कुछ यादें ऐसी होती हैं, जिन्हें याद करते ही दिल की धड़कन धीमी हो जाती है… जैसे किसी पुराने रेडियो पर अचानक वही पसंदीदा धुन बज उठी हो। मेरा बचपन भी ऐसी ही एक धुन है — जिसमें अज़ान की पुकार और मंदिर की घंटियों की आवाज़ साथ-साथ गूँजती थी।
वो दिन जब रमज़ान और रामनवमी एक ही आसमान के नीचे, एक ही गली में साथ-साथ सांस लेते थे। जब हमारे Maitri Tower का बाजार रात भर जगमगाता रहता था, जैसे नींद को भी त्योहार मना रहा हो।
वो समय सिर्फ़ कैलेंडर की तारीख़ नहीं था… वो एक एहसास था।
जहाँ रोज़ेदार का सम्मान भी था, और व्रतधारी की आस्था भी।
जहाँ भूख से पहले रिश्ते थे, और धर्म से पहले दिल।
आज उन्हीं रोशन गलियों में आपको लेकर चल रहा हूँ — आइए, मेरे साथ उस बचपन में लौट चलें… जहाँ प्यार ही सबसे बड़ा त्योहार था।

रोज़ा इफ्तारी
निखिल हूँ मैं… और आज आपको ले चलना चाहता हूँ अपने जीवन की उन गलियों में, जहाँ न बड़े-बड़े मॉल थे, न मोबाइल की घंटियाँ। वहाँ था Maitri Tower का बाजार, जो रमज़ान और रामनवमी के दिनों में चौबीसों घंटे धड़कता रहता था — जैसे कोई दिल, जिसमें मोहब्बत की रगें दौड़ती हों।
वो साल ऐसे थे जब कैलेंडर की तारीखें नहीं, त्योहारों की खुशबू याद रहती थी। और कभी-कभी तो ऐसा भी होता कि रमज़ान और रामनवमी एक साथ पड़ जाते। मानो चाँद और सूर्य ने मिलकर तय किया हो — इस बार धरती पर प्यार की बारिश करनी है।
🕌🌺 एक साथ खिलते दो व्रत
हमें बचपन में पढ़ी मुंशी प्रेमचंद की “ईदगाह” कहानी का हामिद याद आता है. जो ईद मेले से अपने लिए कुछ ने लेकर अपनी बूढी दादी के लिए एक चिमटा लाता है, क्यूंकि उसके हाथ रोटी सेंकते जल जाते थे.इतनी भावनात्मक कहानी थी वो. बचपन की कहानियों और बातों का अपना असर ताउम्र रहता है. इस लिए हम भी ईद और रमज़ान को आज भी उसी चश्में से देखने आदी हैं. साथ ही बचपन से अपनी माँ को रामनवमी के नौ दिन के व्रत को रखते देखा। अकेले व्रत होने के कारण वो अपने लिए कुछ भी नहीं बनाती थी , केवल रात को कूटू के आटे की पूरी बनाती थी और उसमे भी हम लोग शेयर करते थे. उन्हें इस तरह अपनी केयर नहीं करते देख कर आगे से बिन्नू भी उनके साथ नौ दिन व्रत रहने लगे ताकि इसी बहाने वो कुछ बनायें और खा सकें। लेकिन एक बात है , रामनवमी के व्रत में बिन्नू के व्रत रहते ही खूब पकवान बनते और हम लोग भी शेयर करते , बहुत मज़ा आता.
