सीन ऐसा था –
BBC पर ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला का बयान चल रहा था – “ट्रम्प कोई दुनिया का सम्राट नहीं है।”
उधर ब्रिटेन का शाही परिवार ठान चुका था – “नहीं भाई, ट्रम्प तो हमारे लिए पूरा मुग़ल-ए-आजम है!”
चार्ल्स और कैमिला ने पूरा बॉलीवुड वाला “स्वागत” किया –
👑 विंडसर कैसल की सैर
🐎 घोड़े वाली बग्घी की सवारी
🍷 और फिर शाही दावत
मतलब लग रहा था जैसे “जो जीता वही सिकंदर” का रीमेक चल रहा हो, जिसमें सिकंदर ट्रम्प हैं और प्रोड्यूसर ब्रिटेन .
जरा सोचिये – कोई नेता लंदन उतरता है और ब्रिटैन अचानक भूल जाता है कि साल 2025 चल रहा है. मानो टाइम मशीन से 1825 में पहुँच गए हों। तुरंत उनके स्वागत में पुराने भारतीय राजाओं जैसी घोड़े वाली बग्घियां , लाल वर्दी वाले गार्ड, महल की दावतें और झिलमिलाते झूमर। और ट्रम्प ? —वो ऐसे मुस्कुराते हैं जैसे लाटरी लग गयी हो।
लेकिन इन चमचमाते महलों और बैंड -बाजे के पीछे एक बड़ा सवाल छुपा है. —क्या सचमुच आधुनिक लोकतंत्र को इतना ताम- झाम चाहिए, या हम सब बस एक पुराने नाटक के एक्स्ट्रा बन कर रह गए हैं ?
क्योंकि असली ताकत न तो बग्घियों में है , न ही शाही भोज में. असली ताक़त है सादगी में , ईमानदारी में और जनता के बीच एक आम इंसान बन कर खड़े होने में. गाँधी ये राज सौ साल पहले ही समझ गए थे , पर दुनियां आज भी शाही परेड की रिहर्सल में लगी है.
अब असलियत ये है कि ब्रिटेन की इकोनॉमी आजकल उस पुराने बल्लेबाज़ जैसी है जो कभी सचिन की तरह चौके-छक्के मारता था, पर अब रन बनाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है।
कभी ये देश पूरे “वर्ल्ड कप” का कप्तान था (यानि साम्राज्य), अब हाल ये है कि टॉप 6 टीमों में भी टिके रहना मुश्किल हो रहा है।
ब्रेग्ज़िट के बाद तो हालत वैसे ही हो गए जैसे टीम इंडिया 90s में होती थी – अच्छे खिलाड़ी तो हैं, पर मैच हाथ से निकल ही जाता है।
लेकिन शाही परिवार अभी भी सोचता है कि “भाई, अगर खेल नहीं जीत पा रहे, तो कम से कम प्रेज़ेंटेशन से तो दर्शकों को खुश रखो।”
और ये प्रेज़ेंटेशन है – गार्ड्स की लाल यूनिफॉर्म, लम्बी टोपी, और बैंड-बाजा।
अब यहाँ होती है गांधी जी की एंट्री —अब सोचो, 1931 में गांधीजी बकिंघम पैलेस पहुंचे थे, वो भी सिर्फ़ धोती और शॉल में।
पूरा सीन वैसा था जैसे कोई आम आदमी सीधा “कभी खुशी कभी ग़म” के सेट पर घुस जाए।
चर्चिल बौखला गए और बोले – “आधा नंगा फकीर!”
लेकिन ट्विस्ट ये है कि आज गांधी का ये “सादगी वाला सीन” ही असली ब्लॉकबस्टर है।
चर्चिल का डायलॉग? ……..फ्लॉप!
मार्कस ऑरेलियस (पुराने जमाने का रोमन सम्राट) भी कह गया था – “भाई, तामझाम ज्यादा दिखाओगे तो लोकतंत्र बिगड़ जाएगा।”
मतलब, “सरकार” अगर जनता की फिल्म है, तो लीडर को हीरो नहीं, बल्कि कॉमन मैन का रोल निभाना चाहिए।
और अंत में –
ट्रम्प को ब्रिटेन ने जो शाही शो दिखाया, वो IPL की ओपनिंग सेरेमनी जैसा था – चमक-दमक बहुत, लेकिन असल मैच तो कहीं और है।
लोकतंत्र की पिच पर असली शतक तभी बनता है, जब नेता जनता में से एक दिखे, राजा की तरह नहीं।
गांधी ने ये बात 100 साल पहले ही समझ ली थी।
बाकी दुनिया?
अभी तक “नेट प्रैक्टिस” कर रही .

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