Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

(अथाह जन सैलाब : रामजी के द्वार) “कभी-कभी भगवान दर्शन नहीं देते…बल्कि बुलाते हैं—और रास्ता भी खुद बनाते हैं…” एक पुकार, जो भीतर से उठती है “बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुर्लभ सद्ग्रंथन गावा…” कभी-कभी हम यात्रा की योजना नहीं बनाते…बल्कि यात्रा हमें चुन लेती है। अयोध्या की यह यात्रा भी कुछ ऐसी ही…

जब राम ने बुलाया : मेरी अयोध्या यात्रा

(अथाह जन सैलाब : रामजी के द्वार)

“कभी-कभी भगवान दर्शन नहीं देते…
बल्कि बुलाते हैं—और रास्ता भी खुद बनाते हैं…”

एक पुकार, जो भीतर से उठती है

“बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुर्लभ सद्ग्रंथन गावा…”

कभी-कभी हम यात्रा की योजना नहीं बनाते…
बल्कि यात्रा हमें चुन लेती है।

अयोध्या की यह यात्रा भी कुछ ऐसी ही थी—
न कोई पूर्व योजना, न कोई विशेष तैयारी…
बस एक अनजानी-सी पुकार,
जो भीतर कहीं गूंज रही थी।

शायद वही पुकार थी—
“आओ… मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ…”

कहते हैं—
होइहि सोइ जो राम रचि राखा,
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥”

जब-जब जीवन की राहें उलझती हैं,
जब मन संशय में डोलता है,
तब यही चौपाई दीपक बनकर मार्ग दिखाती है।

यह कथा भी उसी सत्य की साक्षी है—


और जब राम बुलाते हैं,
तो रास्ते खुद बनते हैं,
संयोग अपने आप जुड़ते हैं,
और असंभव भी संभव हो जाता है।

यह यात्रा केवल अयोध्या तक पहुँचने की नहीं थी…
यह यात्रा उस विश्वास तक पहुँचने की थी,
जो हर कठिनाई में भी मुस्कुराकर कहता है—
“राम हैं… और सब ठीक है…”

भीड़ की बेचैनी, धूप की तपिश,
और जीवन की सारी उलझनों के बीच—
एक ही सहारा था…
“राम नाम…”

और शायद यही भक्ति है—
जहाँ तर्क समाप्त हो जाता है,
और विश्वास शुरू होता है।

कहते हैं—अयोध्या जाना सिर्फ़ एक यात्रा नहीं, एक आह्वान होता है।
और जब यह आह्वान आता है, तो योजनाएँ नहीं बनतीं…
बस रास्ते खुद बनते चले जाते हैं।

मेरी यह अयोध्या यात्रा भी कुछ ऐसी ही थी—
न कोई महीनों की तैयारी, न कोई विस्तृत प्लानिंग…
बस एक अचानक बना कार्यक्रम,
जिसके सूत्रधार थे—मेरी भांजी बुलबुल और उसके पति विजित

एक नई शुरुआत, एक पवित्र निर्णय

हाल ही में वे दोनों युद्धग्रस्त देश कतर से सुरक्षित लौटे थे।
उनके चेहरे पर एक अजीब-सी थकान भी थी, और राहत भी।

शायद उसी राहत ने जन्म दिया इस विचार को—
“चलो, राम के दरबार चलते हैं…”

यह यात्रा अचानक बनी…”

“बुलबुल… और विजित…”

“…जो जीवन के कठिन दौर से लौटे थे…”

“शायद उन्होंने सिर्फ़ यात्रा नहीं…
एक प्रार्थना चुनी थी…”

इस लिए शनिवार की सुबह बँटी — हमारी बहन — ने अयोध्या जाने का प्रस्ताव दिया। हमने तुरंत प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। हम तुरंत सहर्ष तैयार हो गए।

कहते हैं की चिराग तले अँधेरा रहता है – ये कहावत हम पर भी ठीक ठीक उतरती है. लखनउ से अयोध्या केवल 130 km दूर है. फिर भी हम अब तक प्रभु के दर्शन करने नहीं जा सके. जबकि उनके दर्शन के लिए दक्षिण भारत लोगों की भीड़ लगी थी. खैर साहब – इतवार को हम सब अपनी -अपनी गाड़ियों से सुबह 8 बजे रामजी के बुलावे पर चले. हम अयोध्या की ओर निकल पड़े.

