रामनवमी और दुर्गापूजा की वो पवित्र दुनिया

( महिषासुरमर्दिनि)
एक ध्वनि, जो आज भी गूंजती है
“श्रीराम जय राम जय जय राम…”
सुबह की पहली किरण खिड़की से झाँकती थी,
और उसके साथ ही मंदिरों की घंटियों की ध्वनि हवा में तैरती हुई घर के हर कोने में फैल जाती थी।
ऐसा लगता था जैसे पूरा बहराइच एक साथ जाग रहा हो —
ना किसी अलार्म की ज़रूरत,
ना किसी शोर की…
बस भक्ति की ध्वनि ही पर्याप्त थी।
माँ का व्रत — तपस्या, जो शब्दों में नहीं बंधती
मम्मी के लिए ये नौ दिन कोई साधारण दिन नहीं होते थे।
ये उनके लिए आत्मा की साधना थे।
वो सुबह जल्दी उठतीं, स्नान करतीं, और फिर पूजा में लीन हो जातीं। जल्दी ही उठ कर सबके लिए घर में नाश्ता -खाना बनाना। ये उनका रोज़ का नियम हो जाता। काम में कोई छूट नहीं। हमारा घर एक जॉइंट फॅमिली था और सबकी अपनी-अपनी पसंद थी जिसका उन्हें ख्याल रखना पड़ता। एक मम्मी ही बिना चेहरे पर शिकन लाये ये कर सकती थी। उस पर हम सात भाई और एक बहन भी उनकी जिम्मेदारी थे , उनके साथ हमारी ऑन्टी हमेशi उन साथ खड़ी रहती थीं। दोनों बहनें दिन भर व्यस्त रहती हम सबकी पसंद का ख्याल रखने के लिए।
और उस समय अक्सर मेरे कानों में गूंजता था रामचरितमानस का ये दोहा—
“राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जो चाहसि उजियार॥‘अर्थ: जीभ रूपी द्वार पर राम नाम का दीपक रखो, इससे भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश होगा।
मम्मी का व्रत भी कुछ ऐसा ही था—
अनुशासन और प्रेम का संगम।
पर एक चीज़ मुझे हमेशा चुभती थी—
वो अपने लिए कुछ नहीं बनाती थीं।
उनकी थाली में बस फल, थोड़ा-सा दूध…
और दिन भर का उपवास।
बिन्नू की जिद — दोस्ती का सबसे पवित्र रूप
एक दिन बिन्नू ने नोटिस किया ।
उसने मम्मी को यूँ ही देखा… बिना कुछ खाए-पिए।
वो चुप रहा, कुछ देर तक देखता रहा…
और फिर अचानक बोला—
“अगर मम्मी नहीं खाएंगी, तो मैं भी व्रत रखूँगा।”
उसकी आँखों में जिद नहीं थी…
वो एक मासूम प्रेम था।
मम्मी ने पहले हँसकर टाल दिया,
लेकिन जब उसने सच में कुछ नहीं खाया,
तो मम्मी की आँखों में एक अजीब-सी नमी आ गई।
उस दिन मम्मी ने पहली बार अपने लिए नहीं,
हम सबके के लिए फलाहार बनाया।
और वो पहला कौर…
आज भी मेरी स्मृतियों का सबसे स्वादिष्ट कौर है।
बहराइच — जहाँ त्योहार सिर्फ मनाए नहीं जाते थे, जीए जाते थे

(नवरात्रि में एक मंदिर का दृश्य)
बहराइच… एक छोटा-सा शहर,
लेकिन त्योहारों के समय वो एक जीवंत कविता बन जाता था।
गलियों में रंगोली,
छोटे-छोटे पंडाल,
और हर मोड़ पर एक मंदिर…
सुबह होते ही—
🔔 घंटियों की ध्वनि
🌸 फूलों की खुशबू
🕉️ मंत्रों की गूंज
ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते थे,
जिसे शब्दों में बाँधना मुश्किल है।
बहराइच में संघारण देवी का मंदिर है जहाँ नवरात के दिनों में खूब भक्तगण जाते हैं , वहां बड़ा सा मेला आज ही लगता है. यहाँ मम्मी -ऑन्टी और हम सभी नवरात्री में दर्शन के लिए जाते थे. इसके अलावा , हमें याद है , हमारे बचपन में संतोषी माँ की पूजा होती थी , शुक्रवार को उनका व्रत मम्मी और ऑन्टी रखती थीं। उस दिन किसी भी तरह का खट्टा खाना मना था. नवरात्री में वहां पर भी हम जाते थे , संतोषी माँ का मंदिर , बहराइच के सबसे पुराने मंदिर “सिद्धनाथ मंदिर ” के पास हुआ करता था।
मंदिर के वो दर्शन — जहाँ भगवान पास लगते थे
हम हर सुबह मंदिर जाते थे।
रोज़ के दर्शन के लिए सुबह हम पास के छोटे मंदिर जाते थे, ऐसा एक मंदिर घर के पास पीपल पेड़ के चौराहे के पास है। अब भी है। उस समय “सिद्धनाथ का मंदिर” ज्यादा बड़ा तो नहीं था लेकिन नवरात और अन्य त्योहारों में बड़ी भीड़ होती थी.
भीड़ होती थी, पर वो भीड़ परेशान नहीं करती थी।
वो भीड़ भी एक संगीत की तरह लगती थी—
हर कोई अपनी श्रद्धा में डूबा हुआ।
छोटे मंदिरों की सबसे खूबसूरत बात थी—
वहाँ भगवान तक पहुँचने के लिए धक्का नहीं देना पड़ता था।
वहाँ बस एक सच्चा मन चाहिए होता था।
रामचरितमानस की चौपाइयाँ — जो हवा में घुल जाती थीं
मंदिरों में अक्सर ये चौपाई गूंजती थी—
“मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी॥”
जब ये शब्द हवा में तैरते थे,
तो ऐसा लगता था जैसे हर दुख, हर चिंता…
धीरे-धीरे पिघल रही है।
फलाहार — स्वाद से ज्यादा भावना का उत्सव

