आज कल हमारे लखनऊ में सफ़ेद बारादरी में सनतकदा फेस्टिवल चल रहा है , तो हमने भी सोचा कि चलो चला जाये और कुछ कहानियों को बनते देखा जाये। ये सोच कर हम भी चल पड़े। तमाम भीड़ और गाड़ियों की लाइन पार करते हम सफ़ेद बारादरी के दरवाजे पर सनतकदा फेस्टिवल में नमूदार हुए।

जब दुनिया तेज़ी से आगे भाग रही हो, तब कुछ जगहें होती हैं जो हमें ठहरना सिखाती हैं।
Sanatkada वही ठहराव है—जहाँ हाथों से बनी कला बोलती है, मिट्टी, कपड़ा और रंग अपनी कहानी कहते हैं, और संस्कृति सिर्फ़ दिखाई नहीं देती, महसूस होती है।
यह मेला नहीं, रिवायत की ज़ुबान बोलता है,
Sanatkada हर कारीगर का अरमान बोलता है।
आज के दौर में, जहाँ सब कुछ “फास्ट” हो गया है—फास्ट फ़ैशन, फास्ट फ़ूड और फास्ट ज़िंदगी—वहाँ Sanatkada Festival एक ठहराव की तरह आता है।
एक ऐसा ठहराव, जहाँ समय रुककर कारीगर के हाथों को देखता है, उसकी मेहनत को महसूस करता है और उसकी कहानी को सुनता है।
लखनऊ की तहज़ीब में रचा-बसा यह उत्सव केवल एक मेला नहीं है, बल्कि संस्कृति, स्मृति और सृजन का जीवंत संगम है। इस बार Sanatkada ने अवधी और बंगाली संस्कृति को एक साथ पिरोकर यह साबित कर दिया कि भारत की विविधता कितनी सुंदर और गहरी है।
जब जगह भी कहानी सुनाने लगे
Safed Baradari, Raja Ram Mohan Singh Park और Amiruddaula Public Library जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर सजा Sanatkada, खुद इतिहास से संवाद करता दिखाई देता है।
बाँस, लकड़ी के दीये, काग़ज़ी पतंगें, आईने और रोशनियों से सजे ये परिसर किसी पुराने ज़माने की गलियों में ले जाते हैं।
प्रवेश द्वार पर बना बंगाली संस्कृति से प्रेरित पंडाल यह संकेत दे देता है कि—
यहाँ सिर्फ़ ख़रीदारी नहीं, अनुभव मिलने वाला है।
तो जनाब हमने तीन टिकट खरीदे और अंदर हाल में प्रवेश कर गए.बाहर कई एक हस्तशिल्प वाले स्टाल लगे थे जहाँ तरह तरह के खिलौने और तमाम चीज़ें लगी थीं. ये लोग लखनऊ और कई अन्य जगहों से अपने हुनर का मुजारह ( प्रदर्शन) करने आये थे. सफ़ेद बारादरी में , चारों ओर , पूरे हाल में कई तरह के स्टाल लगे थे –जैसे कपड़ों के और कढे काम के कपड़े , महिलाओं और पुरुषों के लिए बड़े नफीस और सुन्दर , सिले और बिना सिले , महंगे कपडे थे।
इस तरह हमने वहां पूरा नज़ारा देखा जो वाकई में बड़ा दिलनशीं था। वहां आने वाले ज्यादातर लोग अभिजात्य वर्ग के , और पुराने नवाबों के खानदान के दिख रहे थे. वहां ख़ास अभिजात्य मुस्लिम घरानों का कल्चर जिन्दा था। उसे में कई लोग आज के आधुनिक लखनऊ के फैशन का एक टच दे रहे थे. बड़ा दिलकश था ये सब देखना। कितने रंगों से सराबोर है –हमारा लखनऊ।

(कपडे का स्टाल लगते दुकानदार)
