कभी-कभी मेरी इच्छा होती है कि मैं उन मासूमियत और अनगिनत संभावनाओं वाले दिनों में वापस जा सकूं, कुछ भी बदलने के लिए नहीं, बल्कि कुछ चीज़ों को दो बार महसूस करने के लिए।
इसी तरह कभी-कभी जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो बीत तो जाते हैं, पर जाते-जाते हमारे भीतर एक कोमल-सी महक छोड़ जाते हैं। 80 और 90 के दशक की वो शामें… जब घर में अगरबत्ती की खुशबू घुलती थी, और दूरदर्शन का लोगो स्क्रीन पर उभरते ही जैसे पूरा घर एक साथ ठहर जाता था।
आज के बच्चे शायद समझ भी न पाएँ कि एक चैनल के सामने पूरा देश कैसे एक परिवार बन जाता था। पर हमने वो दिन जिए हैं — जब हर रविवार किसी त्योहार से कम नहीं होता था।
रामायण – जब टीवी के सामने श्रद्धा से हाथ जुड़ जाते थे
हम एक संयुक्त परिवार में , एक छोटे से शहर में रहते थे. उस वक़्त देश में नया -नया टीवी आया था। इसलिए बहुत ही क्रेज था. टीवी पर कुछ देखना ही काफी रोमांचक था। चाहे वो उस समय प्रसारित होने वाला कृषि दर्शन ही क्यों न हो. संयोग से उस समय रामानंद सागर जी का रामायण धारावाहिक आना शुरू हुआ था। पर्दे पर किताबों में पढ़ी कहानियों को इस तरह सामने देखना एक अनुभव था। इतवार के दिन , जिस दिन ये सीरियल आता था , सुबह- सवेरे से हम लोग जल्दी जल्दी तैयार होते थे। हमारे बाबा -दादी भी थे। हमारे घर का ड्राइंग रूम बहुत बड़ा था. सभी लोग , विशेष रूप से हम बच्चे , पहले से ही आकर अपनी ले लेते थे.
Ramayan केवल एक धारावाहिक नहीं था, वह एक अनुभव था। रविवार की सुबह जैसे ही शीर्षक गीत बजता — “श्री राम जय राम जय जय राम…” — घर में एक अलग ही पवित्रता उतर आती थी।
मम्मी और आंटी सुबह पहले से नहा-धोकर पूजा कर लेतीं, बाबा जी सफ़ेद कुरता पहनकर बैठ जाते, और हम बच्चे भी बिना शरारत के चुपचाप सामने बैठ जाते। मोहल्ले में जिनके घर टीवी नहीं होता, वे भी हमारे घर आकर बैठ जाते। कोई कुर्सी पर, कोई फर्श पर, कोई दरवाज़े की चौखट पर — पर सबकी आँखें एक ही स्क्रीन पर टिकी होतीं। इस तरह घर के सभी सदस्य वहां अपनी -अपनी जगह ले लेते थे.
Arun Govil जब राम के रूप में दिखाई देते, तो सचमुच लोग उन्हें भगवान का अवतार मानने लगते। मंदिरों में उनकी तस्वीरें लगने लगीं। और जब सीता-हरण का दृश्य आया, तो कितनों की आँखें नम हो गईं।
रामायण हमें सिर्फ़ कहानी नहीं सुनाती थी, वह हमें संयम, त्याग और धर्म का पाठ पढ़ाती थी। वो समय ऐसा था जब टीवी के सामने बैठना भी एक साधना जैसा लगता था।

महाभारत – जब हर रविवार युद्धभूमि बन जाता था
Mahabharat का शुरुआती शंखनाद आज भी कानों में गूंजता है — “मैं समय हूँ…”
जैसे ही भीष्म पितामह, अर्जुन या दुर्योधन स्क्रीन पर आते, हम सब सांस रोके देखते रहते। Nitish Bharadwaj का कृष्ण रूप आज भी लोगों के दिलों में बसा है।
महाभारत हमें रिश्तों की जटिलता समझाता था। यह केवल युद्ध की कहानी नहीं थी, यह मनुष्य के भीतर के युद्ध की कथा थी।
कौरव-पांडव का संघर्ष हमें यह सिखाता था कि सही और गलत के बीच की रेखा कितनी महीन होती है।
उस समय सोशल मीडिया नहीं था, पर सोमवार को स्कूल में वही चर्चा होती —
“कल देखा? अर्जुन ने क्या कहा?”
“दुर्योधन कितना घमंडी है!”
पूरा देश जैसे एक ही कहानी जी रहा था।