कई बार पहले भी , अबकी बार की तरह रमज़ान और रामनवमी साथ पड़ती। तो फिर दो-दो त्योहारों का आनंद मिलता था।
हम थे — सात भाई और एक बहन। घर में शोर-शराबा, हँसी-ठिठोली, और हर कमरे में कोई न कोई कहानी चलती रहती। ख़ास तौर से त्यौहार के दिनों में सुबह से ही एक अलग-सी रौनक होती।
सुबह -सुबह पीछे नानपारा मस्जिद से अज़ान की आवाज़ें आतीं थी, उससे सुबह होती थी, फिर थोड़ी देर के बाद पास के मंदिर से हनुमान चालीसा और भजन की आवाज़ आने लगती। मन प्रफ़ुलित हो जाता।
एक ही गली में अज़ान और आरती की ध्वनि साथ-साथ उठती — जैसे दो नदियाँ एक ही सागर में मिल रही हों।
बाज़ार जो कभी सोता नहीं था
Maitri Tower का बाजार तो उन दिनों जैसे जादुई हो जाता था। खासकर ईद से पहले के दिनों में — रात के दो बजे भी दुकानें खुली रहतीं। चूड़ियों की छनक, इत्र की खुशबू, सेवइयों की थैलियाँ, रंग-बिरंगी लाइटें…
कुछ दुकानदार मुस्लिम थे, कुछ हिंदू। लेकिन इन दिनों सबके चेहरे पर एक ही रंग होता — खुशी का।
इफ्तार के वक़्त कई दुकानें बंद नहीं होती थीं, बल्कि सामने दरी बिछ जाती। खजूर, फल, शरबत, समोसे… और कोई भी वहाँ बैठ सकता था। हिंदू दुकानदार भी पूरे उत्साह से इफ्तार में शामिल होते। और जब रामनवमी की झाँकी निकलती, तो मुस्लिम दुकानदार रास्ते में पानी और शरबत बाँटते।
किसी ने कभी यह नहीं पूछा — “तुम कौन हो?”
सब पूछते थे — “तुमने खाया या नहीं?”
मुजीब आंटी की इफ्तारी की टोकरी
हम बच्चों के लिए तो सबसे बड़ा इंतज़ार होता था — मुजीब आंटी की भेजी हुई इफ्तारी की टोकरी।
शाम को रोज़ा ख़त्म होने के बाद से ही हमारी निगाहें दरवाज़े पर टिक जातीं। जैसे ही कोई दस्तक होती, हम सब दौड़ पड़ते — “आ गई क्या?”
टोकरी में क्या-क्या होता! खजूर, दही बड़े, फ्रूट चाट, शरबत, और कभी-कभी उनकी खास रेसिपी के पकौड़े। हम में छीना -झपटी शुरू होती , फिर बिन्नू का intervention होता और मिल-बाँट कर हम आनंद पाते।
और एक मीठी-सी तृप्ति दिल में उतर जाती।
आज भी सोचता हूँ — वो खजूर इतनी मीठी क्यों लगती थी? शायद उसमें शक्कर कम, अपनापन ज्यादा था।
रहमान चाचा का “गुप्त रोज़ा”
और अब बात उस किरदार की, जिनके बिना यह कहानी अधूरी है — रहमान चाचा।
रहमान चाचा हमारे बाबा जी की सर्राफ की दूकान पर बैठते थे और सबके बड़े फेवरिट थे , मेरा बचपन उनकी गोद में बीता।
रहमान चाचा वैसे ही थे जैसे पहले की फिल्मों में एक एक्टर हुआ करते थे -भगवान दादा – वैसे ही मोटे और मज़ेदार। इसीलिए सबके फेवरिट भी थे।
चाचा थोड़े मोटे थे, और हमेशा भूख लगी रहती थी। रोज़ा रखने की उनकी नीयत हर साल पक्की होती, पर भूख उनसे ज्यादा पक्की निकलती।
दिन में कई बार उन्हें रसोई के आसपास मंडराते देखा जाता। कभी पानी पीते हुए पकड़े जाते, कभी चुपके से बिस्कुट खाते। पर मज़ाल है कि चेहरे पर शिकन आए!
इफ्तार से ठीक पहले, वो सबसे पहले दातून करते। बड़े ठाठ से पूरे बाजार में घूम-घूमकर दातून घिसते, जैसे पूरे दिन का रोज़ा निभाया हो। और फिर अज़ान होते ही — सबसे पहले प्लेट उठा लेते। सभी उन्हें प्यार करते थे इस लिए सभी उन्हें दवात पर बुलाते। लोग जानते थे , लेकिन वो सबके फेवरिट थे और उनका आकार-प्रकार देख कर लोग अपनी हंसी किसी तरह रोकते थे.
एक बार तो मैंने हिम्मत करके पूछ लिया —
“चाचा, आपने आज सच में रोज़ा रखा?”
उन्होंने आँख मारते हुए कहा —
“बेटा, रोज़ा दिल का होता है… पेट का नहीं!”