Sanatkada की असली जान हैं इसके कारीगर।
देश और दक्षिण एशिया के 100 से अधिक शिल्पकार यहाँ अपनी कला के साथ उपस्थित होते हैं।
यहाँ आपको मिलती हैं:
- अवधी कारीगरी – ज़रदोज़ी, चट्टापटी, लहरिया, पारंपरिक साड़ियाँ
- बंगाली शिल्प – जामदानी, कांथा, कदम हाँथ, पटचित्र
- अन्य भारतीय कलाएँ – इक्कत, अजरख, कलमकारी, मधुबनी, शिबोरी, बंधनी
- आभूषण – मोती, कीमती पत्थर, ट्राइबल, ऑक्सीडाइज़्ड सिल्वर, अफ़ग़ानी और जयपुरी पटवा ज्वेलरी
हर स्टॉल पर रखी वस्तु सिर्फ़ सामान नहीं होती,
वह पीढ़ियों की मेहनत और विरासत का प्रमाण होती है।
जब कला बनते हुए दिखाई दे
Sanatkada की सबसे ख़ास बात है—लाइव डेमॉन्स्ट्रेशन।
यहाँ कला बनती हुई दिखाई देती है।
आप देख सकते हैं:
- चिकनकारी और ब्लॉक प्रिंटिंग
- क्रोशिया और लाख की चूड़ियाँ
- लहरिया दुपट्टा बनते हुए
- पतंग और पारंपरिक हेयर ब्रेडिंग
यह सीधा संवाद कारीगर और दर्शक के बीच एक रिश्ता बना देता है—
जहाँ कीमत से ज़्यादा सम्मान मायने रखता है।
लखनऊ की मिट्टी में तहज़ीब का असर है,
यहाँ हर कला में अदब, हर रंग में हुनर है।
आज के समय में Sanatkada क्यों ज़रूरी है?
Sanatkada केवल उत्सव नहीं, एक सांस्कृतिक आंदोलन है।
इसका महत्व इसलिए है क्योंकि:
- यह लुप्त होती कलाओं को नया जीवन देता है
- कारीगरों को सम्मानजनक रोज़गार देता है
- नई पीढ़ी को हाथ से बनी चीज़ों का मूल्य समझाता है
- उपभोक्ता को सोच-समझकर ख़रीदने की आदत सिखाता है
- संस्कृति को किताबों से निकालकर ज़िंदगी में उतारता है
Sanatkada यह याद दिलाता है कि विरासत बोझ नहीं होती—
वह पहचान होती है।
जहाँ लोग नहीं, कहानियाँ मिलती हैं
Sanatkada के निर्देशक तसवीर हसन के शब्दों में, यह मंच कलाकारों, विद्वानों और कथाकारों को एक साथ लाता है—जो यात्राओं, यादों और नवाचारों को अपने काम में समेटे हुए हैं।
यहाँ हर इंस्टॉलेशन, हर शिल्प और हर कोना
किसी न किसी कहानी से जुड़ा होता है।
अंत में…
Sanatkada वह जगह है जहाँ—
- संस्कृति जीवित दिखती है
- कला बोलती है
- इतिहास हाथ पकड़कर चलता है
यह हमें सिखाता है कि आधुनिक होना
परंपरा से कट जाना नहीं है,
बल्कि उसे समझकर आगे बढ़ना है।
अगर आप भारत को महसूस करना चाहते हैं—
तो Sanatkada सिर्फ़ देखना नहीं,
जीना चाहिए।
Sanatkada से लौटते समय हम सिर्फ़ ख़रीदारी नहीं करते—
हम अपने साथ यादें, कहानियाँ और जड़ों से जुड़ाव लेकर लौटते हैं।
यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि परंपरा कोई बीती बात नहीं,
वह आज भी हमारे साथ चलती है।
जो बीत गया, वो याद नहीं—रिवायत है यहाँ,
विरासत लखनऊ में आज भी आबाद है यहाँ।
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