रामनवमी का उत्सव और आस्था का सागर

अयोध्या पहुँचते ही लगा जैसे—
पूरा भारत, बल्कि पूरा संसार, यहाँ उमड़ आया हो।

रामनवमी का दिन, ऊपर से रविवार—
भीड़ इतनी कि कदम रखने की जगह मुश्किल से मिल रही थी।

हर तरफ़ बस एक ही स्वर—

“राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जो चाहसि उजियार॥”

अयोध्या उस दिन शहर नहीं थी—
एक भावना थी।

भजन, ढोल, शंख, और लाखों कंठों से उठती पुकार—
“जय श्री राम… जय श्री राम…”

"सिया राम मय सब जग जानी…"

लेकिन साथ ही—
तेज धूप, पसीना, और अंतहीन कतारें।

“भीड़ इतनी थी कि उम्मीद खत्म हो चुकी थी…
लेकिन शायद राम ने अभी बुलाना बाकी रखा था…”

त्याग का क्षण… और ईश्वर की कृपा

भीड़ देखकर लगा कि शायद दर्शन संभव नहीं।
हमने सोचा—परिवार के कुछ लोग जाएँ,
और हम बाहर रहकर सामान की रक्षा करें।

मन में हल्की-सी पीड़ा थी…
पर यही तो भक्ति की परीक्षा है—त्याग।

तभी—जैसे किसी ने भीतर से संकेत दिया हो—
एक व्यक्ति हमारे पास आया।

उसने कहा—
“मैं आपको अंदर से दर्शन करवा दूँगा…”

लेकिन शायद वही पल था—
जब राम ने सोचा, “अब इन्हें बुलाना चाहिए…”

“कभी-कभी त्याग ही सबसे बड़ा निमंत्रण होता है।”

उस क्षण मन ने कहा—
“यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं… यह तो रामजी का दूत है।”

वो आया…
जैसे कोई उत्तर बनकर आया हो।

ना परिचय, ना प्रश्न—
बस एक रास्ता…
“मैं आपको अंदर ले चलूँगा…”

शायद वही क्षण था—
जब ईश्वर मुस्कुराए।

उस क्षण—
भक्ति ने तर्क को हरा दिया।

“होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा॥”

गर्भगृह में—वह अवर्णनीय क्षण

और फिर…
हम रामलला के सम्मुख थे।

वह दृश्य शब्दों से परे था।

” भए प्रगट कृपाला परम दयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मनहारी अदभुत रूप बिचारी॥

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥”

मेरे भाई शलभ की आँखें नम थीं…
मेरे सामने अपने सभी प्रियजनों के चेहरे थे—
माँ, परिवार, दोस्त…

“रामहि केवल प्रेम पियारा, जानि लेहु जो जाननिहारा॥”

मैंने हाथ जोड़कर कहा—
“प्रभु, सबको सुखी रखना…”

और उसी क्षण—
दिल में एक टीस उठी—

“बिन्नू…”

बिन्नू की याद—हर सांस में

अयोध्या के हर कोने में मुझे बिन्नू महसूस हुआ।
हम पहले भी यहाँ साथ आए थे—

जब अयोध्या, फ़ैज़ाबाद का एक शांत हिस्सा हुआ करती थी।
तब यहाँ इतनी भव्यता नहीं थी…
बस एक सादगी थी, एक ठहराव।

आज सब बदल गया है—
लेकिन यादें आज भी वैसी ही हैं।

कुछ लोग जाते नहीं… बस दिखना बंद हो जाते हैं।”

बिन्नू के लिए

“जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी॥”

तुम थे…
भीड़ में भी, खामोशी में भी।

तुम नहीं थे…
पर हर जगह थे।


“कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते,
बस दिखना बंद हो जाते हैं…”

हनुमानगढ़ी की सीढ़ियाँ…

हमने रामजी के दर्शन किए। इसके बाद हम हनुमान गढ़ी की ओर चले। भीड़ का सागर उमड़ा पड़ रहा था।

सीढ़ियों की ऊंचाई देखकर बिन्नू ने एक बार कहा था, “भैया, हनुमान जी तो वानर हैं। वे कूदकर ऊपर पहुँच जाएंगे। लेकिन हम तो साधारण इंसान हैं।”

यह विचार बिन्नू के मन में आया। हनुमान जी के एक अनन्य भक्त, बिन्नू, ने यह कहा था.

आज हमारे लिए भी इतना चढ़ाई करना एक बड़ा प्रश्न था।

हर सीढ़ी जैसे एक परीक्षा थी।
भीड़, धक्का-मुक्की, थकान…

लेकिन जैसे ही “जय बजरंगबली” की आवाज़ आई—
शरीर में ऊर्जा दौड़ गई।

हनुमानगढ़ी

सीढ़ियाँ कठिन थीं—
पर नाम सरल—

“बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥”

और हर थकान मिट गई।

और उस पल लगा—
“जब हनुमान साथ हों, तो कोई चढ़ाई कठिन नहीं होती।”

और हम
जय सिया राम कहते चल पड़े.