उनकी मासूमियत में एक अजीब-सी सच्चाई थी। सब जानते थे, वो भी जानते थे कि सब जानते हैं — पर किसी ने कभी उनका मज़ाक उड़ाकर दिल नहीं दुखाया। वो हमारे घर की हँसी थे।

(भगवान् दादा -रहमान चाचा इनके जुड़वाँ भाई लगते थे)
रामनवमी का आदर

उधर रामनवमी का व्रत रखने वाले नौ दिनों तक केवल फलाहार करते। सभी एक
दूसरे का आदर करते और दुसरे के रीतिरिवाज़ों का सम्मान करते।
इसी तरह, रोज़ेदार भी ध्यान रखते कि उनके सामने कोई मांसाहार न करे, खासकर उन दिनों में जब पड़ोस में रामनवमी का व्रत चल रहा हो।
यह कोई लिखित नियम नहीं था। यह दिल का कानून था।
किसी ने हमें सहिष्णुता का पाठ नहीं पढ़ाया — हमने उसे जीया।
एक गली, दो आस्थाएँ, एक दिल
रात को जब बाजार की लाइटें जगमगातीं, तो लगता जैसे आसमान के सितारे ज़मीन पर उतर आए हों।
इफ्तार के बाद की चहल-पहल, और रामनवमी की झाँकी की सजावट — दोनों साथ-साथ।
बच्चे कभी टोपी पहनकर इफ्तार में बैठ जाते, तो कभी माथे पर तिलक लगाकर झाँकी देखने निकल पड़ते। किसी ने किसी को रोका नहीं।
हमने बचपन में धर्म नहीं सीखा, हमने दोस्ती सीखी।
वो दिन क्यों याद आते हैं?
आज जब दुनिया छोटी होकर मोबाइल की स्क्रीन में सिमट गई है, तब वो बड़े-बड़े दिल याद आते हैं।
आज त्योहार सोशल मीडिया पोस्ट बन गए हैं। तब त्योहार पड़ोस के दरवाज़े पर दस्तक थे।
आज लोग पूछते हैं — “तुम किस तरफ़ हो?”
तब लोग पूछते थे — “तुम्हें और चाहिए?”
वो वक्त सादा था, पर सच्चा था।
न कोई बहस, न कोई दीवार। सिर्फ़ सम्मान।
सात भाई, एक बहन और अनगिनत यादें-
उसी छत से रामनवमी की झाँकी भी दिखती। ढोल-नगाड़ों की आवाज़, फूलों की बारिश, और “जय श्री राम” के जयकारे।
और दूसरी तरफ शाम को इफ्तार के बाद बाजार की रौनक देखते बनती। दिन-भर के रोज़े के बाद लोग शामको हंसी -मज़ाक करते , चाय पीते और बाजार में घुमते,
चारों ओर खूब चहल पहल रहती।
हमारी दुनिया में दोनों आवाज़ें संगीत थीं।
❤️ मोहब्बत का असली अर्थ
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है — वो सिर्फ़ त्योहार नहीं थे, वो इंसानियत की पाठशाला थे।
हमने सीखा —
- रोज़ा रखने वाले का सम्मान करना
- व्रत रखने वाले का ध्यान रखना
- किसी की आस्था का मज़ाक न उड़ाना
- और सबसे बढ़कर — मिलकर हँसना
रहमान चाचा की शरारतें, मुजीब आंटी की टोकरी, बाजार की रौनक, और पड़ोस की साझी खुशियाँ — ये सब मिलकर मेरे बचपन की तस्वीर बनाते हैं।
त्योहार वो होते हैं, जब पड़ोसी का दरवाज़ा अपना लगता है।
जब किसी की दुआ में अपना नाम शामिल हो।
जब भूख से ज्यादा इंतज़ार होता है — साथ बैठकर खाने का।
अंत में…
रमज़ान और रामनवमी जब साथ-साथ आते थे, तो हमें लगता था — ऊपर वाला और भगवान एक साथ मुस्करा रहे हैं।
हम छोटे थे, पर हमारे दिल बड़े थे।
और शायद वही असली दौलत थी।
आज भी अगर आँखें बंद करूँ, तो सुनाई देता है —
अज़ान की पुकार…
आरती की घंटी…
और रहमान चाचा की दातून की खट-खट।
वो दिन चले गए, पर उनकी खुशबू अब भी मेरे भीतर बसती है।
