
(The Light of Chhathi Maiya: The Union of Faith, Darkness, and Radiance)
छठ की छटा — भक्ति, प्रकृति और प्रेम का अनोखा संगम
सूरज की सुनहरी किरणें जब गंगा के पानी में सोने-सी चमक बिखेरती हैं, तब लगता है जैसे प्रकृति खुद सज-धजकर ‘छठी मइया’ की आरती उतार रही हो। घाटों पर सजे सूप, डलिया, केले, नारियल, गन्ने और दीयों की कतारें — सब मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं जो सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि एक अनुभूति है — आत्मा और प्रकृति के मिलन की अनुभूति।
छठ पर्व बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई इलाकों का सबसे भव्य और आत्मीय पर्व है। लेकिन आज इसकी रौशनी दिल्ली, मुंबई, सूरत, दुबई और न्यूयॉर्क तक फैल चुकी है। कोई इसे ‘सूर्य उपासना’ कहता है, कोई ‘माँ की ममता’ का पर्व। पर असल में यह जीवन के श्रद्धा, सादगी और संतुलन का सबसे सुंदर प्रतीक है।
सूर्य और प्रकृति का पर्व
छठ में न पूजा का शोर है, न ढोल-नगाड़े की धूम। यहाँ सिर्फ मौन भक्ति है — जहाँ नदी, सूर्य और मिट्टी तक से संवाद होता है। छठ की शुरुआत ‘नहाय-खाय’ से होती है, जहाँ व्रती (मुख्य उपासक) शरीर और मन की पवित्रता के साथ इस अनुष्ठान का आरंभ करता है। उसके बाद आता है ‘खरना’ — उपवास और प्रसाद का दिन, जब गुड़-चावल की खीर, रोटी और केला का प्रसाद बनता है। इस दिन घर में गुड़ की मीठी खुशबू के साथ भावनाओं की मिठास भी घुल जाती है।
अगले दो दिन असली छटा दिखती है — संध्या अर्घ्य और प्रातः अर्घ्य। जब महिलाएँ साड़ी के पल्लू को सिर पर लेकर, जल में खड़ी होकर अस्ताचलगामी और उदयाचलगामी सूर्य को अर्घ्य देती हैं। उनके चेहरों पर न थकान होती है, न शिकायत — बस आँखों में चमक और मन में अटूट विश्वास।
लोकगीतों की मीठी गूंज
अगर छठ की आत्मा है भक्ति, तो उसकी आवाज़ है छठ के लोकगीत।
हर घाट, हर गली, हर घर से मधुर गीतों की गूंज उठती है —
“केलवा जे फरेला घवद से ओ धनवा,
केलवा जे फरेला घवद से…
ओ पिया, अबकी छठी मइया घर आइहे न जल्दी…”
इन गीतों में सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि पीढ़ियों की आस्था बसती है।
एक और प्रसिद्ध गीत में माँ का ममत्व झलकता है —
“उग हो सूरज देव, अरघ के बेर,
हमरे घरवा में दीह सुगवा बइठल नेहर…”
इन गीतों में माँ की लोरी जैसी मिठास है। इनकी धुनें न किसी बड़े संगीतकार ने रचीं, न किसी स्टूडियो में रिकॉर्ड हुईं — ये तो गाँव की मिट्टी की खुशबू से निकले राग हैं, जो हर दिल में बस जाते हैं।
इस सारे प्रकरण में स्वर कोकिला शारदा सिन्हा के बिना छठ की चर्चा अधूरी है, बिना उनके गीतों के ये पर्व पूरा नहीं हो सकता है. वो लोक संस्कृति की आवाज़ हैं. पिछले वर्ष “नहाय -खाये” के दिन ही उन्होंने देह त्याग किया था , लेकिन आज भी वो अपनी मधुर वाणी के द्वारा , अपने गीतों के साथ हमारे बीच मौजूद लगती है. उनका एक गीत है –
” पहिले पहल हम कइनी, छठी मैया बरत तोहार।
करिहु छमा छठी मैया , भूल-चूक गलती हमार। “
ये भावुक गीत परम्पराओं को संजोने वाला गीत है.
