Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

बातें तो बहुत होंगी – लेकिन कुछ बात है कि बिहार अपनी कुछ ख़ास अच्छाइयों की वजह से हमेशा लोगों के जहन में बना रहता है। फिर आज कल तो वहां चुनावों का मौसम भी पूरे शबाब पर है, सभी राजनितिक पार्टियां और नेता गण अपनी -अपनी राजनैतिक कलाबाजियों से जनता को मोहा रहे हैं.…

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जहाँ कुछ नहीं चलता ,वहां सब चल जाता है : बिहार की कहानी

बातें तो बहुत होंगी – लेकिन कुछ बात है कि बिहार अपनी कुछ ख़ास अच्छाइयों की वजह से हमेशा लोगों के जहन में बना रहता है। फिर आज कल तो वहां चुनावों का मौसम भी पूरे शबाब पर है, सभी राजनितिक पार्टियां और नेता गण अपनी -अपनी राजनैतिक कलाबाजियों से जनता को मोहा रहे हैं. ये सब तो नयी सरकार बनने के साथ ही ख़त्म हो जायेगा. लेकिन बिहार फिर से अपनी ही लय में चलने लगेगा. वास्तव में बिहारी लोग बहुत भोले और स्वाभाविक होते हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए यहाँ हम ठेठ बिहारीपन की झलक देखेंगे.-

“जहाँ कुछ नहीं चलता, वहाँ सब चल जाता है – बिहार की कहानी”

अरे भैया, सुनिए तो… अब जो बिहार है ना, उहे जगह है जहाँ घड़ी कभी टाइम पे नहीं चलती, पर लोग टाइम से सब कर लेते हैं। यहाँ लॉजिक नहीं, लॉजिकवा का मौसा चलता है!

अब देखिए, एक बाबू थे — दिल्ली में नौकरी करते थे, बड़का अफ़सर टाइप। छठ पूजा में घर आने को निकले। बोले, “इस बार तो आराम से जाउँगा, टिकट कन्फर्म है।”
हम हँस पड़े — “बाबू, बिहार की ट्रेन में कन्फर्म टिकट का मतलब है, आप बैठने लायक जगह खोज लीजिए।”

ट्रेन चली, और डिब्बा बन गया चलत-फिरत जनसंख्या का मेले जैसा।
किसी ने लिट्टी निकाला, किसी ने भुजिया, और कोई बोला — “भाई साहब, थोड़ा सरक जाईए, गोद में बच्चा बैठ जाएगा।”
बाबू बोले, “पर सीट तो मेरी है!”
सामने वाला मुस्कुराया, “तो क्या हुआ, दिल तो बड़ा है ना!”

कंडक्टर आया, टिकट माँगा।
बड़का बाबू बोले — “मुज़फ्फरपुर जाना है।”
कंडक्टर बोला — “आपके लिए बीस रुपया… पर मुस्कान इतनी प्यारी है, पाँच कम कर दीजिए।”
अब बताइए, ऐसा ईमानदार-शरारती इंसान कहाँ मिलेगा?

स्टेशन पहुँचे, तो मामा ट्रैक्टर लेके खड़ा —
“गाड़ी-वाड़ी छोड़ो, ई ट्रैक्टर में हवा भी गाँव की और गर्व भी!”
रास्ते में पोस्टर देखिए — “बदलता बिहार!”
पर सड़क वही टूटी हुई। पास में चायवाला हँसके बोला —
“बाबू, पोस्टर बदला है, सड़क अभी सोच रही है!”

शाम को बिजली चली गई। अब कोई शिकायत नहीं, कोई तनाव नहीं। सब लोग आँगन में जुट गए — कोई ढोलक बजा रहा, कोई छठ गीत गा रहा।
एक बूढ़ी अम्मा बोलीं — “बिजली जाए या आये, दिल में रौशनी रहनी चाहिए।”
अरे वाह, कितना बड़ा दर्शन है!

बिहार के लोग ना, बड़े अकलमंद होते हैं।
यहाँ आदमी कहेगा — “काम धीरे होता है, पर सलीके से होता है।”
यहाँ राजनीति भी हँसते-खेलते चलती है। नेता बोले, “बिजली देंगे!”
जनता हँसकर बोले, “पहले बल्ब तो दो!”

