आज सुबह उठा तो चारों ओर एक शांत और सुंदर वातावरण मगन कर गया। एक पवित्र सा एहसास मन को छूने लगा. किचन से आने वाली भीनीं खुशबू ने मानो मन को मुट्ठी में कर लिया। याद आया की आज से तो नवरात्रि शुरू है. इस अहसास ने हमें सालों पीछे हमारे शुरुआती दिनों में ले जा कर खड़ा कर दिया जब हमारे चारों ओर नवरात्री अपने पूरे भाव और पूरी शिद्दत से मनायी जाती.

हमारा परिवार एक संयुक्त परिवार था जिसमे तीन पीढ़ियों के लोग —-यानि हमारे बाबा-दादी, चाचा-चाची , माँ-पापा, और बुआ और ढेर सारे चाचा साथ रहते थे। उन दिनों संयुक्त परिवार हमारी संस्कृति की पहचान थी — जिसमे हर व्यक्ति एक-दूसरे के कामों में साधिकार दखल देना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता था और साथ ही एक -दूसरे से ढेर सारी उम्मीदें भी पालता। उन उम्मीदों के न पूरा होने पर खूब bitching (पीठ पीछे बुराई ) भी करता। बड़ा रस आता. लेकिन सब एक मर्यादा के दायरे में ही होता —चाहें कोई कितना भी लड़ ले या शिकायत कर ले, अंत में सभी फिर से एक साथ ऐसे रहते मानो कभी कुछ हुआ ही नहीं.
तो भाई —ऐसे परिवार में हम तीसरी पीढ़ी के सबसे बड़े बेटे थे. खूब लाड-दुलार में हमारा पालन -पोषण हुआ था, माँ का तो मैं बहुत ही दुलारा था क्योंकि मेरा बचपन का बड़ा समय उनसे दूर कानपुर में बीता जहाँ मैं अपने मौसेरी दादी के पास पढाई करता था.
आगे का किस्सा ये कि हमने अपने बचपन में अपनी माँ को नौ दिनों का नवरात्री व्रत पूरा रखते देखा. माँ घर की बड़ी बहू थी तो पूरे घर की ज़िम्मेदारी थी. काम में कोई छूट न थी और अपने ऊपर कोई ध्यान भी न रहता। रात को ही जाकर कुछ खाने को नसीब होता। उस वक्त हम और बिन्नू , जो हमारी जेनेरशन में सबसे बड़े बेटे थे – हम दोनों ग्रेजुएशन कर रहे थे। मम्मी की इस हालत पर हम दोनों बहुत चिंतित थे. बिन्नू ने तय किया किअब वो भी मम्मी के साथ नौ दिन का व्रत रहेंगे , कम से कम उन्ही के बहाने मम्मी कुछ खा सकेंगी। भाई अब उन्होंने भी व्रत रहना शुरू कर दिया– मम्मी के साथ। अब मम्मी उनके लिए दिन में तीन-चार बार खाने को बनाती ताकि उनका लड़का भूखा न रह जाये. खाना देख कर हमारे मुँह में भी पानी आता। कुट्टू की पूरी और आलू-टमाटर की पनीली रसेदार या सूखी चटख सब्जी— वाह—-इतनी सेक्सी लगती कि सोच कर मेरे मुँह में अभी भी पानी आ रहा है. उसके अलावा – लौकी की खीर या हलवा, पापड़ — और न जाने क्या-क्या —-मुहँ में अब भी पानी रोकना मुश्किल हो रहा है –उसे याद कर। हम लोग भी उसमें सेंध लगाने के जुगाड़ में रहते तो थोड़ा-बहुत हमें भी मिल जाता. इतना मीठा रिश्ता था —माँ-बेटे का —कि एक दूसरे की इतनी परवाह। दोनों एक दूसरे के लिए सोचते कि कहीं वो भूखा न रह जाये।
मम्मी कलश स्थापना करतीं और बिन्नू और मम्मी दोनों उसकी पूजा करते। छोटा शहर था , तो आस-पास के मंदिरों से देवी माँ के मधुर भजन कानों में रस घोलते।
शाम को मंदिर जाते –जिसे कालीथान कहते। वहां कालीथान में सुबह से शाम तक नवरात्री भर मेला लगा रहता. लोग छोटी-छोटी खरीदारी करते।
कुल मिला कर घर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय और आनंदमय हो जाता। पूरा शहर राममय और माता मय हो जाता। तब शहर का इतना फैलाव भी नहीं था , न इतनी आबादी थी, तो सब कुछ बड़ा शांत भक्तिमय रहता। ऐसे होते-होते नवमी का दिन आता –दिन भर पूजा-पाठ और हवन होता,और कन्याएं खिलाईं जाती. —-छोटे-छोटे बच्चे चिल-पों करते और इस तरह नवरात्री संपन्न होती.