मालगुड़ी डेज़ – जब बचपन सादगी में मुस्कुराता था
और फिर आता था वो मीठा-सा, सरल-सा संसार — Malgudi Days।
आर.के. नारायण की कहानियों पर आधारित यह धारावाहिक जैसे किसी शांत नदी की तरह था।
स्वामी और उसके दोस्तों की शरारतें, स्कूल की घंटी, मास्टरजी की डांट — सब कुछ इतना अपना लगता था। उसमें कोई चकाचौंध नहीं थी, कोई विशेष प्रभाव नहीं थे, बस सादगी थी… और वही सादगी हमें बांध लेती थी।
उस समय का बचपन भी तो वैसा ही था —
गिल्ली-डंडा, कंचे, लट्टू, और शाम को घर लौटते समय माँ की आवाज़ —
“जल्दी आओ, टीवी शुरू होने वाला है!”
मालगुड़ी डेज़ हमें यह याद दिलाता था कि जीवन की असली खूबसूरती छोटी-छोटी बातों में छुपी होती है.

वो शामें, वो खुशबू…
शाम को जैसे ही सूरज ढलता, घर में एक अलग-सी शांति उतर आती। माँ पूजा के बाद अगरबत्ती जलातीं। उसकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती। बाहर गली में बच्चे खेल रहे होते, पर जैसे ही दूरदर्शन की धुन सुनाई देती — सब भागते हुए घरों की ओर लौटते।
टीवी बड़ा नहीं था — अक्सर एक लकड़ी के बॉक्स में रखा छोटा-सा सेट। कभी-कभी एंटीना सीधा करने के लिए छत पर चढ़ना पड़ता। नीचे से आवाज़ आती —
“हाँ, बस… बस… वहीं रोक दो!”
चित्र थोड़ा साफ़ हुआ नहीं कि सब ताली बजा देते।
उस समय देखने का सुख अलग था, क्योंकि विकल्प सीमित थे। और शायद इसी सीमितता में ही गहराई थी।
आज हजारों चैनल हैं, ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं, पर वो सामूहिक प्रतीक्षा, वो उत्साह, वो एक साथ हँसना-रोना… वह कहीं खो गया है।
जब पूरा मोहल्ला एक परिवार था
रामायण और महाभारत के समय सड़कें सुनसान हो जाती थीं। शादी-ब्याह के कार्यक्रम भी उनके समय के अनुसार तय होते थे। किसी के घर टीवी खराब हो जाए, तो वह पड़ोसी के यहाँ जाकर बैठ जाता — और कोई मना नहीं करता।
आज की तरह निजी स्क्रीन नहीं थीं। मोबाइल नहीं था। सब कुछ साझा था — हँसी भी, आँसू भी।
बिजली चली जाए तो सबका दिल धक से रह जाता। और जब वापस आती, तो जैसे दिवाली मन जाती।
क्या खोया, क्या पाया?
हमने तकनीक पाई, गति पाई, सुविधा पाई।
पर कहीं न कहीं वो सामूहिकता, वो सरलता, वो ठहराव खो दिया।
उस समय का हर रविवार एक उत्सव था।
हर शाम एक प्रतीक्षा थी।
हर एपिसोड एक सीख था।
आज बच्चे अपने-अपने कमरों में, अपने-अपने स्क्रीन पर व्यस्त हैं।
पर तब एक ही स्क्रीन पर पूरा परिवार सिमट आता था।
यादों की धूप में…
कभी-कभी मन करता है कि समय की सुइयों को पीछे घुमा दें।
फिर से वही दूरदर्शन का लोगो देखें।
फिर से वही शंखनाद सुनें।
फिर से वही अगरबत्ती की खुशबू महसूस करें।
शायद हम समय को वापस न ला सकें, पर उन यादों को दिल में सहेज सकते हैं।
अपने बच्चों को बता सकते हैं कि हमने एक ऐसा दौर जिया है, जहाँ कहानियाँ केवल देखी नहीं जाती थीं — उन्हें जिया जाता था।
जब शामें अगरबत्ती और दूरदर्शन की खुशबू से महकती थीं…
जब रामायण हमें आदर्श सिखाती थी,
महाभारत हमें सच और धर्म का बोध कराती थी,
और मालगुड़ी डेज़ हमें सादगी में मुस्कुराना सिखाती थी।
वो समय शायद बीत गया है,
पर उसकी सुगंध आज भी हमारे भीतर कहीं जीवित है —
एक कोमल-सी, पवित्र-सी, अनमोल-सी स्मृति बनकर।
अगर आप भी उन दिनों के साथी रहे हैं, तो ज़रा आँखें बंद कीजिए…
क्या आपको भी दूरदर्शन की वह धुन सुनाई दे रही है?
शायद दिल के किसी कोने में आज भी एक छोटा-सा कमरा है,
जहाँ अगरबत्ती जल रही है…
और टीवी पर फिर से रामायण शुरू होने वाली है.
अतीत कभी नहीं जाता – यह हमारे अंदर रहता है.
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