फिर भी सब चलता है भैया!
यहाँ का किसान खेत जोते, मज़दूर काम करे, और बच्चा स्कूल भी जाए — बीच में सब रुकावटों के बावजूद।
क्योंकि बिहारी का असली टैलेंट यही है — जहाँ रास्ता नहीं, वहाँ भी निकल पड़ते हैं!

और आखिर में बड़का बाबू बोले —

“बिहार कोई राज्य नहीं है, दिल की हालत है।
यहाँ कुछ नहीं चलता, पर सब कुछ चल जाता है।”

चौपाल पर सब हँसे, कोई बोला —
“सही कहा रे! यही तो है हमारा बिहार — थोड़ा टेढ़ा, पर सच्चा!”

बिहार अजब देस है। यहाँ बहुत कुछ आधा-अधूरा है, पर दिल पूरा है। सड़कें कभी-कभी टाँग तोड़ने लायक गड्ढों से भरी होती हैं, दफ़्तरों में फाइलें महादेव की जटाओं की तरह उलझी मिलती हैं, बिजली कभी-कभार मनाने पर ही आती है, ट्रेनें ऐसे देरी करती हैं जैसे कोई प्रेमिका रूठ गई हो—फिर भी ज़िंदगी यहाँ घड़ी की तरह चलती रहती है। यह वह जगह है जहाँ औपचारिकता कम और “साफ़ बोल दे यार” वाला अनौपचारिक सच ज़्यादा है। लोग बड़े पदों वाले से भी “का रे बाबू, बताऊँ?” टाइमिंग में सवाल कर देते हैं, और वह भी हँसकर जवाब दे देता है। यहाँ का डाउन-टू-अर्थ होना संस्कार नहीं, बायलॉजी है।

बिहार की खास बात यह कि यहाँ सबको सबका हाल मालूम रहता है। गाँव में सुबह किसी के आँगन में बाल्टी रखकर हाथ धोवा देने वाला भी जान जाता है कि घर में दामाद कल आए थे और मुँह फुलाकर चले गए। पटना की गलियों में कोई चाय बेचता मिल जाए तो उसका सवाल रहता है — “काम-धाम ठीक है? तनख्वाह समय से मिलता है कि फिर से रिज़ाइन मारब?” नया लड़का हो तो पूछेगा — “UPSC में बैठ रहा है कि सरकस में?” यानी मज़ाक के बहाने सब जुड़ाव बना लेते हैं।

राजनीति की बात चले तो यह धरती तो मानो लोकतंत्र की लंगरगद्दी है। हर चाय की दुकान पर दो बातें तय—चीनी कितनी और चीफ मिनिस्टर कौन। चुनाव सिर्फ़ वोट डालने का मौसम नहीं, यह टूटे दिल वालों के लिए नया प्रेम-यज्ञ है—सब पार्टियाँ फिर से कहती हैं कि “इस बार सच्चा प्यार करेंगे।” पोस्टर बदल जाते हैं, घोषणा बदल जाती है, चेहरे बदल जाते हैं, पर वादे—ये नहीं बदलते। हर बार जनता से वही अनुनय—“बस ई आखिरी बार मान लीजिए”, और जनता भी वह पुरानी महबूबा की तरह थोड़े गुस्से के बाद फिर किसी ना किसी को हरी झंडी दे देती है। यहाँ राजनीति चुटकुला भी है और चरित्र प्रमाणपत्र भी—लोग मज़ाक भी करते हैं, और वोट डालते समय माथा भी पोंछते हैं। कटाक्ष भी और भरोसा भी — दोनों साथ।

पर बिहार को सिर्फ़ उसकी तकलीफों से नहीं पढ़िए, उसकी तासीर से पढ़िए। यही वह जमीन है जहाँ बच्चे मिट्टी में खेलते-खेलते गणित में ओलंपियाड फोड़ देते हैं। जहाँ दही-चूड़ा खा कर लोग IAS बन जाते हैं, और रेल की बर्थ पर बैठकर लोग बहस में संविधान का सेक्शन-सेक्शन सुना देते हैं। यहाँ का ठट्ठा सतही नहीं, दर्शन है। दो लाइन में आदमी आधी दुनिया समझा देता है—“जिंदगी में आराम खोजोगे तो आराम से कुछ नहीं होगा। कुछ करना है तो आराम छोड़ो।” यही गँवई लहजों में छुपी हुई वह अक्ल है जिसे दूसरे राज्यों में motivational quotes में ढूँढते फिरते हैं।