(साबूदाने की खिचड़ी)
वो फलाहार…
साबूदाना खिचड़ी,
कुट्टू की पूड़ी,
आलू की सब्ज़ी…
हम व्रत में नहीं थे,
फिर भी हम उसी खाने का इंतज़ार करते थे।
क्योंकि उसमें सिर्फ स्वाद नहीं था—
उसमें त्योहार की आत्मा थी।
एक बार बिन्नू ने इतना खा लिया कि पेट दर्द हो गया,
और फिर भी वो बोला—
“, मम्मी थोड़ा और दे दो… बहुत अच्छा बना है!”
मम्मी हँस पड़ीं…
और हम सब भी।
एक छोटी-सी घटना — जब मैंने व्रत रखने की कोशिश की
एक बार मैंने भी व्रत रखने की कोशिश की।
दोपहर तक सब ठीक था…
शाम तक हालत खराब।
और रात में चुपके से बिस्किट खा लिया।
मम्मी ने देख लिया।
डांटा नहीं…
बस मुस्कुराकर कहा—
“व्रत भूखे रहने का नहीं, मन को शांत रखने का होता है।”
उस दिन समझ आया—
भक्ति पेट से नहीं, दिल से होती है।
शाम की आरती — जहाँ समय ठहर जाता था
शाम होते ही मंदिरों की रौनक और बढ़ जाती थी।
दीयों की लौ,
घंटियों की गूंज,
और ढोलक की थाप…
उस समय दुर्गा सप्तशती के श्लोक भी सुनाई देते थे—
“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
उस क्षण ऐसा लगता था जैसे पूरी सृष्टि माँ के चरणों में झुकी हुई है।
अष्टमी — जब माँ खुद घर आती थीं

(छोटी कन्याओं में माँ का रूप)
अष्टमी का दिन…
घर में छोटी-छोटी कन्याओं को बुलाया जाता था।
उनके पैर धोए जाते थे,
उन्हें पूड़ी, चने और हलवा खिलाया जाता था।
जब वो हँसती थीं,
तो सच में लगता था—
माँ दुर्गा खुद हमारे घर आई हैं।
अंतिम दिन — हवन की पवित्र अग्नि

और फिर आता था अंतिम दिन…
घर में हवन होता था।
हवन कुंड में जलती अग्नि,
घी की आहुति,
और मंत्रों की गूंज—
“स्वाहा… स्वाहा…”
धुएँ की वो खुशबू,
जो आँखों में हल्की-सी चुभन देती थी,
पर मन को एक अजीब-सी शांति भी देती थी।
माँ हाथ जोड़कर बैठी होती थीं,
और हम सब उनके साथ।
उस समय लगता था—
ये सिर्फ एक अनुष्ठान नहीं,
ये हमारे भीतर की अशुद्धियों को जलाने का एक प्रयास है।
एक अंतिम स्मृति — जो कभी खत्म नहीं होती
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो वो सब कुछ एक फिल्म की तरह चलता है—
माँ का व्रत,
बिन्नू की जिद,
बहराइच की गलियाँ,
मंदिर की घंटियाँ…
सब कुछ जैसे आज भी वहीं ठहरा हुआ है।
एक प्रार्थना
“सिया राम मय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥”
हे प्रभु,
अगर कुछ माँगना हो तो बस इतना देना—
वो बचपन लौटा दो,
वो माँ और दोस्त का प्यार लौटा दो,
वो त्योहारों की सादगी लौटा दो…
जहाँ भगवान सिर्फ मंदिरों में नहीं,
हमारे दिलों में बसते थे।
ये एक 80 दशक के मध्यवर्गीय घर की कहानी है. बल्कि यों कहे की घर घर की कहानी है। ये आपको भी कही न कहीं जरूर अपने जैसी लगती होगी। यदि थोड़ा सा भी आपके मन को ये छू सके तो। ……हमारी मेहनत सफल हो जाएगी। कमेंट जरूर करें।
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