Wanderings with Nikhil

Navigating Life's Journey, One Adventure at a Time.

nostalgic Indian culture storyteller

The nostalgic account reflects on a school trip to the Techno-75 exhibition in Lucknow, evoking memories of adolescence filled with dreams and excitement. At that time, visiting Lucknow felt like a grand adventure, symbolizing aspirations and friendship, where the journey itself created lasting memories, especially in the context of co-education and cinema culture.

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बचपन की मस्ती

nostalgic school memories

यह पुरानी यादों से भरा लेख लखनऊ में ‘टेक्नो-75’ प्रदर्शनी के लिए स्कूल ट्रिप की कहानी बताता है, जो सपनों और उत्साह से भरे किशोरावस्था के दिनों की यादें ताज़ा करता है। उस समय, लखनऊ की यात्रा किसी बड़े रोमांच जैसी लगती थी, जो उम्मीदों और दोस्ती का प्रतीक थी; इस यात्रा ने, खासकर को-एजुकेशन और सिनेमा कल्चर के माहौल में, ऐसी यादें बनाईं जो हमेशा के लिए दिल में बस गईं।

टेक्नो-75, शोले और वह भागता हुआ दोस्त… हमारी किशोर उम्र की सबसे मस्त यात्रा”

(Techno-75 exhibition Lucknow school trip memories)

ये बात तब की है जब हम बहराइच में रहने वालों के लिए लखनऊ सिर्फ एक शहर नहीं –एक सपना हुआ करता था

“कुछ यात्राएँ मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं…
वे इसलिए होती हैं कि बरसों बाद भी दोस्तों की महफ़िल में हँसी के ठहाके बनकर लौट सकें।”

आज के बच्चों को शायद यह बात समझाना थोड़ा मुश्किल होगा कि एक समय ऐसा भी था, जब लखनऊ जाना विदेश जाने जैसा रोमांच देता था।

आज गाड़ी उठाइए और —ये जा—वो जा—आप दो घंटे में लखनऊ पहुँच गए

लेकिन तब…

लखनऊ सिर्फ नक्शे पर बना एक शहर नहीं था।

वह हमारी कल्पनाओं का शहर था।

नवाबों का शहर।

बड़े-बड़े बाज़ारों का शहर।

सिनेमा का शहर।

और सबसे बढ़कर…

सपनों का शहर।

हम बहराइच जैसे छोटे शहर के लड़के थे। दुनिया बहुत छोटी थी, लेकिन सपने बहुत बड़े थे।

उस वक़्त हम अपने टीनएज की शुरूवात में थे. तो जाहिर था की बहुत से सपने थे – बहुत सी चीज़ें जाननी थीं, हर चीज़ का क्रेज था.

लखनऊ की चौड़ी सड़कें, बड़े-बड़े चौराहे, हज़रतगंज—और सबसे ऊपर वहां की—lovelane—जो कि गंज की एक छोटी से , मगर बड़ी hotspot थी. वहां फैशन की सब चीज़ें मिलती थी -लेकिन जो सबसे बड़ी ख़ास बात थी – कि वहां बिना एक दूसरे से छूते हुए पास नहीं हो सकते थे. इसलिए ये जगह उस समय के नौजवानों में काफी popular थी.

जो दूसरी बात सबसे बड़ी थी—वो थी—वहाँ के सिनेमा हॉल और उनमें लगने वाली फिल्में।

तो साहब – ऐसा था हमारा बचपन।- बेफिक्र, क्रेज़ी और मस्ती

जब स्कूल ने कहा—”टेक्नो-75 प्रदर्शनी देखने चलना है”

Techno-75 exhibition Lucknow school trip memories
Sanatlkada 2026

(Techno-75 exhibition Lucknow school trip memories)

उस समय लखनऊ में टेक्नो-75 की exhibition लगी थी। ये एक साइंस और टेक्नोलॉजी एग्ज़िबिशन था.

जिस दिन स्कूल में घोषणा हुई—

“जो विद्यार्थी टेक्नो-75 प्रदर्शनी देखने लखनऊ जाना चाहते हैं, वे अपना नाम लिखवा दें…”

पूरी क्लास में बिजली दौड़ गई।

किसी को प्रदर्शनी से मतलब नहीं था।

सबके अपने-अपने कारण थे।

कोई पहली बार लखनऊ देखने जा रहा था।

कोई बस में दोस्तों के साथ बैठने के लिए उत्साहित था।

और कुछ ऐसे भी थे…

जिन्हें बस यह जानकर नींद उड़ गई कि…

“लड़कियाँ भी साथ जाएँगी…”

उस ज़माने में को-एजुकेशन किसी सामान्य बात का नाम नहीं था।

लड़कों के स्कूल अलग।

लड़कियों के अलग।

एक-दूसरे को देख लेना ही किसी उपलब्धि से कम नहीं माना जाता था।

एक तो Co-Ed में थोड़ी-सी ही लड़कियां थीं—इसलिए सभी अपना-अपना दिल हाथ में लेकर घूमते।

लेकिन जनाब- ईमानदारी इतनी कि किसी एक दोस्त ने किसी लड़की पर नज़र डाल दी -तो फिर बाकी की नज़रें उस लड़की के सामने आदर से झुकी रहतीं थीं।

मज़े की बात तो ये है कि उस लड़की को इन बातों की खबर ही नहीं रहती।

और अब…

ये यात्रा का announcement सबके लिए किसी लॉटरी से काम नहीं था

पूरे दिन की यात्रा…

वह भी एक ही बस में!

