता था।
और राहत इंदौरी का ये शेर जैसे उस पल की आवाज बन गया—
“सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में,”
दोस्ती भी कुछ ऐसी ही होती है—
वो किसी एक की नहीं होती…
वो सबकी होती है…
बचपन की वो दोस्ती, जो उम्र भर साथ रहती है
शायद तिवारी जी और इशहाक खान की दोस्ती कोई नई नहीं थी…
शायद वो बचपन से साथ थे…
एक साथ खेलना…
एक साथ खाना…
एक साथ सपने देखना…
और वही बचपन की दोस्ती आज भी जिंदा थी।
जैसे अहमद फ़राज़ ने लिखा—
“रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ…”
दोस्ती में लड़ाई भी होती है, शिकायत भी…
लेकिन जब दर्द आता है—
तो वही दोस्त सबसे पहले साथ खड़ा होता है।
एक छोटी-सी याद — मेरी भी
मेरी जिंदगी भी में ऐसी कई घटनाएं है. उनमे से एक यहाँ पेश है-
मेरा दोस्त मुशाहिद है- अभी कुछ वर्ष पहले मेरे शरीर में खून की कमी हो गयी थी. डॉक्टर ने हमें हॉस्पिटल में भर्ती कर लिया और बोले की पांच यूनिट खून चढ़ाना पड़ेगा। बिन्नू बहुत परेशान थे की क्या किया जाए – उसे समय मुशाहिद आये और बोले- बिन्नू भाई आखिर हम किस लिए हैं – मुशाहिद बिन्नू को बहुत मानते थे. बस –तुरंत लेट गए – ब्लड देने के लिए और —दो यूनिट ब्लड दिया – और हमारी जान बच गयी. हम तो आज भी कहते हैं की हमारे अंदर तो हिन्दू -मुसलमान – दोनों खून है- अब ये नहीं पता की रंग एक जैसा है या अलग अलग। खैर साहब। ….आज बिन्नू नहीं हैं , लेकिन उस दिन मुशाहिद ने दोस्ती की लाज रखी.
इसके अलावा – हमारे हर कदम पर दोस्तों ने पूरा साथ दिया – ज़िंदगी में एक समय ऐसा भी आया – जो रफ़ी साहब के शब्दों में –
“वक्त इंसान का ऐसा भी कभी आता है ,
राह में छोड़ के साया भी चला जाता है.”
लेकिन ऐसे समय में हमारे दोस्तों ने हमें अपने हाथों में उठा रखा था.
गुलज़ार की ये पंक्तियाँ दिल में उतर जाती हैं—
“दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन,
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए…”
वो दोस्ती… आज भी दिल में जिंदा है।
आज के दौर में इस कहानी की अहमियत
आज दोस्ती सोशल मीडिया तक सीमित हो गई है—
लाइक, कमेंट और शेयर में…
लेकिन असली दोस्ती वहां होती है—
जहां कोई बिना बुलाए दौड़ पड़े…
जहां कोई दर्द देखकर खुद बेचैन हो जाए…
और जहां कोई ये ना सोचे कि “मुझे क्या मिलेगा?”
जैसे जावेद अख्तर ने लिखा—
“ये जो ज़िंदगी की किताब है,
ये किताब भी क्या किताब है…”
इस किताब में असली पन्ने वही होते हैं—
जहां दोस्ती की कहानी लिखी होती है।
❤️ इंसानियत की जीत
महोबा की ये छोटी-सी घटना हमें सिखाती है—
कि इंसानियत अभी जिंदा है।
ना कोई दीवार रहती है…
ना कोई दूरी…
बस एक रिश्ता रहता है—
दिल का।
और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का ये शेर इस कहानी का सार बन जाता है—
“और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा,
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा…”
लेकिन दोस्ती…
वो हर दुख से ऊपर होती है।
कितना अच्छा होता…
अगर हम सब अपने अंदर के “इशहाक खान” को जगा पाते…
और किसी के दर्द में बिना सोचे दौड़ पड़ते…
क्योंकि आखिर में—
“इंसान का इंसान से हो भाईचारा,
यही पैगाम हमारा…”
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