(लखनऊ की एक इफ्तार की कहानी)

शाम की नमाज़ की अज़ान हवा में तैर रही थी,
गोमती के पानी पर ढलता सूरज मुस्कुरा रहा था।
चौक की गलियों में खजूर और रूहअफ़ज़ा की खुशबू,
और हर दरवाज़े पर जैसे इंतज़ार बैठा था।
कोई रोज़ा खोलने की तैयारी में था,
कोई दोस्त को बुलाने में।
और उस शहर का नाम था — लखनऊ।
शायर ने ठीक ही कहा है —
“हमारा पैग़ाम है मोहब्बत, जहाँ तक पहुँचे
यह चिराग़ वही है जो दिलों से दिलों तक पहुँचे।”वह शाम
रमज़ान की एक नरम शाम थी।
मैं चौक की गलियों से गुज़र रहा था।इफ्तार का समय होने वाला था और हर गली में एक अजीब सी रौनक थी।
एक घर के खुले दरवाज़े से हँसी की आवाज़ आ रही थी।
वह घर था शिवालिका आचार्य का।अंदर टेबल पर खजूर, फल, शरबत और दही-बड़े सजे थे।
शिवालिका के साथ उनके परिवार और कुछ दोस्त बैठे थे —
हेमंत मिश्रा,
अतुल केशव रावत,
और सागर कपूर।अगर कोई बाहर से देखता तो शायद समझ ही नहीं पाता कि यहाँ कौन किस मज़हब का है।
क्योंकि उस कमरे में बस एक ही मज़हब था — दोस्ती।
बचपन की कहानी
हेमंत मिश्रा धीरे-धीरे खजूर काटते हुए बोले —
“तुम्हें पता है, मैंने रोज़ा क्यों रखना शुरू किया?”
सबने उत्सुकता से देखा।
उन्होंने कहा —
“मेरी एक दोस्त थी — नश्रा।
वह हर रमज़ान रोज़ा रखती थी और एक बार उसने मेरी परीक्षा के लिए दुआ की थी।”
वह नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट का ज़िक्र कर रहे थे।
“उस दिन मुझे लगा कि रोज़ा सिर्फ भूख का नाम नहीं है,
यह किसी के लिए दिल से दुआ करने का नाम है।”
कमरे में एक पल की ख़ामोशी छा गई।
एक पुराना लखनऊ
अतुल केशव रावत मुस्कुराए।
उन्होंने कहा —
“हमारे स्कूल में आधे बच्चे रोज़ा रखते थे।
और हम बाकी आधे शाम को उनके घर इफ्तार खाने पहुँच जाते थे।”
फिर हँसते हुए बोले —
“शायद इसी वजह से मैं भी 20 साल से रमज़ान के पहले और आख़िरी दिन रोज़ा रखता हूँ।”
मैंने सोचा —
यही तो लखनऊ है।
जहाँ दोस्ती मज़हब से बड़ी होती है।
कुरान और जिज्ञासा
सागर कपूर ने धीरे से कहा —
“मैंने कुरान का अंग्रेज़ी अनुवाद पढ़ना शुरू किया था।
तभी मुझे समझ आया कि रोज़ा सिर्फ शरीर को नहीं, आत्मा को भी साफ करता है।”
शिवालिका ने सिर हिलाया।
उन्होंने कहा —
“मेरे लिए रोज़ा किसी धर्म की बात नहीं है।
यह मेरे दोस्तों के साथ खड़े होने की बात है।”
इफ्तार का क्षण
तभी अज़ान की आवाज़ आई।
सबने खजूर उठाई।
उस पल जैसे समय रुक गया।
लखनऊ की उस छोटी सी बैठक में
हिंदू, मुस्लिम, सब एक साथ रोज़ा खोल रहे थे।
और किसी शायर की आवाज़ हवा में गूँज रही थी —
“मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्ताँ हमारा।”
एक पुराना किस्सा
हमने सुना था-
1970 के दशक में चौक की गलियों में रमज़ान ऐसा होता था कि
हिंदू दुकानदार रोज़ा खोलने के लिए खजूर बाँटते थे।
और ईद के दिन वही दोस्त सेवइयाँ लेकर उनके घर जाते थे।
एक शेर अर्ज़ है-
“दिलों में अगर मोहब्बत का उजाला हो जाए
तो हर शहर लखनऊ जैसा हो जाए।”
छत पर वह रात
इफ्तार के बाद सब छत पर चले गए।
दूर से बड़ा इमामबाड़ा चमक रहा था।
नश्रा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा —
“हमारा पैग़ाम है मोहब्बत, जहाँ तक पहुँचे।”
हवा जैसे उस शेर को शहर की गलियों में फैला रही थी।
रात धीरे-धीरे उतर आई थी।
लखनऊ की गलियाँ शांत थीं
लेकिन दिलों में रोशनी थी।
क्योंकि उस शहर में आज भी लोग जानते हैं —
मज़हब रास्ते अलग कर सकता है,
लेकिन मोहब्बत मंज़िल एक कर देती है।
मक़्ता
**“निखिल” लखनऊ की रूह यही कहती है आज भी
यहाँ लोग पहले दिल मिलाते हैं,
फिर नाम पूछते हैं।
और जब भी कोई पूछे कि
इस शहर का असली मज़हब क्या है —
तो बस इतना कहना —
“हमारा पैग़ाम है मोहब्बत, जहाँ तक पहुँचे।”
(ये कहानी सच्ची है और टाइम्स ऑफ़ इंडिया से साभार ली गयी है.
इसे इस रूप में हमने ढाला है )
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