Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

वो रात जो देख रही थी मुझे वो रात अजीब थी… बारिश हो रही थी,पर ऐसा लग रहा था जैसे बारिश देख रही हो मुझे। सड़कें खाली थीं,पर सन्नाटा बोल रहा था। और मैं… चल रहा था। बिना मंज़िल के।बिना वजह के। अंदर का तूफ़ान ज़िंदगी का एक दौर ऐसा भी आता है… जब सब…

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वो अजनबी… जो मेरी बारिश समझ गया”

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वो रात जो देख रही थी मुझे

वो रात अजीब थी…

बारिश हो रही थी,
पर ऐसा लग रहा था जैसे बारिश देख रही हो मुझे

सड़कें खाली थीं,
पर सन्नाटा बोल रहा था।

और मैं…

चल रहा था।

बिना मंज़िल के।
बिना वजह के।

अंदर का तूफ़ान

ज़िंदगी का एक दौर ऐसा भी आता है…

जब सब कुछ टूटता नहीं,
धीरे-धीरे खत्म होता है।

रोज़ थोड़ा-थोड़ा।

ज़िंदगी क्या है, एक कहानी है,
कभी हँसी, कभी वीरानी है।”

उस रात…

मैं बस खुद से भाग रहा था।

मुलाकात — एक अजनबी, या एक आईना?

एक छोटी सी चाय की दुकान दिखी।

पीली सी रोशनी।
टूटी हुई बेंच।
और उबलती चाय की खुशबू।

वहाँ वो बैठा था।

एक बुज़ुर्ग।

साधारण।

पर उसकी आँखें…

जैसे सब जानती हों।

चाय?” उसने पूछा।

मैंने हाँ कर दी।

खामोशी का संवाद

कुछ देर हम चुप बैठे रहे।

फिर उसने पूछा—

“भाग रहे हो?”

मैं चौंक गया।

मैंने कुछ नहीं कहा था।

या किसी ऐसी चीज़ के पीछे भाग रहे हो जो दिखती नहीं?”

मैं मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ—
बस… दिन खराब था।”

वो हल्के से हँसा—

“बेटा, खराब दिन इंसान को ऐसे नहीं चलाते।”

कहानी के अंदर की कहानी

उसने एक कहानी सुनाई—

एक आदमी की…

जिसने सब खो दिया।

मैंने पूछा—
फिर क्या हुआ?”

वो बोला—

“कुछ नहीं।”

मैं चौंका—
कुछ नहीं?”

हाँ। क्योंकि ज़िंदगी बड़े मौके नहीं देती… छोटे-छोटे मौके देती है।”

एक छोटी सीख — जूते और सफर

उसने मेरे गीले जूतों की तरफ इशारा किया—

सफर मुश्किल क्यों लगता है?”

मैं चुप।

क्योंकि लोग रास्ते पर ध्यान देते हैं… जूतों पर नहीं।”

मैं हँस पड़ा।

“मतलब?”

अगर जूते मजबूत हैं — सोच, धैर्य, विश्वास — तो सफर आसान लगता है।”

एक शेर जिसने दिल छू लिया

हौसले के आगे कोई दीवार नहीं होती,
हर रास्ता मंज़िल तक जाता है।”

उस पल…

मुझे लगा मैं अकेला नहीं हूँ।

मोड़ — वो था कौन?

बारिश थम गई।

मैंने पैसे देने चाहे—

कितने हुए?”

वो मुस्कुराया—

जब ज़िंदगी ठीक हो जाए… तब दे देना।”

मैंने पीछे मुड़कर देखा—

वो जा चुका था।

अजीब सच

जब मैंने दुकान की तरफ देखा—

वो वहाँ थी ही नहीं।

ना बेंच।
ना बल्ब।

जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

आज — जब समझ आया

ज़िंदगी तुरंत नहीं बदली।

पर मैं बदल गया।

अब मैं पूछता हूँ—

अब क्या करना है?”

और धीरे-धीरे…

जवाब मिलने लगे।

हर अजनबी एक कहानी है

आज भी जब कोई उदास दिखता है…

मुझे वो अजनबी याद आता है।

शायद वो इंसान नहीं था…

शायद वो उम्मीद थी।

कुछ तो बात है इन हवाओं में,
जो हर दर्द को सहला देती हैं।”

शायद…

हमें पूरी दुनिया नहीं चाहिए।

बस…

एक सही मुलाकात।

एक अजनबी।

एक पल।

जो हमें याद दिलाए—

हम अपने तूफ़ानों से बड़े हैं।


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