
यहाँ दी गयी फोटो ईरान-अमेरिका-इजराइल वॉर के दरमियान की है। इतनी भयानक लड़ाई के बाद, यह एक उम्मीद लेकर आती है। यह ज़िन्दगी की उम्मीद है। इंसान ने सोच रखा था कि सब कुछ मिटा देगा। इस उम्मीद पर सब कुछ टिका है। सारी इंसानियत इस पर ही निर्भर करती है।
धुएँ में झूलती उम्मीद
समुद्र के किनारे शाम उतर रही है…
आसमान जैसे किसी ने आँसुओं से रंग दिया हो।
दूर क्षितिज पर उठता धुआँ—
जैसे धरती ने अपनी पीड़ा को आसमान में उछाल दिया हो।
लहरें आ-जा रही हैं,
पर आज उनमें भी एक बेचैनी है…
जैसे वे भी युद्ध का बोझ महसूस कर रही हों।
और तभी—
इस सारी तबाही के बीच—
एक छोटा-सा झूला दिखाई देता है…
उस झूले पर बैठी है एक बच्ची।
धीरे-धीरे झूलती हुई…
मानो दुनिया के सारे शोर से अनजान।
यह दृश्य विरोधाभास नहीं—
यह जीवन का सबसे सच्चा रूप है।
“धुएँ के दरमियान भी एक रोशनी पलती है,
जिंदगी हर हाल में अपनी राह निकलती है।”
वह बच्ची नहीं जानती युद्ध क्या है…
वह सिर्फ इतना जानती है—
जीना है।
और शायद यही सबसे बड़ा साहस है।
“तूफानों से कह दो, अपनी औकात में रहें,
जिंदगी का इरादा अभी बाकी है।”
उसकी हर झूल—
जैसे एक घोषणा है—
“मैं अभी जिंदा हूँ… और जीती रहूँगी।”
लहरों की खामोशी में छिपा डर
आज लहरें भी चुप हैं…
जैसे उन्होंने भी युद्ध देख लिया हो।
दूर कहीं धमाका हुआ है,
और धुआँ आसमान से पूछ रहा है—
“कब तक?”
“हर तरफ़ आग है, हर तरफ़ खौफ़ का साया है,
फिर भी इंसान ने जीने का हौसला पाया है।”
समुद्र गवाह है—
कि इंसान टूटता है,
पर खत्म नहीं होता
जिंदगी हमेशा जीतती है
युद्ध आएँगे…
धुएँ उठेंगे…
आसमान काला होगा…
लेकिन…
जिंदगी कभी हार नहीं मानती।
वह हर बार राख से उठती है,
हर बार टूटकर भी खुद को जोड़ती है।
“मिट्टी से उठकर आसमान छू लेती है,
जिंदगी हर बार नई कहानी बुन लेती है।”
वह बच्ची—
जिसने धुएँ में झूलना सीखा—
वह सिर्फ एक बच्ची नहीं,
वह पूरी इंसानियत का चेहरा है।
एक ऐसा चेहरा, जो कहता है—
“तुम जितना डराओगे,
मैं उतना ही मुस्कुराऊँगी।”
“अंधेरों की हद होती है, उजालों का सफर नहीं,
जिंदगी की जंग में हार का कोई असर नहीं।”
और अंत में, यही सच बचता है—
युद्ध हारता है…
डर हारता है…
लेकिन जिंदगी—
हमेशा जीतती है।
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