
आज दशहरा है अर्थात विजयदशमी… यूँ ही बच्चों के साथ रावण को जलता देख कर अपने बचपन की गलियों में चला गया. बहुत सी पुरानी यादों से मुलाकात हो गयी। ..चलिए चलते हैं …. थोड़ा उस मंजर को हम आप साथ साथ महसूस करते हैं….तो चलिए ——-
दशहरा ——यानि अच्छाई की बुराई पर विजय. वो दिन थे जब मैं सात-आठ साल का हुआ करता था. उन दिनों मैं अपनी माँ से दूर कानपुर में अपने पापा की मौसी के साथ रहता था और पढ़ाई कर रहा था —-केवल छुट्टियों में —गर्मियों की या फिर दिवाली दशहरा में बहराइच अपनी माँ के पास जा पाता था. –बहराइच —जहाँ मेरे माँ पापा , बाबा-दादी से लेकर चाची और तमाम सारे चाचा रहते थे. उस वक्त बहराइच अपनी मम्मी के पास जाना मेरे लिए दुनिया की सबसे बड़ी ख़ुशी होती थी. मन बल्लियों उछलता था।उस वक्त का बहराइच एक साफ़-सुथरा छोटा सा एक बहुत ही खूबसूरत पहाड़ी शहर की तरह हुआ करता था. ज्यादा भीड़-भाड़ भी नहीं हुआ करती थी। उस दौरान आने-जाने के साधन इतने विकसित नहीं थे। कानपुर से बहराइच ट्रेन यात्रा ऐसी थी की यदि सुबह चलो तो देर रात या फिर रात चलो तो सुबह ही पहुंचना होता था. लेकिन बहराइच जाने का उत्साह ही इतना होता था कि कुछ पता ही नहीं चलता था. बहरहाल—-हम दशहरे पर आते हैं. हाँ तो —–उन दिनों हमारे बाबा अपनी ज्वेलर्स शॉप पर पूजा करवाते थे. दिन में पूजा होती थी। बड़ा मज़ा आता था। सभी लोग होते थे—–बाबा जी, मुन्नू चाचा के अलावा बद्री फूफा जी, रहमान चाचा और एक मुनीम जी भी होते थे. मतलब ये की सभी अपने लोग होते थे. पूरा माहौल आनंद से सराबोर रहता था. हवंन में सुगंधित धुएं से सारी दूकान सराबोर रहती थी.हमारे बाबा एक बड़े व्यापारी होने के अतिरिक्त एक पत्रकार , फ्रीडम फाइटर और कांग्रेस के विधायक भी थे. हमारी ज्वैलरी शॉप बीच शहर में घंटाघर के पास मुख्य बाजार में थी. और शहर के बहुत से गड़मान्य व्यक्तियों और प्रशासनिक अधिकारियों का आना -जाना वहां लगा रहता था.
खैर—-पूजा समाप्त होने पर हमारे बाबाजी हम सभी बच्चों को और हमारे पिता और चाचाओं को शगुन के रूप में दो रुपये का नोट बिलकुल नयी गड्डी से तोड़ कर बांटते थे. वो दो रुपये आज के सैकड़ों रूपए के बराबर होंगे. शाम होते होते हम सब बच्चे दशहरा मेला देखने के लिए मचलने लगते थे. दशहरा मेला उस समय वहां पर शहर के बाहर मौनी बाबा के आश्रम के मैदान में लगता था. वहीँ रामलीला भी होती थी. पहले रामलीला होती फिर राम जी रावण के पुतले का दहन करते. हम बच्चों को रामलीला दिखने की जिम्मेदारी रहमान चाचा की लीडरशिप में चाचाओं को सौपी जाती। आप सब सोच रहे होंगे की रहमान चाचा का किरदार क्या होगा. —–तो आपको बताते हैं –वो बिलकुल भगवान दादा (उस समय के एक एक्टर) के जुड़वाँ भाई लगते थे —वैसे ही मोटू और वैसे ही मज़ेदार.
तो भाई —-मेले के मैदान में बड़ी भीड़ होती थी. रामलीला की कुछ झलक मिल जाती थी और वो भी रहमान चाचा के कंधे पर बैठ कर —-केवल रावण का बड़ा सा पुतला दूर से दिखाई देता. जो थोड़ी देर बाद जलता।इसके साथ ही रामलीला समाप्त हो जाती. उसी समय सभी बच्चों और बड़ों में जलते हुए रावण के अवशेष उठाने की मानो होड़ लग जाती. क्यूंकि ये समृद्धि का प्रतीक माना जाता था. उनमें होड़ लग जाती की कौन जले हुए रावण का कुछ अवशेष ला पता है.. उस उठा-पटक में जो भी एक छोटा सा भी हिस्सा ला पाता वो किसी हीरो से कम नहीं होता।
सबसे मज़ेदार वाकया तो ये था कि हमारे घर के पास एक मशहूर चाट की दूकान लगाने वाले कामता चाचा उस रामलीला में रावण का किरदार करते थे , रामजी सेना के बंदर सिपाही लाल रंग का कच्छा और रावण के सिपाही काला कच्छा पहनते थे। उनके हाथ में लकड़ी का सोंटा होता था. कई लोग तो अपने दुश्मनी का बदला भी उसी समय ले लेते थे , एक मज़ेदार किस्सा है कि मेरा दोस्त बिन्नू भी दौड़ कर उस सेना में शामिल होने गया लेकिन उसे राम जी सेना में शामिल होने नहीं मिला फिर उसे रावण की सेना में जगह मिली, –फिर क्या था मौका मिलते ही बिन्नू ने राम जी सेना में शामिल कुछ बंदर सिपाहियों की खूब पिटाई की क्योकि उन्होंने उसे रामजी की सेना में शामिल नहीं होने दिया था.
बड़ा मजेदार लेकिन अजीब दृश्य था —-जल्दी से आयोजकों ने किनारे ले जा कर बिन्नू को समझाया कि भाई ये राम जी के सैनिक हैं इन्हे इतना न पीटो.
इसी तरह होते-करते हम लोग कुछ चाट -पकौड़ी आदि खा -पी कर और कुछ खिलौने ले कर वापस जाते. कितना सुखद समय था—–बचपन के वो सुख से भरे मस्ती वाले दिन.
एक हफ्ते के बाद —–शहर में हमारे घर के पास स्थित बिसातखाने बाजार में भारत -मिलाप का आयोजन बड़े भव्य पैमाने पर होता था——वो बिसातखाना जहाँ सामान्य दिनों में तिल रखने की भी जगह नहीं होती —वहां उस दिन शाम को सभी दुकानदार ,हिन्दू और मुस्लिम सभी, ख़ुशी -ख़ुशी अपनी दुकाने हटा कर बड़ी सी जगह बना देते थे जहाँ शाम को भरत -मिलाप का आयोजन होता था. कई बार तो बड़ा मार्मिक दृश्य होता था कि वहां उपास्थित लोगों की आँखें भर जाती थीं। उस समय के लोग बहुत सरल होते थे। रिश्तों को बड़ी तरजीह देते थे – बड़ी जल्दी भावुक हो जाते थे.
खैर —– इस तरह से हमारे बचपन की रामलीला और दशहरे की राम कहानी पूरी हुई. अब इसके बाद घर में आने वाली दिवाली की तैयारियां शुरू हो जाती थी। हम बच्चों का उत्साह तो दिवाली के नाम से ही देखते बनता. इस बारे में दिवाली के दिन आपसे अपने संस्मरण बाटूंगा. तब लिए सबको जय सिया राम.
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