“राम तक पहुँचने का मार्ग, हनुमान से होकर ही जाता है…”

लता मंगेशकर चौक : संगीत और श्रद्धा का संगम

( लता मंगेशकर चौक )


वीणा मौन थी—
पर भीतर संगीत था।

जैसे समय ठहर गया हो।

वीणा खड़ी, मौन में गाती—
एक अनसुनी सी सरगम लाती।

हम लता मंगेशकर चौक पहुँचे—
जहाँ वीणा की विशाल प्रतिमा,
जैसे संगीत और भक्ति का संगम प्रतीत हो रही थी।

उस क्षण ऐसा लगा—

जैसे लता जी की मधुर आवाज़ अब भी गूंज रही हो—

“ऐ मालिक तेरे बंदे हम…”

“कुछ आवाज़ें कभी नहीं जातीं,
बस हवा में बस जाती हैं…”

वह स्थान सिर्फ़ एक चौक नहीं,
बल्कि एक भावनात्मक स्मारक है।

(राम की पैड़ी – शाम के धुंधलके में )

राम की पैड़ी और नया घाट : सरयू की गोद में

हम पहुँचे—राम की पैड़ी और नया घाट

सूरज ढल रहा था…
सरयू की लहरें सुनहरी हो उठी थीं।

आरती शुरू हुई—

“ॐ जय सरयू माता…”

हजारों दीप जल उठे…
पानी में उनकी परछाईं—जैसे आकाश धरती पर उतर आया हो।

वह दृश्य…
मानो आत्मा को धो गया हो।

दीप जले, लहरें मुस्काईं,
सरयू ने बाहें फैलायीं।
हर एक ज्योति कहती थी—
“तू भी अपने भीतर लौट आ…”

ईद का संदेश और एक प्रार्थना

एक दिन पहले ही ईद थी।
वहाँ खड़े होकर मैंने सरयू जी के सामने
अपने दोस्त मुशाहिद और उसके परिवार के लिए भी दुआ मांगी।

राम की नगरी, सरयू किनारा—
मैंने हाथ उठाया दोबारा।
“या राम, या अल्लाह…”
दो नाम, एक पुकार।

मुशाहिद के लिए दुआ निकली—
और दिल ने कहा—


“इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है…”

उस क्षण लगा—
धर्म अलग हो सकते हैं,
लेकिन प्रार्थना की भावना एक ही होती है।

“ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान…”

मैंने हाथ उठाए—
मुशाहिद के लिए।

ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी॥”

उस क्षण धर्म नहीं—
मानवता थी।

समापन : एक अधूरी पूर्णता

यह यात्रा पूर्ण भी थी, और अधूरी भी।

पूर्ण इसलिए—
क्योंकि राम के दर्शन हुए, सरयू का आशीर्वाद मिला।

अधूरी इसलिए—
क्योंकि बिन्नू की कमी हर पल महसूस हुई।

लेकिन शायद—
वह कहीं न कहीं हमारे साथ ही था।

जब अयोध्या से लौट रहा था,
तो लगा जैसे कुछ पीछे छूट गया है…
और कुछ हमेशा के लिए मेरे भीतर बस गया है।

यह यात्रा खत्म नहीं हुई—
यह तो अब शुरू हुई है…
मेरी आत्मा में, मेरे विचारों में, मेरी हर प्रार्थना में।

रामलला के दर्शन ने एक बात सिखा दी—
कि जीवन हमेशा हमारी इच्छा के अनुसार नहीं चलता,
पर जो होता है…
वह हमेशा हमारे हित में होता है।

और शायद यही सच्ची भक्ति है—
— बिना प्रश्न किए स्वीकार करना,
— बिना शर्त विश्वास करना।

आज भी जब आँखें बंद करता हूँ,
तो वही ध्वनि गूंजती है—

“जय श्री राम…”

और दिल धीरे से कह उठता है—
“यह बुलावा फिर आएगा… और मैं फिर चल पड़ूँगा…

यह यात्रा अयोध्या की नहीं थी—
यह यात्रा भीतर की थी।

राम की शरणागति

“नहिं कलि करम न भगति बिबेकू।
राम नाम अवलंबन एकू॥”

अर्थात आज के युग में – न तो कर्म और न ही ज्ञान ही पूर्णता को प्राप्त हैं. केवल राम नाम का अवलंबन है.
जय सिया राम

और अंत में

“रामहि केवल प्रेम पियारा…”
और शायद यही इस पूरी यात्रा का सार है—
कि अंत में,
प्रेम ही भगवान तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग है।


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2 responses to “जब राम ने बुलाया : मेरी अयोध्या यात्रा”

  1. Rajeev Avatar

    Dada, unfortunately I was unknown, why don’t you call me. Any way you have done a great. Lord Rama’s blessings to you & your family. Next time I would like to share with you Darshan of sri Ram in Ayodhya ji. Rajeev. Love brothers, Pranam to you.

    1. Nikhilbinnu Avatar

      ashirwaad …..it was a sudden decision by banti. anyway ……good luck

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