परंपराएँ यहाँ दीवार पर टंगी फोटो नहीं, सांस लेती आदतें हैं। छठ सिर्फ़ पूजा नहीं—अनुशासन का राष्ट्रीय पाठ्यक्रम है। कोई किसी से पूछने नहीं जाता “तुम मानते हो?” — सब मानते हैं। नहाय-खाय, खरना, अर्घ्य — यह सब सिर्फ़ कर्मकांड नहीं, यह वह अनुशासन है जो बताता है कि समाज के लिए खुद को कितने दिन कसा जा सकता है। शादी-ब्याह में यहाँ दहेज के किस्से भी होंगे, लैंगिक ताना-बाजी भी होगी—पर उसी घर का वही दादा अपनी पोती को UPSC कोचिंग के लिए कॉलेज से उठाकर पटना छोड़ आएगा। विरोधाभास ही बिहार की बांसुरी है—दोनों सुर बजते हैं, और कोई टूटता नहीं।

अब की बार फिर चुनाव का मौसम चढ़ने वाला है। वही नारे, वही जुलूस, वही loudspeaker—जैसे हर पाँच साल पर पूरा राज्य rewind पर चला जाता हो। पर यह भी सच है कि बिहार की राजनीति में जनता मूर्ख नहीं—थकी हुई है। लोग हँसते हैं, कटाक्ष करते हैं, पर बूथ पर जाकर उँगली स्याही में डुबोकर फिर एक बार उम्मीद का सिक्का उछाल देते हैं। यहाँ हर वोट के पीछे गुस्सा भी है, और “चलो देख लेते हैं” वाली आशा भी। एक बूढ़ा कह देता है — “बाबू, कुछ नहीं बदलेगा”, फिर भी लाइन में खड़ा रहता है। क्योंकि बिहार हार मानकर बैठा प्रदेश नहीं — उम्मीद को कम्बल में लपेटकर कोना-कोना में रख देने वाला प्रदेश है।

और हाँ — लोग कहते हैं “बिहार में कुछ चलता नहीं।” यह वाक्य बाहर वालों के लिए मज़ाक है, पर अंदर वालों के लिए चुपचाप जवाब — “इतने सालों से सब चल ही तो रहा है।” सिस्टम खड़खड़ाता है, लोग नहीं। सरकारें डगमगाती हैं, समाज नहीं। जो राज्य वक्त-बेवक्त अपने बच्चों को पूरी दुनिया में भेजता है, वह ठप नहीं — चालाक है। जब यहाँ कहावत चलती है—“जहाँ कुछ नहीं होता, वहीं आख़िर सब कुछ हो जाता है”—तो यह शेख़ी नहीं, अनुभव का व्यंग्य है। बिहार को चलाने वाली फ़ाइलें नहीं, लोग हैं। और लोग यहाँ अब भी पूरे हैं।

बिहार उस दोस्त जैसा है जो हमेशा समय पर नहीं आता, पर जब आता है तो तुम्हारा सारा बोझ बाँट लेता है। यह राज्य अपनी कमियों के बावजूद अपनी मिट्टी की गर्मी से इंसानों को बड़ा कर देता है। यहाँ का प्रेम भी सस्ता है और नमक भी असली। यहाँ झगड़े भी ज़ोर के होते हैं, और त्यौहार में गले भी उसी ज़ोर से मिलते हैं। यहाँ गरीबी भी है, संघर्ष भी है, पर आत्मसम्मान उतना ही कि कोई भी बिहारी कहीं भी जाकर काम करता है तो उसका नाम उसके राज्य से पहले पहुँच जाता है।

बिहार में बहुत कुछ संकट में है — पर बिहार खुद संकट में नहीं। यह वह जमीन है जहाँ सूखा भी पड़े तो हँसी सूखती नहीं, और बाढ़ भी आए तो चूल्हा किसी न किसी के घर से हर गली में पहुँच ही जाता है। संबंध यहाँ बिजली की तरह नहीं—कम होते-बढ़ते नहीं; यह कुएँ की तरह हैं — बस मौजूद। और वही मौजूदगी इसकी थाह है।

तो जो लोग पूछते हैं — “बिहार में आखिर चलता क्या है?” — उन्हें बस हल्की मुस्कान देकर इतना कहना काफी है:
“यहाँ कुछ नहीं चलता, बस लोग चलते हैं—और इन्हीं के दम पर सब कुछ खुद-ब-खुद चलता जाता है।”


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