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(हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध के आलोक में) “आम फिर बौराया”—यह पंक्ति केवल ऋतु-परिवर्तन की सूचना नहीं देती, यह हमारे भीतर किसी गहरी स्मृति को जगा देती है। जैसे ही आम की मंजरी में बौर आता है, मन के किसी कोने में दबा बचपन, गांव की पगडंडी, कच्चे आम की खटास और दादी की हंसी—सब…

आम फिर बौराया: स्मृति, संवेदना और जीवन का उत्सव

(हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध के आलोक में)

“आम फिर बौराया”—यह पंक्ति केवल ऋतु-परिवर्तन की सूचना नहीं देती, यह हमारे भीतर किसी गहरी स्मृति को जगा देती है। जैसे ही आम की मंजरी में बौर आता है, मन के किसी कोने में दबा बचपन, गांव की पगडंडी, कच्चे आम की खटास और दादी की हंसी—सब एक साथ खिल उठते हैं। यही तो कमाल है हजारी प्रसाद द्विवेदी का—वे प्रकृति की एक छोटी-सी घटना को जीवन-दर्शन बना देते हैं।

बौराना: केवल पेड़ का नहीं, मन का भी

द्विवेदी जी के लिए “बौराना” सिर्फ आम के पेड़ की क्रिया नहीं है। यह मनुष्य के भीतर उठने वाली हल्की-सी बेचैनी, उमंग और उत्सुकता का भी नाम है। बसंत आते ही जैसे जीवन स्वयं से प्रेम करने लगता है। पेड़ों में बौर आता है, और मन में—आशा। यह आशा किसी बड़े वादे की नहीं, छोटे-छोटे सुखों की होती है।

स्मृति का मधुर आलोक

“आम फिर बौराया” पढ़ते हुए पाठक बार-बार अपने अतीत में लौट जाता है। द्विवेदी जी स्मृतियों को बोझ नहीं बनाते; वे उन्हें रोशनी की तरह सामने रख देते हैं। उनका अतीत रुलाई नहीं, रसानुभूति है। बीता हुआ समय यहाँ दुख का कारण नहीं, जीवन को समझने की कुंजी बन जाता है।

लोक और संस्कृति की सुगंध

इस निबंध में आम भारतीय लोक-जीवन का प्रतीक है। आम का बौर—किसान के लिए उम्मीद, बच्चे के लिए शरारत, और घर के लिए उत्सव का संकेत है। द्विवेदी जी बताते हैं कि हमारी संस्कृति किताबों में नहीं, इन्हीं बौराते पेड़ों और उनकी खुशबू में बसती है। प्रकृति और मनुष्य का यह रिश्ता जितना सहज है, उतना ही गहरा।

भाषा: विद्वत्ता नहीं, आत्मीयता

द्विवेदी जी की भाषा में कोई बनावट नहीं। वह विद्वान की ऊँचाई से नहीं, साथी की तरह बोलती है। शब्द ऐसे आते हैं जैसे गांव की चौपाल पर बैठे किसी बुज़ुर्ग की बात—सरल, अनुभवी और भरोसेमंद। यही कारण है कि “आम फिर बौराया” पढ़ते समय पाठक को लगता है कि यह उसकी अपनी ही कहानी है।

आज के समय में “आम फिर बौराया”

तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हम ऋतुओं को नोटिस करना भूलते जा रहे हैं। द्विवेदी जी का यह निबंध हमें फिर से रुकना सिखाता है—बौर को देखने, खुशबू को महसूस करने और अपने भीतर झांकने का साहस देता है। यह रचना याद दिलाती है कि जीवन की मिठास भविष्य में नहीं, इसी क्षण के बौर में छिपी है।

समापन

“आम फिर बौराया” केवल एक निबंध नहीं, जीवन को धीरे-धीरे जीने की सीख है। यह हमें बताता है कि हर साल बौर आता है—पर सवाल यह है कि क्या हमारा मन भी बौराता है? यदि हाँ, तो समझिए कि बसंत सफल हुआ।

क्योंकि जब आम फिर बौराता है,
तो जीवन फिर मुस्कुराता है।


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