अभी नवरात्री का पहला दिन ही बीता था कि लो–ईद ने भी दस्तक दे दी. मुंहँ में सिवइयों की मिठास घुल गयी. हवा महक उठी. ऐसे वाकये पहले भी हुए हैं जब ईद और नवरात्री लगभग साथ -साथ पड़े हैं. तब सोशल मीडिया का जमाना नहीं था. रमज़ान और ईद और नवरात्री की खुशबू पूरे शहर को अपने आगोश में ले लेती थी . हमारे घर के पास ही वहां की मशहूर और सबसे बड़ी नानपारा मस्जिद पड़ती है. अब भी है. ये बड़ी पुरानी मस्जिद है. यहाँ ईद के दिनों में सुबह चार बजे से ही चहल-पहल शुरू हो जाती. रमज़ान के दिनों में यहाँ रोजे की सहरी के लिए सुबह चार बजे भोपूं बजता. सभी रोज़ेदार उठ जाते. पुराना शहर होने के नाते मिली-जुली आबादी होती और सबके घर आपस में लगभग सटे होते. सड़क पर चहल -पहल शुरू जाती. किसी भी गैर-मुस्लिम को इस भोपूं की आवाज से परेशानी नहीं होती. सभी एक-दूसरे का ख्याल रखते. हालाँकि कभी-कभी शहर में हिन्दू-मुस्लिम तनातनी होती थी. लेकिन आमतौर से किसी आम आदमी पर इसका कोई अधिक असर नहीं होता. आपसी भाईचारे का आलम ये था कि कोई गैर मुस्लिम, अपने रोज़ेदार भाइयों के सामने खाने का जिक्र करने बचता — खाना खाना तो दूर था. कोशिश यही होती थी.

हमारे रहमान चाचा थे –खूब मोटे से , मज़ेदार से, —-पुरानी फिल्मों के एक्टर भगवान् दादा जैसे. —बिलकुल उनके जुड़वां भाई जैसे. वो बेचारे मोटे होने की वजह से अपनी भूख पर काबू नहीं रख पाते और रोजे के बहुत पाबंद नहीं रह पाते. चाची उन्हें घर से सुबह ही भगा देती थीं. फिर हमारे बाबा की ज्वेलर्स एंड बैंकर्स की शॉप पर (जहाँ वो बैठते थे ) आकर दिन भर चोरी-छिपे कुछ न कुछ खाते रहते. लेकिन शाम को जैसे ही इफ्तारी नजदीक आता , एक घंटे पहले से ही वो सार्वजानिक रूप से मुँह में दातून दबाये पूरे बाजार में घूमते रहते. जैसे उनसे बड़ा कोई रोज़ेदार नहीं है. जैसे ही इफ्तारी शुरू होती तुरंत कहीं न कहीं दस्तरख़्वान सज जाता. और उन्हें चाहने वाले अपने साथ इफ्तारी कराते। इफ्तारी के बाद उनके चेहरे की संतुष्टि और ख़ुशी देखते बनती.अल्लाह ने भी अपने इस नेक बन्दे पर पूरा करम फ़रमाया. शाम होते ही रफ़ीक या पँचकौड़ी के होटल में उनकी दावत होती.—- ऐसे थे हमारे रहमान चाचा. बहुत भोले ,सरल और हंसमुख. हाँ —चाची से वो बहुत डरते इस लिए रात 10 बजे के अंदर उनका घर के अंदर होना बहुत जरूरी था.
इसी तरह हमारी एक मुजीब चाची थीं –हमारे घर के पास बिलकुल बगल में नानपारा मस्जिद से सटा हुआ उनका छोटा सा घर था. उनके पति यानि हमारे मुजीब चाचा हमारे पापा के साथ प्लंबिंग का काम करते थे. लेकिन उनकी शराब की लत के कारण उनके घर में बड़ी दिक्कतें थी. हमारी चाची बिलकुल गऊ थी. हमारी माँ उनका बड़ा ख्याल रखती. जब रमजान होता तो रोज शाम को इफ्तारी की प्लेट उनके घर से आती जिसका हम भाइयों को बेसब्री से इंतज़ार रहता , स्पेशली बिन्नू और विक्की (सबसे छोटा भाई) को. कभी -कभी जब हममें से कोई घर पर नहीं होता , उसे इफ्तारी न पाने का बड़ा मलाल रहता. ….. एक हमारे जब्बार चाचा थे जो हमारे टेलर मास्टर भी थे. हम लोग बचपन से उन्ही के यहाँ अपने कपडे सिलवाते थे. इस लिए हमलोग उनके मुँहलगे भी थे. —-एक दिक्कत थी कि वो कभी भी कपडे सिल कर समय पर न देते, तो बड़ी खीज भी होती लेकिन क्या करते , चुपचाप चले आते. एक दिन वो दूकान पर नहीं दिखे, बिन्नू की एक पैंट काफी दिनों से उनके यहाँ पड़ी थी. जोश में आकर बिन्नू ने उनके आदमियों से कहा ” जब्बार (फलाने) के कहाँ हैं “- तब तक काउंटर के पीछे से आवाज़ आयी ” बेटा – हम यहाँ हैं ” . अब बिन्नू को तो काटो को खून नहीं –उन्हें लगा था कि वो वहां नहीं हैं इस लिए जोश में बोल गए. भैय्या –बिन्नू तुरंत भाग गए और कई दिनों तक उनके यहाँ नहीं गए. जब्बार चाचा का छोटा भाई हमारा दोस्त भी था जिससे बिन्नू अपनी डिजाइन के कपडे सिलवाते. ईद में हम उनके यहाँ भी जाते —खूब भरपेट सिवईं और दहीबड़े खाते साथ में ईदी भी पाते। थोड़ा बड़े होने पर हमारे दोस्त कल्बे अब्बास और सगीर आबिद के यहाँ भी ईद पर जाते। चूँकि उनकी शादी नयी-नयी हुई थी तो भाभियाँ छेड़छाड़ भी करती.और सिवइयां आदि से खातिरदारी भी करतीं।
बड़े सुनहरे दिन थे। मीलों पीछे सब छूट गया। अब न वो दिन हैं और लोग. तब से गोमती में बहुत पानी बह गया.
Thanks GOD for those beautiful days, those beautiful people in my life.
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