अरे भाई…

उस समय दिल की धड़कनों का विज्ञान, न्यूटन के किसी नियम से नहीं चलता था।

तैयारी ऐसे जैसे एवरेस्ट फतह करने जा रहे हों

मम्मी ने पराठे बाँधे।

स्टील की पानी की बोतल भरी।

बाबाजी ने पांच-सात सौ रुपए जेब में रख दिए।

और हिदायतों की लंबी सूची—

“खाना समय से खाना…”

“खिड़की से बाहर मत झाँकना…”

“किसी अजनबी से कुछ मत लेना…”

हम हर बात पर…

“हाँ-हाँ…”

कहते रहे।

क्योंकि दिमाग तो पहले ही लखनऊ पहुँच चुका था।

बस में सबसे बड़ा संघर्ष—खिड़की वाली सीट

आज बच्चे फ्लाइट की सीट चुनते हैं।

तब…

बस की खिड़की वाली सीट ही बिज़नेस क्लास में होती थी।

जिसने खिड़की पकड़ ली…

समझिए पूरी यात्रा उसी की हो गई।

बिन्नू पहले ही सीट घेर चुका था।

भानु ने अपना रुमाल रखकर दावा ठोक दिया।

बिज्जू बोला—

“रुमाल रखने से सीट नहीं मिलती।”

पीछे से किसी ने फैसला सुनाया—

“लोकतंत्र में पहले बैठने वाले का अधिकार होता है।”

और बस चलने से पहले ही संसद का विशेष सत्र शुरू हो चुका था।

जसबीर… हमारा अपना राजेश खन्ना

हमारे दोस्त जसबीर का अलग ही रुतबा था।

पूरे के पूरे सरदार जी।

लेकिन दिल…

पूरी तरह राजेश खन्ना के कब्ज़े में।

वह चलते भी वैसे…

मुस्कुराते भी वैसे…

और मौका मिलते ही गर्दन थोड़ा तिरछी करके कहते—

“नहीं… रानी माँ…”

बस…

इतना सुनना होता था कि पूरी बस ठहाकों से भर जाती।

किसी ने कहा—

“पहले दाढ़ी संभाल ले, फिर सुपरस्टार बनना।”

जसबीर बिना नाराज़ हुए मुस्कुरा देता।

और फिर…

थोड़ी देर बाद वही संवाद दोबारा।

“नहीं… रानी माँ…”

शायद उस दौर में अभिनय का मतलब ही था—

जिसे पसंद करो…

उसे जीना शुरू कर दो।

बसें बदल गईं, रास्ते भी बदल गए,
मगर यारों के ठहाके आज भी वहीं खड़े हैं।

फिल्में देखना… स्टेटस सिंबल हुआ करता था

Techno-75 exhibition Lucknow school trip memories
poster of film "Sholey"

लखनऊ में उस समय बड़े-बड़े और सुन्दर सिनेमा हाल थे – जैसे नोवेल्टी, साहू, शिल्पी , आनंद , मेफेयर और बसंत – और भी बहुत से – कुछ पुराने, कुछ नए. उस समय फिल्मों का बड़ा क्रेज़ रहता था, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना , और धर्मेंद्र – ये सब उस समय के आइकॉन थे। फिल्में बहराइच में उस समय रिलीज़ होने के करीब 15 -16 साल बाद आतीं थीं – इसलिए लखनऊ आने पर पहला काम ये होता था कि – सारी की सारी नई फिल्में – एक दिन में 3 -4 शोज देख कर निपटा दें- ताकि लौट कर अपने दोस्तों में रौब डाल सकें।

आज नई फिल्म मोबाइल पर रिलीज़ होती है।

उस समय…

बहराइच में फिल्में तब पहुँचती थीं…

जब बड़े शहरों में लोग उन्हें दूसरी या तीसरी बार देख चुके होते।

कई बार तो लगता था…

फिल्म नहीं…

इतिहास आ रहा है।

इसलिए जो लड़का लखनऊ जाकर नई फिल्म देख आता…

वह अगले कई महीनों तक चलता-फिरता फ़िल्मी विश्वकोश बन जाता।

वह कहानी सुनाता।

संवाद सुनाता।

और थोड़ा-बहुत…

अपनी तरफ़ से भी जोड़ देता।

बाकी दोस्त मुँह खोले सुनते रहते।

उस समय स्पॉइलर जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी।

कहानी सुनना भी मनोरंजन था।

“गए दिनों का सुराग़ लेकर, किधर से आया, किधर गया वो..

जावेद अख्तर


(जारी रहेगा… अगले भाग में—टेक्नो-75 प्रदर्शनी, शाम का लखनऊ, लीला पिक्चर हॉल में शोले, “कितने आदमी थे?” पर गूँजती सीटियाँ, और फिर कैसरगंज में वह ऐतिहासिक घटना जब बस चल पड़ी और हमारा दोस्त… लोटा छोड़कर बस के पीछे भागा!)


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