प्रकृति के साथ गहरा नाता
छठ पर्व प्रकृति से गहरे जुड़ा है। इसमें जो कुछ भी उपयोग होता है —
गन्ना, केला, नारियल, नींबू, अदरक, डूबता सूरज और नदी — सब प्राकृतिक तत्व हैं। कोई कृत्रिम सजावट नहीं, कोई चमक-दमक नहीं। सब कुछ इतना स्वाभाविक और शुद्ध कि देखकर ही मन झुक जाए।
इस पर्व में प्लास्टिक नहीं, पत्तों के बने सूप और बाँस की डलिया उपयोग होती हैं। यह बताता है कि हमारे लोकपर्वों में पर्यावरण संरक्षण की सीख पहले से ही मौजूद है — वो भी बिना किसी नारे या अभियान के।
भक्ति में सौंदर्य
छठ की सबसे अद्भुत बात यह है कि इसमें सौंदर्य, अनुशासन और सामूहिकता का संगम दिखता है। जब महिलाएँ पानी में खड़ी होती हैं, सूर्य को निहारती हैं और दोनों हथेलियों से अर्घ्य देती हैं, तो वह दृश्य ऐसा लगता है जैसे धरती पर देवत्व उतर आया हो।
रातभर के जागरण में जब गीत गूंजते हैं,
“कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगिया ले जाइबे ससुराल हो…”,
तो लगता है जैसे पूरा गाँव एक स्वर में प्रार्थना बन गया हो।
शहरों में छठ का विस्तार
आज छठ की रौनक चारों ओर फैल रही है.
कभी सिर्फ गाँवों तक सीमित यह पर्व अब शहरों में भी पूरी रौनक से मनाया जाता है। दिल्ली के यमुना घाट, मुंबई का जुहू बीच, सूरत का तापी किनारा — हर जगह दीयों की पंक्तियाँ, प्रसाद की सुगंध और गीतों की गूंज से माहौल भर जाता है। हमारे लखनऊ में तो अबकी बार बाकायदा 28 अक्टूबर को छठ की छुट्टी घोषित की गई. उस दिन हमारे मुख्यमंत्री योगी जी महराज स्वयं गोमती किनारे सूर्य देव को अर्ध्य देने आये थे। हमेश की भांति उस दिन गोमती किनारे घाटों पर खूब रौनक थी. तरह -तरह से सजी-धजी महिलाओं और बच्चों ने तो अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रखा था. खुशियां और भक्ति का अद्भुत संगम था. दिव्य दृश्य था.
इसी तरह दिल्ली में मेट्रो के नीचे जब लोग सूप लेकर घाटों की ओर जाते हैं, तो शहर भी गाँव का रूप ले लेता है। यह बताता है कि संस्कृति सीमाएँ नहीं मानती, बस दिल से अपनाने की जरूरत है।
त्योहार नहीं, तपस्या
इससे ये सिद्ध होता है कि छठ सिर्फ उत्सव नहीं, यह तपस्या है — जल, व्रत, नियम और श्रद्धा का संगम।
चार दिन तक बिना नमक, बिना जल का उपवास रखकर महिलाएँ अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं। कोई ढोंग नहीं, कोई दिखावा नहीं — बस अडिग विश्वास और प्रेम। सब कुछ कितना निश्छल है. कोई बनावट या नकलीपन नहीं.
व्रती महिला के चेहरे पर एक अलग तेज होता है, मानो छठी मइया का आशीर्वाद उसके माथे पर चमक रहा हो।
भोर की वो दिव्यता
छठ का सबसे दिव्य क्षण होता है — प्रातः अर्घ्य।
भोर की हल्की ठंड में जब सूर्य की पहली किरण जल में उतरती है, तब व्रती अपने दोनों हाथ जोड़कर कहती है —
“उग हो सूरज देव, अर्घ्य के बेर…”
और तभी लगता है जैसे पूरा ब्रह्मांड उस प्रार्थना को सुन रहा हो।
सूर्य की किरणें जब जल में प्रतिबिंबित होती हैं, तो वह दृश्य किसी मंदिर के दीपमाल जैसा पवित्र लगता है।
छठ का संदेश — सादगी में शक्ति
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में, जहाँ हम डिजिटल पूजा और ऑनलाइन आरती में खोते जा रहे हैं, छठ हमें याद दिलाता है कि सच्ची पूजा मन से होती है, न कि साधनों से।
यह त्योहार हमें सिखाता है कि प्रकृति से जुड़ना ही भक्ति का सबसे बड़ा रूप है।
अंत में
छठ पर्व हमें यह भी बताता है कि हमारी संस्कृति कितनी समृद्ध और जीवंत है।
यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि सामूहिक एकता, पर्यावरण प्रेम और मातृत्व की आराधना का त्योहार है।
इसलिए जब अगली बार आप किसी घाट पर दीये की लौ को हिलते देखें, तो समझिए — वह सिर्फ हवा से नहीं, बल्कि प्रेम और आस्था की लहरों से डोल रही है।
और जैसे किसी गीत में कहा गया है —
“छठी मइया आवs हो, अंगना में जोत जले,
सूखल सुख के डोर बंधे, अंजोरिया हर घरे बसे।”
यही है छठ की छटा — जो न सिर्फ घर को, बल्कि दिलों को भी उजाला देती है। 🌞
ये है हमारी — भारतीय सनातन परम्परायें और आस्थायें –जो रस और सुगंध से सराबोर रहती हैं.

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