क्योंकि हमने देखा है —
धर्म अलग हो सकते हैं,
पर दिल अगर साफ़ हो, तो हर रोज़ ईद है… और हर दिन रामनवमी।
अगर आप भी ऐसे किसी बचपन के गवाह रहे हैं, तो ज़रा आँखें बंद कीजिए… शायद आपकी गली में भी अभी-अभी अज़ान और आरती साथ-साथ गूँजी हो।
आज वक्त बदल गया है। बाजारों की रोशनी अब भी चमकती है, पर वो मासूमियत कहीं धुंधली-सी लगती है। अब त्योहार सोशल मीडिया की पोस्ट बन गए हैं, पर तब त्योहार दिलों की मुलाकात हुआ करते थे।
मैं जब भी उन दिनों को याद करता हूँ, तो रहमान चाचा की दातून की खट-खट, मुजीब आंटी की टोकरी की खुशबू, और रामनवमी की झाँकी के ढोल — सब एक साथ कानों में बज उठते हैं।
तब हमने धर्म नहीं सीखा था, हमने इंसानियत सीखी थी।
तब हमने नियम नहीं पढ़े थे, हमने सम्मान जीया था।
काश, हम सब अपने बच्चों को वही सिखा पाएं — कि रोज़ा हो या व्रत, अज़ान हो या आरती… अगर दिल साफ़ है तो हर दिन त्योहार है।
और सच कहूँ, तो मेरा बचपन आज भी वहीं खड़ा है —
उस गली के मोड़ पर,
जहाँ चाँद भी मुस्कराता था…
और भगवान भी।
और कभी-कभी तो ऐसा भी होता था… कि होली और रमज़ान साथ-साथ आ जाते थे। 🌸🌙
बस फिर क्या था — हमारी गली सचमुच इंद्रधनुष बन जाती थी।
सुबह से ही हवा में गुलाल की खुशबू तैरती रहती, और शाम होते-होते उसी हवा में इफ्तार के समोसों और शरबत की मिठास घुल जाती। रंग और रोज़ा — दोनों एक साथ।
इफ्तार में रंगों की मिठास
होली के दिन इफ्तार की दावत कुछ और ही खास हो जाती थी।
मुजीब आंटी की टोकरी में उस दिन गुझिया भी शामिल होती।
और हमारे घर की तरफ़ से फलाहार और मिठाई भेजी जाती।
सोचिए ज़रा…
एक ही थाली में खजूर और गुझिया,
रूहअफ़ज़ा और ठंडाई,
समोसा और दही-बड़ा।
यह सिर्फ़ खाने का मेल नहीं था — यह दिलों का मेल था।
रोज़े में भी ठंडाई का ख्याल
होली के दिन मोहल्ले में ठंडाई बनती थी।
जो रोज़ा रखे होते, उनके लिए ठंडाई शाम के लिए संभालकर रखी जाती।
कोई भी उनके सामने कुछ खाता नहीं था।
और रोज़ेदार भी होली के रंगों की खुशी में शामिल होते — बस थोड़ी सावधानी के साथ।
यह समझ थी, जो किताबों से नहीं आई थी।
यह तहज़ीब थी, जो दिलों से निकली थी।
🌙🌈 जब चाँद और रंग साथ दिखते थे

रात को जब इफ्तार के बाद छत पर चाँद दिखता, और नीचे गली में रंगों के धब्बे अब भी ज़मीन पर चमक रहे होते — तो लगता था, जैसे आसमान और ज़मीन दोनों ने मिलकर कोई त्योहार मनाया हो।
वो समय सिखाता था —
रंग हाथों से लगते हैं,
और रोज़ा दिल से रखा जाता है।
अगर दिल साफ़ हो, तो दोनों साथ चल सकते हैं।
आज सोचता हूँ, तो लगता है —
हमने सिर्फ़ होली और रमज़ान नहीं मनाए थे,
हमने एक-दूसरे को मनाया था।

रंगों ने हमें और करीब किया,
और रोज़े ने हमें और संवेदनशील।
काश, फिर कभी ऐसा समय आए…
जब गली में बच्चे रंग खेलें,
और शाम को उसी गली में इफ्तार की दरी बिछे।जहाँ गुलाल उड़ता हो,
और दुआ भी। 🌸🌙
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